0 संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रकाशित कराई गई पुस्तक में कई अनछुए पहलू उजागर
उरई। देश के चर्चित शहरों पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन सांस्कृतिक शोध एवं प्रशिक्षण केंद्र के माध्यम से शहरों की अनकही दास्तान के नाम से किताबों की एक श्रंखला का प्रकाशन प्रारंभ किया गया है। आरंभ में इसमें देश के 9 प्राचीन शहरों को लिया जा रहा है। जिसमें पहली किताब कालपी पर उरई के लेखक अयोध्या प्रसाद कुमुद की विमोचित हुई है।
संस्कृति मंत्रालय का यह एक अभिनव उपक्रम है। जिससे देश के प्राचीन गौरव की झांकी सामने आयेगी। 75 वर्षीय कुमुद ने बताया कि कालपी के पास भारतीय पुरातात्विक सर्वे ने 10 वर्ष पहले उत्खनन कराया था। जिसमें 45 हजार वर्ष पहले के हाथियों के जीवाश्म मिले थे। इन हाथियों के दांत 7 फीट लंबे होते थे और व्यास 20 सेमी रहता था। इतने विशाल हाथियों की कल्पना तक आज दुर्लभ है।
जालौन जिले की ऐतिहासिक पौराणिक नगरी कालपी के बारे में पुस्तक में कई ऐसी बातें हैं जो अभी तक अनछुई थीं। कुमुद ने बताया कि तुगलक काल में कालपी साम्राज्य जगम्मनपुर के पास कनारखेड़ा से सूर्य मंदिर तक फैला हुआ था। उन्होंने एक नया रहस्योदघाटन किया कि उस समय साम्राज्य भले ही कालपी के नाम पर था लेकिन कालपी वस्तुतः छोटा सा गांव भर था। जबकि कनारखेड़ा जो कि आज गुमनाम गांव के बतौर अवशेष रह गया है। तब वहां की समृद्ध राजधानी थी। हर्ष के समय कालपी कन्नौज साम्राज्य का हिस्सा रही। कालपी के करीब गुलौली के सूर्य मंदिर में उस समय भवभूति के नाटक का पहला मंचन किया गया था। उस समय किस राज्य की सेना सबसे बड़ी है इसका मूल्यांकन उसमें शामिल हाथियों की संख्या के आधार पर होता था। हर्ष की सेना में सर्वाधिक हाथी थे। इसलिए उसकी सेना सबसे बड़ी मानी गई थी। खास बात यह है कि हर्ष की सेना में शामिल हाथी कालपी के होते थे।
कालपी का जंगल विशाल हाथियों के लिए प्रसिद्ध था। मानिकपुर में इन हाथियों की बिक्री की मंडी सजती थी। जिसमें सारे बड़े साम्राज्यों के प्रतिनिधि खरीद के लिए पहुंचते थे। बाबर, हुमायुं और अकबर जलमार्ग से कालपी के जंगलों में हाथियों का शिकार खेलने के लिए आते थे। क्योंकि मुगल हाथियों के शिकार के बहुत शौकीन थे।
मौर्य काल में चंद्रगुप्त मौर्य के समय भारत का व्यापार पश्चिमी देशों से बढ़चढ़ कर होता था। भारत के रेशम की पश्चिमी देशों में सबसे ज्यादा मांग थी। कहा जाता है कि पश्चिम की सुंदरियां पिया से पहली बार मिलन के लिए जब जाती थी तब रेशम ही पहनती थीं। मालवा से पेशावर होते हुए पश्चिमी देशों के लिए जो मार्ग था उसका नाम ही सिल्क रूट यानि रेशम मार्ग हो गया था। इसमें कालपी महत्वपूर्ण पड़ाव था। जहां सिल्क रूट के जलमार्ग और सड़क मार्ग का संगम था।
उन्होंने बताया कि उन दिनों नदी परिवहन को जल दस्युओं से बड़ा खतरा था। इसलिए कालपी के बड़े सेठ गुंडे पालते थे जो जल दस्युओं का मुकाबला कर सकें। इन गुंडों की बड़ी-बड़ी हवेलियां थीं। सुभान गुंडा की हवेली जैसी कई प्रसिद्ध गुंडों की हवेलियों के अवशेष कालपी में आज भी मौजूद हैं। यहां माल के भंडारण के लिए बड़े-बड़े तलघर भी होते थे। कालपी में नावों के बेहद उत्कृष्ट पाल बनते थे। कालपी की रुई भी बहुत उम्दा मानी जाती थी जो मैनेचेस्टर में खपती थी। कालपी का संबंध महाभारत के रचियता वेद व्यास से भी रहा। उत्तरावर्त और दक्षिणावर्त के संगम के कारण इसका सामरिक महत्व भी था। जिसकी वजह से चंदेलों ने यहां अपना दुर्ग बनवाया था। बाद में मुगलों ने भी अपने सारे प्रमुख सूबेदार इसी अहमियत के नाते कालपी में मुकर्रर करने की परंपरा बनाई।
कुमुद कहते हैं कि कालपी आज भी संभावनाशील कस्बा है। पुस्तक में इस पर भी उन्होंने व्यापक रूप से प्रकाश डाला तांकि इसे नये तरीके से विकसित कर पुनः इसको वैभवशाली ठोस रूप देकर तैयार करने में सरकार को मदद मिल सके।






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