* सरकारी किताबों में नहीं, आम जीवन में जीवंत बनाना होगा इस समृद्घ लोक बिधा को

कोंच-उरई । दीपावली का बुंदेलखंडी संस्करण ‘दिवारीÓ कई मायनों में काफी खास है, खासतौर पर इसमें जो बुंदेलखंडी परंपरायें समायोजित की गई हैं वे दीपावली को अन्य क्षेत्रों से अलग कर इसे खास पहचान देती हैं। उन्हीं में से एक है दिवारी नृत्य, पर्व तब तक पूरा नहीं कहा जा सकता जब तक कि उसमें दिवारी नृत्य का बघार न लगा हो क्योंकि यही बुंदेलखंड की खास पहचान है, लेकिन बदलते वक्त के साथ इस लोकप्रिय लोक परंपरा पर भी ग्रहण लगता जा रहा है और अब यह विलुप्त होने के कगार पर है। अगर इस विधा को जीवित बनाये रखना है तो इस कला के माहिरों को आगे आकर इसका प्रशिक्षण नई पीढी को देना होगा।

यह नृत्य प्राय: अहीर जाति के लोगों से परंपरागत रूप से जुड़ा है और समूचे बुंदेलखंड में इसका प्रचलन है। दिवारी नृत्य करने बाले नर्तक फुंदनादार रंग बिरंगे बंडी व जांघिया पहनते हैं व मुख्य नर्तक मोरपंख की मूठ हाथ में लिये रहता है जबकि बाकी पीठ की ओर जांघिया में खोंसे रहते हैं। उनके हाथों में डंडे होते हैं और कमर में घुंघरू धारण किये रहते हैं। दिवारी नृत्य की टेर बड़ी ही आकर्षक होती है और इसके गीत दो पंक्तियों के होते हैं, इसके प्रमुख वाद्य यंत्र ढोलक तथा नगडिय़ा होते हैं और गीतों के गाये जाने के बाद ही यह बजाये जाते हैं।

आज आधुनिकता की अंधी दौड़ और चकाचौंध में यह समृद्घ लोक बिधा लगभग समाप्त सी हो रही है और सिर्फ कुछेक ग्रामीण इलाकों में बूढे पुराने लोग इस लोक कला को आगे ले जाने की कोशिश में जुटे हैं। लोक कलाओं व ललित कलाओं में अभिरुचि रखने बाले बरिष्ठ रंगकर्मी अतुल शर्मा और संजय सिंघाल का मानना है कि इस कला के जानकार इसे अपनी आगे आने बाली पीढी को विरासत के रूप में सौंपें और इसका समुचित प्रशिक्षण देकर इसे जीवंत रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायें। इस पारंपरिक नृत्य को समुचित संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता को देखते हुये उत्तर प्रदेश का संस्कृति विभाग भी हालांकि काफी सचेष्टï है और आंचलिक लोक कलाओं व परंपराओं को अपनी पुस्तक में महत्वपूर्ण स्थान दिया है लेकिन केवल सरकारी प्रयास इस लोक बिधा को संजोये रखने में नाकाफी हैं और इसे आम जन द्वारा ही समुचित पोषण दिया जा सकता है तभी इसे पुन: जीवंतता प्रदान की जा सकती है।

 

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