कोंच-उरई । रामलीला महोत्सव के समापन के बाद रामलीला के अभिनय विभाग द्वारा एकांकी नाटक ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्रÓ का सफल मंचन गुरुवार की रात्रि रामलीला रंगमंच पर किया गया। नाटक के सभी पात्रों ने अपने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया और उन्हें रंगमंच पर जीवंत कर दिया। भावपूर्ण नाटक देख मैदान में मौजूद दर्शकों के नेत्र सजल हो उठे। उक्त नाटक में रघुवंश की वचन निभाने की परंपरा और सत्य के लिये अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने का संदेश दिया गया। बताया गया कि सत्य का मान रखने के लिये किस प्रकार स्वप्न में भी किये गये दान का मान रखने के लिये राजा हरिश्चंद्र ने अपना सर्वस्व त्याग दिया और स्वामिभक्ति की ऐसी मिसाल प्रस्तुत की कि अपने मृत पुत्र के अंतिम संस्कार के लिये पत्नी को भी बिना कर दिये मरघट में प्रवेश नहीं दिया।

कोंच रामलीला का अभिनय विभाग रामलीला महोत्सव के समापन के बाद ऐतिहासिक अथवा धार्मिक नाटक खेलने की परंपरा निभाता आ रहा है। पूर्णिमा की मध्य रात्रि श्रीराम राज्याभिषेक के साथ रामलीला महोत्सव का समापन हो गया था और गुरुवार की रात्रि रंगमंच पर ‘सत्यवादी राजा हरिश्चंद्रÓ की सफल प्रस्तुति अभिनय विभाग के रंगकर्मियों द्वारा दी गई। कथानक के अनुसार देवताओं के राजा इंद्र का दरबार सजा है और देवराज अप्सराओं के नृत्य का आनंद ले रहा है। इसी बीच उसका सिंहासन डोलने लगता है तो वह भयभीत हो उठता है और अपने पार्षदों से इसका कारण पूछता है। तभी देवर्षि नारद वहां इंद्रसभा में प्रवेश करते हैं और इंद्र को बताते हैं कि अयोध्या के प्रतापी और दानवीर नरेश हरिश्चंद्र सौवां यज्ञ कर रहे हैं और उनका यज्ञ पूर्ण होते ही वह इंद्रासन के अधिकारी हो जायेंगे। यह सुन कर इंद्र डर जाता है और महर्षि विश्वामित्र से हरिश्चंद्र का सत्य डिगाने का अनुरोध करता है। विश्वामित्र मोहिनी मंत्र का प्रयोग कर हरिश्चंद्र से स्वप्न में अयोध्या का सारा राजपाट दान में ले लेते हैं। हरिश्चंद्र विश्वामित्र की दक्षिणा चुकाने के लिये खुद को मरघट के सरदार डोम के यहां बेच देते हैं जबकि उनकी पत्नी तारामती और पुत्र रोहित राजा के यहां चाकरी करने लगते हैं। बीच बीच विश्वामित्र का चेला नक्षत्रा अपने हास्य अभिनय से दर्शकों को गुदगुदाते रहता है।

राजा की बेटी राजकुमारी बहुत ही निर्दयी और कर्कशा है, दिन रात काम लेने के बाद भी रानी तारा और रोहित को त्रास देती रहती है। एक दिन उसने रोहित को बाग से पुष्प चुनने के लिये भेजा तो वहां रोहित को बिषैले सर्प ने डस लिया जिससे उसकी तत्काल ही मृत्यु हो जाती है। तारा उसके मृत शरीर को लेकर मरघट जाती है ताकि उसका दाह संस्कार कर सके लेकिन वहां मरघट की रक्षा कर रहे हरिश्चंद्र अपनी पत्नी को बिना मरघट का कर चुकाये रोहित का क्रियाकर्म करने देने से मना कर देते हैं। तारा कर के रूप में अपनी साड़ी फाड़ कर उन्हें प्रदान करती है और रोहित का अंतिम संस्कार एक पिता होने के नाते उन्हीं को करने के लिये अनुरोध करती है। जैसे ही हरिश्चंद्र रोहित को मुखाग्नि देने के लिये उद्घत होते हैं, विश्वामित्र वहां प्रकट होकर उनका हाथ पकड़ लेते हैं और कहते हैं कि वह उनकी परीक्षा में सफल हुये। ऐसा कह कर वह रोहित को पुन: जीवित कर उनका सारा राजपाट लौटा कर उन्हें पुन: अयोध्या नरेश बना देते हैं। हरिश्चंद्र का किरदार श्रेष्ठ रंगकर्मी कृष्णकांत वाजपेयी, तारामती का अतुल शर्मा, विश्वामित्र का अभिषेक रिछारिया पुन्नी, नारद का हरफनमौला रंगकर्मी वीरेन्द्र त्रिपाठी, इंद्र का ओमप्रकाश उदैनिया, काशिराज का रामकिशोर पुरोहित, डोम का प्रवीण सिंघल, महर्षि बशिष्ठ का संतोष त्रिपाठी, राजकुमारी का गौरीशंकर झा, नक्षत्रा का सुशील दूरवार मिरकू महाराज, रोहित का अक्षत रिछारिया, मंत्री का साकेत सोनी आदि ने बखूबी निभाये। प्ले की कमेंट्री और पात्र परिचय कराने का दायित्व अभिनय विभाग के मंत्री नरोत्तमदास स्वर्णकार निर्वहन कर रहे थे। अभिनय विभाग के संरक्षक द्वय मोहनदास नगाइच, रमेश तिवारी, अध्यक्ष पुरुषोत्तमदास रिछारिया, उपमंत्री संजय सिंघाल, संजय सोनी, डॉ. मृदुल दांतरे, राहुल राठौर, ऋषि झा आदि नेपथ्य में सहयोग कर रहे थे। साज सज्जा, पाश्र्व गायन और दृश्यांकन में ब्रजमोहन तिवारी, संतोष तिवारी, मुन्नालाल अग्रवाल, पवन अग्रवाल, भोले अग्रवाल, रामसहाय सेठ, शंकरलाल अग्रवाल, गुड्डन पाटकार, अशोक बादशाह, मुन्ना लोहेबाले, राजू नीखर, रामबाबू अग्रवाल, रामविहारी सोहाने,सचिन अग्रवाल, रानू माली, हल्ले कुशवाहा आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 

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