उरई। स्त्री मुक्ति लीग और नौजवान भारत सभा ने अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उरई शहर में मार्च निकालकर स्त्री मुक्ति आन्दोलन को सरकारी व सुधारवादी भ्रमजाल से बाहर निकाल क्रांतिकारी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए नुक्कढ़ सभाएं और क्रांतिकारी  गीत गाये। लक्ष्मी ने कहा कि अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पुरुष वर्चस्ववाद के तमाम रूपों से मुक्ति और जीवन के हर पहलू में पूर्ण समानता के लिये स्त्रियों के संघर्ष का प्रतीक है। लेकिन आज सरकारी तंत्र और सुधारवादी नारीवादियों द्वारा इसे एक औपचारिक व रस्मी अनुष्ठान में बदल दिया है। सरकारी और एनजीओपंथी मार्का नारीवादी “स्त्री सशक्तिकरण” को बार -बार दोहराता है और स्त्री-मुक्ति के स्वप्न को केवल संसद व नौकरियों में भागीदारी तक समेट  देता है। इसके दायरे में करोड़ों गरीब, शिक्षा से वंचित मेहनतकश स्त्रियाँ नहीं आती। ये इन स्त्रियों के शोषण व उत्पीड़न पर खामोश हैं। यही नहीं ये सुधारवादी जाने या अनजाने स्त्रियों के संघर्ष को अन्य मेहनतकश समुदाय से जोड़ने की कोशिश कभी नहीं करते। ये मौजूदा व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने के बजाय ‘ स्त्री मुक्ति‘ के सवाल को “ अंध पुरुषविरोध” में तब्दील कर इसी पूँजीवादी पितृसत्तात्मक व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम करते हैं जो स्त्री उत्पीड़न की मूल जड़ है। जबकि 8 मार्च की महत्वपूर्ण बात यह थी कि उसने अपने आन्दोलन को ‘ पूंजीवादी  पितृसत्ता‘ के खिलाफ केन्द्रित किया और अन्य उत्पीड़ित वर्गों के साथ अपने संघर्ष को साझा किया।  1857 में 8 मार्च को न्यूयार्क में महिला कपड़ा मजदूरों ने बेहतर मज़दूरी और कार्यस्थितियों के लिए प्रदर्शन किया। जिसका सरकार ने बुरी तरह दमन किया। लेकिन दो वर्ष बाद महिलाओं ने अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए अपनी पहली यूनियन बनाई। इसके 51 वर्ष बाद 8 मार्च के ही दिन न्यूयार्क में करीब 20 हजार महिलाओं ने वोट देने के अधिकार, बेहतर कार्य स्थितियांँ, बेहतर मज़दूरी के लिए प्रदर्शन किया। दो वर्ष बाद 1910 में कोपेनहेगेन में दुनिया भर की मज़दूर पार्टियों के अन्तरराष्ट्रीय मंच ने अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन का आयोजन किया। इसी सम्मेलन में जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी की क्रांतिकारी नेता क्लारा जेटकिन ने यह प्रस्ताव रखा कि 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में पूरी दुनियां में मनाया जाय। बृजेश ने कहा कि मौजूदा पूंजीवादी  व्यवस्था अपनी जरूरतों  व स्त्रियों के वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए स्त्रियांे को सशक्त बनाने का भ्रमजाल रचती है। इस दावे के पीछे की सच्चाई यह है कि आम स्त्रियों की स्थिति बदतर हुई है। नेशलन क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 2014 के आँकडों से चलें तो 2004 से 2014 के बीच स्त्रियांें के साथ बलात्कार के मामलों में 101.5 प्रतिशत, अपहरण के मामले में 231.1 प्रतिशत, दहेज हत्या में 20.3 प्रतिशत, स्त्रियों पर हमले के मामले में 137.9 प्रतिशत, पति द्वारा क्रूरता के मामले में 114.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। दिल्ली पुलिस के रिकार्ड के अनुसार वर्ष 2014 में बलात्कार, शारीरिक छेड़छाड़ और मौखिक छेड़छाड़ की घटना क्रमशः 2085, 4182, 1282 से बढ़कर वर्ष 2015 में क्रमशः 2095, 5152, 1444 हो गई। एनसीआरबी की 2016 की रिपोर्ट के अनुसार बलात्कार के 94.6 प्रतिशत मामलों आरोपी पीड़िता के परिचित थे। वास्तव में स्त्रियों की मुक्ति क्रांतिकारी बदलाव से ही संभव है। तात्कालिक तौर पर  सख्त कानून बनाने व उन पर सही तरीके से अमल करने के लिए सत्ताधारी वर्ग पर संगठित दबाव बनाने के अलावा स्त्रियों को अपनी सुरक्षा के लिए खुद आगे आना होगा। स्त्री मुक्ति आन्दोलन अपने मुकाम तक तभी पहुंच सकता है जबकि मौजूदा लूट व अन्याय पर टिकी पूंजीवादी पितृसत्तामक व्यवस्था को उख़ाड़ फेंकने के लम्बे संघर्ष में उतर पड़ा जाय। चुनावी रास्ते से नहीं बल्कि इंक़लाबी रास्ते से एक नये समाज, एक नयी व्यवस्था का निर्माण करें। न्याय और सच्ची बराबरी पर आधारित एक ऐसी मानव केन्द्रित व्यवस्था का निर्माण करना होगा जो अपने इसी बुनियादी चरित्र की वजह से स्त्रियों को स्वतः आजादी और पूर्ण बराबरी का दर्जा देगी।

लक्ष्मी, अंजली,यशवन्त, बृजेश, अरूंधति  ,दिनेश  ,संजना , शालिनी ,सलोनी ,रंजना, वंदना ,अदिति,  सनी अतुल कुमार, शिवम ,राहुल ,राज, देवेश, तुषार, विजय ,सनी, आदि लोग शामिल रहे .

 

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