
जब जागो तभी सबेरा, देर आयद दुरुस्त आयद संघ प्रमुख मोहन भागवत के आरक्षण मुददों पर बदले विचारों को लेकर कुछ भी कह लो लेकिन संघ के रुख में आया प्रगतिशील मोड़ शुभ संकेत है जिसका स्वागत होना चाहिए। हर देश और समाज परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरता है। कई बार इन बदलावों को लेकर परंपरागत सांचे में मजबूती से ढला समाज सहज नही रह पाता। खास तौर से समाज के शासक वर्ग को शुरूआत में परिवर्तन स्वीकारने में अपने अस्तित्व की समस्या नजर आने लगती है। इस डर से वे हठधर्मी रवैया अपनाने लगते हैं। लेकिन भारतीय समाज ने समग्र तौर पर इस विशेषता को दर्शाया है कि यहां बिना किसी रक्तपात के बाजिब परिवर्तन ग्राह्य हो गये। आरक्षण के प्रावधान को जब लाया गया था उस समय तो देश का माहौल बेहद रूढ़िवादी था। लेकिन इसके कारण किसी व्यापक विद्रोह की नौबत नही आयी थी। भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था में जाटव समाज को अछूत की श्रेणी में रखा गया था। संपत्ति और पद का अधिकार जाटव समाज को देने की कल्पना नही की जा सकती थी। विधायी संस्थाओं में जब सीटे आरक्षित होने लगी तो तथाकथित अछूत समाज या दलितों में से सांसद विधायक बनना मजबूरी हो गया था। लेकिन इनमें उपलब्ध व्यक्तित्व संपन को अवसर देने की बजाय राजनैतिक दल सामाजिक वर्ग सत्ता के दबाब की वजह से दीनहीनों को आगे करके कोटा पूरा करते थे जो अपना मुंह खोलना नही जानते थे। इसी माहौल में कुछ ही दशकों में जाटव समाज की मायावती का देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री के तौर पर वरेण्य हो जाना ऐसा परिवर्तन था जिसे किसी महान क्रांति से कमतर नही आंका जा सकता। पहली बार तो हो सकता है कि राजनैतिक परिस्थितियों के कारण संजोग से उन्हें यह मौका मिला हो। लेकिन बाद में उनके नेतृत्व की सभी वर्गों में स्वीकार्यता की वजह से चैथी बार वे अकेली दम पर मुख्यमंत्री बनीं।
ऐसा होने के पहले जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करके अनुसूचित जातियों और जनजातियों के अलावा अन्य पिछड़ों को आरक्षण की व्यवस्था की गई थी तो देश में एक बारगी गृह युद्ध जैसे हालात पैदा होने लगे थे। ऐसा लगा था कि सामाजिक परिवर्तन को लेकर देश की असल वर्ग सत्ता का धैर्य अब चुक गया है। बहरहाल यह उफान भी क्षणिक सिद्ध हुआ। कुछ ही वर्षों में स्थिति न केवल संभल गई बल्कि मायावती और मुलायम सिंह जैसे नेता उनकी जाति की सामाजिक स्थिति को भुलाकर देश की शक्तिशाली राजनीतिक शख्सियत के रूप में सर्वमान्य तौर पर मान्यता पा सके।
ल्ेकिन सदियों की वर्ण व्यवस्था पर आधारित भारतीय समाज की सभी रूढ़ियों की गांठे खुलने में अभी बेहद कसर बांकी है, भारतीय जनता पार्टी में तो अभी तक रिवाज है कि अनुसूचित जाति, जनजाति कोटे में उन्हीं को अवसर दिया जाता है जो विनीत या बेचारे हों। विनीत से अर्थ जिन्हें सामजिक वर्ग सत्ता की कठपुतली की अपनी नियति को लेकर कोई ओज्र न हो। सूरज भान को भाजपा की सरकार के समय जब उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था उस समय पार्टी का नेतृत्व उनके द्वारा स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता दिखाने पर बौखला गया था। जबकि उनकी पृष्ठभूमि खांटी आरएसएस स्वयं सेवक की थी। विनीत आचरण की लक्ष्मण रेखा अपनी मुखरता से लांघने के कारण सूरज भान भाजपा में कुलद्रोही की तरह देखे जाने लगे थे और अंततोगत्वा उनको उत्तर प्रदेश से चलता कर दिया गया था। उदित राज और कौशल किशोर जैसे सांसद आयातित हैं। इसलिए उन पर तो वैसे भी भरोसा नही किया जा सकता। उस पर तुर्रा यह है कि उनकी खुद की एक पहचान है। भाजपा में ऐसे दलित नेताओ ंको सिर पर चढ़ाकर जोखिम मोल लेने की परंपरा नही है। इसीलिए ये लोग दलित कोटे से भाजपा की सरकार में मंत्री बनाने के लिए अर्ह नही माने जा सके।
भाजपा की दिशा संघ के कुतुबनुमा से निर्धारित होती है जो वर्ण व्यवस्था में आस्थावान संगठन है। इसलिए भाजपा जब सरकार में आई तो सामाजिक परिवर्तनों की उल्टी गिनती देखी जाने लगी थी। संघ प्रमुख ने भी बिहार विधानसभा चुनाव के समय आरक्षण को हटाने के विचार की वकालत कर डाली थी। सोशल मीडिया पर आरक्षण के खिलाफ जाने कितने लश्कर भाजपा की सरकार बनने से प्रोत्साहित होकर टूट पड़े जो अभी तक जारी हैं। इस दौर में दलितों को सबक सिखाने की घटनाओं में भी तेजी आ गई। दूसरी ओर बिहार विधानसभा में भाजपा की पराजय का नतीजा जब सामने आया और उसे तमाम हलकों ने संघ प्रमुख के आरक्षण विरोधी बयान से जोड़ा गया तब संघ को पहली बार अपनी विचारधारा को लेकर झटका महसूस करना पड़ा। उत्तर प्रदेश में अथाह बहुमत हासिल करके पदारूढ़ हुई भाजपा सरकार को नये-नवेलेपन के दौर में ही सपा-बसपा गठबंधन के कारण लगातार तीन महत्वपूर्ण लोकसभा उपचुनाव हारने पड़े जिनमें मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा खाली की गई गोरखपुर संसदीय सीट भी शामिल थी तो देश के वर्तमान की वस्तु स्थिति और वर्ण व्यवस्था की प्रासंगिकता को लेकर आंखे खोलने की जरूरत संघ को और सिददत से महसूस हुई। दरअसल नदी के किनारे खड़े होकर किसी सयाने से तैराकी के गुण नही सीखे जा सकते जब तक कि उसके लिए पानी में उतर कर अभ्यास न किया जाये। जिसमें कि तैरने की मुश्किलें पता चलती हैं। संघ के हृदय परिवर्तन की कहानी इस उदाहरण से जुड़ी है। जब संघ के लोगों के हाथ में सत्ता आई तब उसे पता चला कि जमाना कितना बदल चुका है और व्यवस्था के संचालन के लिए पुरानी मान्यताएं और पैमाने कितने कामयाब रह गये हैं। संघ को समझ में आया कि यह जो लोकतंत्र है इसमें समानता और बंधुत्व की नीति का पालन किये बिना सर्वाइवल संभव नही है। इसलिए आरक्षण आदि पर अपने बौद्धिक में बदले-बदले से नजर आये सरकार यानि संघ प्रमुख। उन्होंने आरक्षण को समर्थन देकर शासन और प्रशासन में सभी वर्गों की भागीदारी की नीति पर मुहर लगाई जो एकदम बाजिब है।
लेकिन यह नीति गृह युद्ध का अखाड़ा न बन जाये इसलिए नये परिवर्तनों को सर्वानुमति से आत्मसात किया जाना भी वक्त की मांग है। संघ जाने-अनजाने में इसी पहल का माध्यम बना है। इसका प्रभाव समूचे सामाजिक सत्ता वर्ग पर होगा। चूंकि संघ उसका प्रतिनिधि संगठन है। यह भी महत्वपूर्ण हैं कि एससी एसटी एक्ट के बारे में सुप्रीमकोर्ट के फैसले में सरकार द्वारा किये गये संसोधन के खिलाफ जब सवर्ण रौद्र रूप दिखा रहे हैं और उनके आक्रोश की जद में केवल एससी एसटी एक्ट ही नही आरक्षण भी है तब संघ ने आरक्षण की नीति की ताईद करने में संकोच नही किया। आरक्षण के प्रावधान के बारे में सवर्णों की गलतफहमी दूर करने के लिए कभी कोई होमवर्क नही हुआ इसलिए इनमें अचेतन में इस व्यवस्था के खिलाफ बसी घृणा मौका मिलते ही सतह पर विस्फोट की वहज बनने लगती है। इसके निवारण का जिम्मा संघ को उठाना चाहिए। संघ को अभियान चलाना चाहिए जिसमें सवर्णों को समझाया जाये कि अगर आप बहुतायत समाज को अपनी जिद में अलग कर देगें तो आपकी शुद्ध जनसंख्या के अनुपात में नौकरी की संख्या उससे बहुत कम रह जायेगी जो अभी आपको हासिल है। दूसरी ओर आरक्षित वर्ग में भी एक चुनौती भरने की जरूरत है कि योग्यता किसी जाति, समुदाय या वर्ग की बंधक नही है। पर आरक्षण को अपनी योग्यता के निखार की सीमा उन्होंने बना रखा है। जिससे वे इस मामले में दूसरों के साथ बराबरी की होड़ में रुचि नही ले रहे। बाबा साहब अंबेडकर जब तक देश में पढ़े औसत से नीचे के विद्यार्थी रहे। क्योंकि यहां का माहौल उनके लिए दमनकारी था। अमेरिका पहुंचने पर जब उन्हें खुला माहौल मिला तो उन्होंने सबसे आगे होने की ऐसी ललक दिखाई कि आज कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनकी प्रतिमा विश्वविद्यालय के इतिहास के अभी तक के सबसे प्रतिभाशाली छात्र के रूप में स्थापित हुई है। जिससे योग्यता और श्रेष्ठता के लिए भारत में प्रचलित नस्लीय सिद्धांत को मुंह तोड़ जबाब मिला है। दलित दूल्हे को घोड़े पर चढ़कर बारात निकालने से रोकने की कासगंज जैसी दुराग्रही घटनाओं के खिलाफ अभी समाज का कोई वर्ग आगे नही आता। जिससे समानता और बंधुत्व के मूल्यों से उसका दुराव उजागर होता है। संघ को ऐसी घटनाएं होने पर भी तत्परता पूर्वक मोर्चा संभालना चाहिए जिससे सामाजिक सौहाद्र को मजबूत करने का उसका उददेश्य और वेग से फलीभूत होगा।






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