उरई। अपने दोस्तों में छोटू के नाम से लोकप्रिय है लेकिन उनका काम सचमुच बहुत बड़ा है। जब उन्हें मालूम हुआ कि खाकी वर्दी लावारिस लाशों का निस्तार एहतराम के साथ करने की बजाय उसे नदी नालों में फेंक देती है तो इंसानियत इन्हें कुछ करने के लिए कुरेदने लगी। इसी के साथ गैरों के पार्थिव शरीर का पूरे सम्मान के साथ कराने का जुनूनी बीड़ा उन्होंने उठाया। वक्त के साथ 20 वर्ष से ज्यादा गुजर चुके हैं और पांच सौ लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करा चुके जमाल छोटू की पहचान इस मुहिम के चलते लावारिस लाशों के मसीहा के रूप में बन चुकी है।
पुलिस विभाग को पूरी यूपी में बैटरी सप्लाई का बड़ा करोबार चलाने वाले जमाल छोटू की दिनचर्या बहुत व्यस्त है। लेकिन इंसानियत उनके अंदर कूट-कूट कर ऐसी भरी है कि अपने अनोखे संकल्प को पूरा करने की जिम्मेदारी को वे पहली प्राथमिकता समझते हैं। दो दशक से ज्यादा वक्त बीत चुका है जब उन्होंने एक सिपाही को एक रिक्शे पर लावारिस लाश लेकर गुजरे देखा तो पूंछ बैठे कि अकेले किसी मिटटी (शव) का निस्तार कैसे कर लेते हो। जबाब मिला कि न तो साथ में और लोग हैं और न अंतिम संस्कार का पूरा खर्चा 90 रुपये मिलने है तो कायदे-कानून से इसका जिम्मा कैसे निभा पायेगें। झंझट खत्म करने के लिए वह तो लाश को गोहानी नाला के पास फेक कर चला आता है। इस जानकारी ने जमाल को झिझोंड़ दिया। वे खुद गोहानी नाला पर पहुंचे तो उन्हें तमाम अस्थि-पंजर पड़े दिखे जिन्हें कुत्ते नोच रहे थे। इस तस्वीर ने जमाल की जिंदगी को बदल दिया। उन्होंने अपने साथियों तथा ग्राहकों से लावारिस लाशों के गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार का जिम्मा उठाने के बारे में बात की तो बैंक कर्मचारी पीके पाठक ने उनके कंधे से कंधा मिला लिया। दोनों तय किया कि सभी लावारिस लाशों का उनके धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार करेगें। दोनों ने पोस्टमार्टम हाउस पर संपर्क करके लावारिस लाश की जानकारी उन्हें देने का निवेदन किया। इसी दौरान सुप्रसिद्ध चिकित्सक डा. अशोक अग्रवाल को जानकारी हुई तो उनके जरिये कारवां बढ़ने लगा और देखते-देखते मुमताज अंसारी, मुख्तार अहमद, रविंद्र पांचाल, अभय चंद्र गुप्ता, मुकेश याज्ञिक जैसे तमाम नाम जुड़ गये। अभियान को संस्थागत रूप देते हुए हज-कर्म कमेटी का गठन किया गया। इसके बाद से जब भी लावारिस लाश की सूचना मिलती है जमाल और उनके साथी अपनी-अपनी जेब से रकम का इंतजाम करके जिस धर्म के व्यक्ति की लाश होती है उसके रीति-रिवाज के मुताबिक उसका अंतिम संस्कार कराते हैं।
जमाल बताते है कि परोपकार के रास्ते पर चलते हुए कई बार दिक्कतें भी आईं। एक बार ट्रेन से कटा अज्ञात शव आया। हिंदू लाश होने के कारण विधि-विधान से दाह संस्कार करा दिया गया। कुछ दिन बाद उक्त दिवंगत व्यक्ति के परिजन खोजते-खोजते आ पहुंचे तो आभार जताने की बजाय उन्होंने कमेटी पर हत्या का आरोप लगा दिया। किसी तरह प्रशासन के हस्तक्षेप से जान छूटी। इसी प्रकार भ्रम के कारण जालौन के पास भिटारा गांव के ब्राह्मण का शव कब्रिस्तान में दफन हो गया। शिनाख्त होने पर जब पता चला कि मृतक हिंदू था तो परिजन लाश निकलवाने कब्रिस्तान पहुंचे वहां बबाल होने की नौबत आ गई। इस नाजुक मौके पर मरहूम मौलाना बशीर अहमद कादरी ने मदद की जिससे कब्र खुदवाकर शव को ब्राह्मण परिवार के सुपुद्र किया जा सका। गत शुक्रवार को एक साथ तीन हिंदू लाशें आ गई थीं जिनका अंतेष्टि कराने के लिए जमाल और उनके साथियों को पूरे दिन अपना काम-धाम बंद रखना पड़ा। जमाल छोटू के इस काम को प्रदेश स्तर तक नवाजा जा रहा है। गत दिनों लोकमत नाम की एक संस्था के तत्वावधान में लखनऊ में हुए बड़े जलसे में केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने उनको सम्मानित किया तांकि और लोगों को इस तरह के कामों के लिए प्रेरित किया जा सके।

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