उरई। बुंदेलखंड  के जालौन जिले में बेसिक शिक्षा की बदहाली की कहानियों का कोई अंत नही है। चूंकि सरकारी स्कूलों में गरीब परिवारों के नौनिहाल पढ़ते हैं इसलिए उनसे जुड़े सरोकार की शासन और प्रशासन में बैठे लोगों के लिए कोई अहमियत नही है।
डकोर विकास खंड का कुठौंदा गांव जिला मुख्यालय के नजदीक होने के कारण जिला प्रशासन की नाक के नीचे माना जाता है। लेकिन यहां भी बेसिक शिक्षा की दुर्दशा का उद्धार नही हो पा रहा है। गांव के प्राथमिक विद्यालय की चाहरदीवारी नही बनवाई गई है जिससे लोगों ने विद्यालय परिसर को गाय-भैंस का तबेला बना दिया है। विद्यालय के अध्यापक पढ़ाना शुरू करने के पहले इसके चलते गोबर उठाने को मजबूर रहते हैं।
सफाई कर्मचारी भी सरकारी स्कूलों को लावारिस मानते हैं। इसलिए इस स्कूल में सफाई कर्मचारी यदाकदा ही जाता है और वह भी अध्यापकों द्वारा गोबर उठाने के बाद। इसके उपरांत वह खानपूर्ति के लिए झाड़ू लगाकर चला जाता है। विद्यालय के इंचार्ज प्रधानाध्यपक अरविंद कुमार स्वर्णकार ने बताया कि पहले विद्यालय की चाहरदीवारी बनी थी जो जर्जर होकर अप्रैल के महीने में ढह गई थी। इसके बाद उन्होंने विभाग के अधिकारियों को कई बार चाहर दीवारी निर्माण के लिए लिखा लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई कदम नही उठाया गया है। उन्होंने यह भी ध्यान दिलाया कि स्वयं मुख्यमंत्री ने विद्यालयों की चाहरदीवारी के लिए व्यक्तिगत रूप से निर्देश दिये थे जिसके क्रम में गत वर्ष 12 जून को उनके विशेष सचिव अजय कुमार सिंह ने विभाग के लिए इस वास्ते एक शासनादेश जारी किया था लेकिन यह आदेश कागजों में सिमट कर रह गया है। उक्त विद्यालय के फर्श भी जहां-तहां उखड़ा हुआ है जिसकी मरम्मत पर कोई ध्यान नही दिया जा रहा।
माधौगढ़ ब्लाक के खुदातपुरा प्राथमिक विद्यालय का हाल तो और खराब है जहां बच्चों के लिए पास में एक तालाब होने से खतरा बना रहता है। चूंकि इस विद्यालय में भी चाहरदीवारी नही है। तालाब के गंदे पानी के बीच ही हैंडपंप लगा है। जिससे बच्चों को प्यास बुझाने के लिए कहने का मतलब उन्हें बीमारी के मुंह में धकेलना है। फिर भी अधिकारियों द्वारा गौर नही किया जा रहा है। विद्यालय के प्रधानाध्यपक धर्मेंद निरंजन और सहायक अध्यापक गीतेश कुमार ने बताया कि विद्यालय में 34 बच्चें हैं जिनमें 25 अनुसूचित जाति से हैं। शायद इसीलिए इस पर गौर फरमाने की जरूरत प्रशासन को महसूस नही हो रही है।
जालौन ब्लाक के भदवां स्थित प्राथमिक विद्यालय की कहानी भी नजर डालने लायक है। कई महीने पहले इस विद्यालय के प्रधानाध्यापिका कमलेश कुमारी को अनियमितताओं के कारण निलंबित कर दिया गया था। जिसके बाद वे बिना चाबी सौपें गायब हो गई थीं। उनके स्थान पर भेजे गये शिक्षक जैसे-तैसे विद्यालय खोल पाये लेकिन अभी तक सारे अभिलेख उन्ही के कब्जे में हैं। उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश भी दिये गये थे। लेकिन आज तक एफआईआर दर्ज नही हुई है। जाहिर है कि जब शिक्षक इतने बेलगाम हों तो उनसे सही ढंग से डयूटी कराने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। भले ही इसके कारण बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ होता रहे।

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