उरई। खरीफ की बुबाई का सीजन खत्म होने पर है और अभी तक राजकीय कृषि बीज भण्डारों से बीजों की उठान नगण्य हुई है। दूसरी ओर कृषि विभाग के सरकार को भेजे गये आंकड़ों में 40 प्रतिशत से कुछ अधिक बुबाई का दावा किया जा रहा है। जिसे लोग विश्वसनीय मानने को तैयार नहीं हैं। इस बीच बुधवार को पहली बार जिले में संतोषजनक बारिश हुई। लेकिन अब बारिश होने भी लगे तो बुबाई के प्रतिशत में कोई खास बढ़ोत्तरी नही होगी। मौसम वैज्ञानिकों की शुरूआती भविष्यवाणियों में अच्छे मानसून का खाका खीचे जाने से किसानों में काफी उम्मीदें थी लेकिन उन्हें एक बार फिर दगा खा जाना पड़ा है।
जिले में खरीफ की मुख्य फसलों में तिल, बाजरा, उर्द, ज्वार व अरहर शामिल है। कृषि विभाग द्वारा हाल ही में भेजी गई नवीनतम रिपोर्ट के मुताबिक तिल की बुबाई का लक्ष्य इस खरीफ सत्र में 36 हजार हैक्टेयर निर्धारित किया गया था। लेकिन 18 हजार हैक्टेयर में भी बुबाई नही हो पाई है। दूसरी ओर बाजरा के 19 हजार हैक्टेयर के लक्ष्य के सापेक्ष केवल 6 हजार हैक्टेयर में बुबाई हो पाई है। ज्वार की बुबाई की हालत तो और ज्यादा दयनीय है। 9 हजार हैक्टेयर के लक्ष्य के सापेक्ष केवल 21 सौ हैक्टेयर में बुबाई हुई है।
उर्द की बुबाई के लिए 13 हजार हैक्टेयर का लक्ष्य निर्धारित किया गया था जिसमें से लगभग साढ़े चार हजार हैक्टेयर ही बोया गया है। अरहर की बुबाई भी 10 हजार हैक्टेयर के मुकाबले केवल 5 हजार हैक्टेयर हुई है। मूंग 2 हजार हैक्टेयर के मुकाबले लगभग 800 हैक्टेयर मात्र में बोई जा सकी है।
अन्य जिन्सों में धान का 1 हजार हैक्टेयर रोपाई का लक्ष्य था। जिसमें से 600 हैक्टेयर मात्र रोपा गया है। सोयाबीन 200 हैक्टेयर के सापेक्ष 130 हैक्टेयर में बोई जा सकी है। ज्वार और बाजरा की बहुत कम बुबाई हो पाने से पशुधन संकट भी गहराने के आसार दिखाई देने लगे हैं। जमीनी किसानों का कहना है कि जब सरकारी आंकड़ों का आलम यह है तो वास्तविकता कितनी दयनीय होगी इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है कि किसानों की आमदनी दोगुनी करने की सरकार की मंशा में बुंदेलखंड में मौसम बड़ी रुकावट पैदा करने में कोई कसर नही छोड़ रहा।

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