उरई। भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टोलरेंस का दावा करने वाली योगी सरकार के राज में गबन के खुले मामले की अनदेखी कुछ और ही कहानी कह रही है। मामला लोक निर्माण विभाग का है। जिसमें वेतन निकासी के कागजों में फर्जीबाड़ा करके विभागाध्यक्ष और बाबू ने महीनों तक डिफरेंस हड़पा। पक्के सबूत पेश किये जाने के बावजूद इस मामले में शासन और प्रशासन में जूं तक नही रेंग रही।
यह मामला बानगी है मौजूदा सरकार में डंके की चोट पर हो रहे भ्रष्टाचार की। लोक निर्माण विभाग के खण्ड-3 में खुलासा हुआ है कि अधिशाषी अभियंता की शह से सहायक अभियंता सहित आधा दर्जन कर्मचारियों का वेतन बाबू ट्रेझरी से बढ़ाकर लेता रहा। यहां तक कि अपना वेतन भी उसने 25578 रुपये के निर्धारित महीने से ज्यादा 43578 रुपये निकाला। वास्तविक वेतन और बढ़ाकर लिये गये वेतन के डिफरेंस को वह अपने खाते में जमा कराता रहा। संदेह है कि अधिशाषी अभियंता वीके राय को भी श्याम प्रजापति नाम का यह बाबू डिफरेंस में बंदरबांट करता था। जिसकी वजह से अधिशाषी अभियंता ने इस पर गौर करने की जहमत नही उठाई।
जब यह मामला खुला तो सबूत मिटाने के लिए लोक निर्माण विभाग तृतीय के कंप्यूटर से सारा रिकार्ड डिलीट कर दिया गया। दरअसल रावगंज निवासी आशीष कुमार ने अभिलेखों सहित इसकी शिकायत की तो मामला पकड़ते देख यह हरकत करा दी गई। गनीमत यह है कि इसके बावजूद ट्रेझरी में सहायक अभियंता राकेश कुमार मिश्रा, वरिष्ठ सहायक गजेंद्र पाल सिंह, सहायक अभियंता हरदयाल अहिरवार, स्वयं आरोपित बाबू और सहायक अभियंता हरदयाल का वरिष्ठ सहायक श्यामजी प्रजापति, वर्क एंजेंट जगत प्रसाद मेट उमाकांत और चैकीदार रामस्वरूप के वास्तविक वेतन व उनके नाम पर आहरित धनराशि के डिफरेंस का सबूत ट्रेझरी के अभिलेखों में बरकरार है।
आशीष कुमार ने ट्रेझरी के रिकार्ड को भी शिकायत मेें संलग्न किया है। फिर भी कोई अधिकारी इसे संज्ञान में नही ले रहा। यह अंधेरगर्दी बेशर्मी की पराकाष्ठा न कही जाये तो क्या कही जाये।

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