उरई। उल्टा नाम जपत जग जाना, बाल्मीकि भये ब्रह्म समाना। महर्षि बाल्मीकि को केवल हिंदुओं के प्रमुख ग्रंथ रामायण की रचना के कारण ही ब्रह्म के समान दर्जा नही दिया गया बल्कि उन्होंने मानव-मानव में समानता के सिद्धांत को स्थापित कर शिक्षा का अधिकार भी दिया। देश की बड़ी आबादी आज भी शिक्षा से वंचित है। इसके लिए केंद्र सरकार को शिक्षा का अधिकार कानून लागू करना पड़ा, परंतु जालौन जिले में पौराणिक काल में ही यह अधिकार प्राप्त था। बाल्मीकि ने यहां स्थित अपने आश्रम के द्वार अछूतों व जनजातियों के लिए भी खोले थे। इसी कारण स्वच्छकार समाज उन्हें भगवान के रूप में पूजता है और अपनी जाति के लिए उसने संत बाल्मीकि के नाम का वरण कर लिया है। बाल्मीकि आश्रम में ही पति विछोह की मारी माता सीता को आसरा मिला और भगवान राम के पुत्र लव-कुश की दीक्षा हुई।
बहुत कम लोग जानते हैं कि महर्षि बाल्मीकि का आश्रम जनपद जालौन में कालपी से हमीरपुर मार्ग पर स्थित बबीना गांव में था, पर पता नहीं कैसे आगे चलकर ऐसे महान संत का उक्त पुण्य स्थल गुमनामी में खो गया। हालांकि 1909 में पहली बार प्रकाशित हुए ‘जालौन गजेटियर’ के 1989 के नवीनतम संस्करण में पृष्ठ संख्या 85 पर यह दर्ज है कि उरई से 47 किमी. दूर बबीना में सुप्रसिद्ध ऋषि बाल्मीकि की कुटिया थी। 15 हजार की आबादी वाले इस गांव के लोग यहां के तमाम रहस्यों से अनभिज्ञ हैं। 80 वर्षीय जगत सिंह बताते हैं कि काफी समय पूर्व यहां बासों का जंगल था। दीमक की बड़ी-बड़ी बामियां होती थीं। पूर्वजों से उन्होंने सुना है कि यहां पर बाल्मीकि आश्रम और गुरुकुल था। वे बताते हैं कि आश्रम के बाहर विशालकाय तालाब था। करीब 10-12 एकड़ भूमि में फैला यह तालाब अब अतिक्रमण से सिकुड़ गया है। यहीं के 60 वर्षीय योगेंद्र सिंह ने बताया कि इस तालाब का पानी गंगाजल जैसा ही था। इसको लेकर कथा है कि महर्षि स्नान के लिए गंगा नदी पर जाते थे परंतु गंगा यहां से दूर थी। इस कारण एक रात गंगा मैया ने उनको स्वप्न दिया और कहा कि आश्रम के पास ही उन्हें एक स्थान पर खड़ाऊं और छड़ी उतराती मिलेगी और वे स्वयं वहां पर वास करेगीं। वे बताते हैं कि अपने बचपन में उन्होंने स्वयं देखा है कि इस तालाब में गंगा की तरह ही रेत होती थी और उसका पानी काफी निर्मल होता था। उसमें गंगा की तरह ही ढाई-ढाई क्विंटल की मछलियां तक पायी जातीं थीं। यह अलग बात है कि अब तालाब के नाम पर केवल कीचड़ नजर आता है।

नहीं हट सका रहस्यों से पर्दा
महर्षि बाल्मीकि स्थल से जुड़ा होने के कारण हिंदुओं के लिए तीर्थ समान बबीना रहस्यों से परिपूर्ण है। पौराणिक युग के बाद यहां खंगारों का कब्जा रहा। इसके बाद यहां पर पूरी बस्ती की जगह नया गांव बसा। इस बात की सच्चाई आज भी दिखार्यी देती है। यहां के प्रमोद कुमार उर्फ गोपाली सिंह ने बताया कि उन्होंने अपना मकान बनवाने के लिए खुदाई करायी तो नीचे एक पूरा बना मकान निकल आया और इसके बाद वे उसी में रहने लगे हैं। इसी तरह से यहां पर एक साठिया के नाम से कुआं है। यहा कुआं न तो कभी सूखता है और न कभी भरता है। इसके पास जाते ही आपको सुरम्य संगीत का अहसास होगा जो कि इसमें फूटे झरनों से निकलता है। इन झरनों का रहस्य कोई नही जान पाया। इसका पानी कभी खराब नही हुआ। यह कितना पुराना है इसका भी कोई पता नही है।

आस्था और शोध का केंद्र नहीं बन पाया बबीना
महर्षि बाल्मीकि के आश्रम वाला बबीना न तो आज तक आस्था का केंद्र बन पाया और न ही इतिहासकारों की नजर यहां पड़ी। आश्रम तो इतिहास की उथल-पुथल में काफी पहले मिट चुका था। 1961 में तत्कालीन जमींदार ज्ञानसिंह ने उस स्थल का जीर्णोद्धार कराया जिसे महर्षि का समाधि स्थल बताया जाता है। इसके बाद यहां पर उनकी एक मूर्ति और वे खड़ाऊं भी रखी गयीं जो उन्हें तालाब के पास मिली थीं। नवदुर्गा, बुढ़वा मंगल को यहां मेला भी लगता है। पहले बंगाली किरचन बाबा यहां पर पूजा-पाठ करते थे परंतु उनके समाधि लीन होने पर मुहम्मदाबाद (सीतापुर) के रामदास अग्रवाल ने यह जिम्मेदारी संभाली। अब यहां पर रामदरबार और शिव मंदिर भी है।

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