* पुलिस का पूरा फोकस आरोपियों की गिरफ्तारी पर है न कि कांड की तह में जाना
कोंच-उरई । ‘कौन पचड़े में पड़ेÓ ने सभी के होंठ सिल दिये हैं जिसके चलते चंदुर्रा कांड की असल बजह धूल की पर्तों के बीच कहीं दब कर रह गई है। विगत दिवस घटे चंदुर्रा अग्निकांड में एक की मौत के बाद पुलिस मामले में नामजद कराये गये आरोपियों की गिरफ्तारी पर पूरा फोकस जमाये है। मामले में दुकान मालिक गिरेन्द्र सिंह उर्फ गिरवर की मौत के बाद पुलिस ने दो आरोपियों को आनन फानन गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया है और शेष पांच की गिरफ्तारी के लिये व्यापक रूप से अभियान चलाया जा रहा है। इस कांड की असल बजह क्या है ये बात हर कोई जानता है लेकिन इस गुत्थी की तह तक जाने में पुलिस का कतराना काफी दिलचस्प है। ऐसा समझा जा रहा है कि पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी करके अपना पल्ला झाड़ लेगी और आग कैसे और किन बजहों से लगी, यह रहस्य रहस्य ही बना रहेगा।
25 मार्च की रात लगभग साढे आठ बजे कोतवाली क्षेत्र के ग्राम चंदुर्रा में संदिग्ध परिस्थितियों में गिरेन्द्रसिंह उर्फ गिरवर की परचून की दुकान में भीषण विस्फोट के साथ भयंकर आग लग गई थी जिसमें दुकान मालिक गिरेन्द्र के अलावा उसका लड़का सुशील और पांच अन्य बुरी तरह झुलसे थे जिसमें गिरेन्द्र की उपचार के दौरान 26 मार्च को ग्वालियर में मौत हो गई थी और सुशील की भी हालत नाजुक बताई जा रही है। इस मामले में गिरेन्द्र के बेटे रिंकू ने गांव के ही सात लोगों को नामजद कराते हुये हत्या के प्रयास समेत कई संगीन धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया था। गिरेन्द्र की मौत के बाद पुलिस ने आनन फानन दो आरोपियों रवीन्द्रकुमार अहिरवार तथा धर्मेन्द्र बरार को गिरफ्तार कर जेल भी भेज दिया है। मामले की छानबीन की गति जिस ओर है उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी पर ही पूरा फोकस जमाये है। कांड के मूल में क्या है, इस विंदु पर न तो पुलिस बात ही करने को राजी है और न ही इस संबंध में उसकी जांच आगे बढी है अलबत्ता घटना के दूसरे दिन गांव पहुंचे एसपी अमरेन्द्रप्रसाद सिंह ने जरूर यह जानने की कोशिश की थी कि आगजनी की घटना कैसे घटी, लेकिन गांव बालों के मौन ने सही कहानी को सामने आने ही नहीं दिया। यह अजीब ही है कि घटना की सही कहानी लगभग सभी को पता है लेकिन ‘कौन पचड़े में पड़ेÓ ने सभी के मुंह सिल दिये हैं जिसके चलते कई निर्दोषों के जेल जाने का इंतजाम जरूर हो गया है। इस पूरे मामले में होना तो यह चाहिये था कि पुलिस असल बजह तलाशने की कोशिश करती और फोरेंसिक टीम को बुला कर मौके की गहन पड़ताल कर वहां से सबूत जुटाती। लोगों की आशंका भी गलत नहीं है कि घटनाक्रम जिस ओर मुड़ा है उसने पुलिस के भी हाथ पांव बांध कर रख दिये हैं और उसके लिये आरोपियों की गिरफ्तारी भर शेष करने को बची है। अगर ऐसा होता है तो कांड का रहस्य आगे भी रहस्य ही रह जाने बाला है।
इंसेट में-
नामजदगी पर भी उठ रहे हैं सवाल
कोंच। मृतक पक्ष की ओर से जिनके खिलाफ हत्या के प्रयास में नामजद मुकदमा लिखाया गया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं, बताया गया है कि नामजद आरोपियों में से एक तो महीनों से बाहर है। सूत्र बताते है कि घटना के वक्त भी वह मौके पर नहीं मौजूद था बल्कि रोटी कमाने के लिये बाहर अन्य प्रांत में था। जैसा कि बातचीत से पता चलता है कि यह बात पुलिस के भी संज्ञान में है लेकिन फिलहाल वह भी कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है। सूत्रों की अगर मानें तो नामजद कराये गये आरोपियों में से गौरीशंकर उर्फ कल्लू का बेटा मानवेन्द्र रोजी रोटी कमाने के लिये गुजरात में कई महीनों से है और घटना के दौरान उसकी यहां मौजूदगी भी नहीं है। ऐसी स्थिति में लगता तो यह है कि सारे विरोधियों को इस संगीन वारदात में लपेटने की कोशिश की गई है।





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