उत्तर प्रदेश में जो हो रहा है उससे बहुत चीजें स्पष्ट होने लगीं हैं जो भविष्य में देश की रूपरेखा से जुड़ी हैं । ऐसा लग रहा है कि देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का स्वप्न देखने वालों की योजना चरणबद्ध ढंग से सफल हो रही है । इसमें अटल जी की भूमिका भी थी प्रस्तावना के तौर पर , इसके बाद नरेंद्र मोदी महत्वपूर्ण अध्याय रच रहे हैं लेकिन इसकी पूर्णाहुति योगी के राज्याभिषेक के साथ होगी । यह अलग बात है कि कहीं इसके पहले ही इन लोगों का शीराज़ा न बिखर जाये ।

काल के प्रवाह में बदलती दुनिया के साथ पुराने और आप्रसांगिक हो चुके धर्मग्रंथों की व्यवस्था कुछ लोगों को मृगमरीचिका की तरह लुभाती है जबकि यह आकर्षण अंतत्वोगत्वा वर्तमान विश्व बिरादरी में मिसफिट बनकर ऐसे देश को बर्बादी की ओर ले जाता है जिसका उदाहरण पाकिस्तान ही हो सकता है । इसीलिये इसके जन्मदाता मुहम्मद अली जिन्नाह इसे धार्मिक राष्ट्र की बजाय आधुनिक राष्ट्र के रूप में संवारना चाहते थे लेकिन हमारे पड़ोसी मुल्क के कट्टरपंथियों ने अपने जन्मदाता के ही विचार को नकार दिया । भारत में दकियानूसों की जाहिल जमात को कभी बहुत समर्थन नहीं मिल पाया लेकिन वे पड़ोसी मुल्क से सबक सीखे बिना बराबर इस देश को धार्मिक राष्ट्र राष्ट्र के रूप में बदलने की जद्दोजहद करते रहे । आखिरकार उन्हे कांग्रेस के कुशासन में भ्रष्टाचार , कालेधन और विदेशों में जमा धन जैसे मुद्दों को भुना कर आंशिक कामयाबी मिल गई है । इससे उन्हे इल्हाम हो गया है कि सत्ता के शिखर पर उनके पांव स्थायी रूप से जम चुके हैं जिसके कारण उन्हे अपने मंसूबे पूरे करने का पूर्ण अवसर उपलब्ध है |

अटल बिहारी वाजपेयी ने 1977 में जनता पार्टी सरकार के विदेश मंत्री रहते ही संघ के ख़िलाफ़ एक मशहूर अंग्रेजी दैनिक में लेख लिख डाला था लेकिन आरएसएस के लिए अपनी मंजिल की ओर कदम दर कदम बढ़ने की रणनीति के तहत उन्ही को अपनी योजनाओं के लिए केंद्रबिन्दु में रखना वाध्यत्ता थी । अटलजी को राजनीतिक बाजीगरी में निपुणता प्राप्त थी जिनके द्वारा गुजरात दंगों के समय तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म के पालन की नसीहत दिया जाना सुर्खियों में छाया रहा लेकिन यह बात भुला दी गई कि उन्होने निर्णायक मौके पर मुसलमानों को किसी के साथ शांति से न रह पाने का उलाहना दे कर गुजरातों दंगों को गोधरा कांड की अपरिहार्य प्रतिक्रिया ठहरा दिया था । इस तरह उन्होने बहुत सफाई के साथ मोदी का अचूक बचाव कर दिया था । अटल जी के ही माध्यम से राजनीतिक बिरादरी में भाजपा का अछूतपन ख़त्म हुआ जो उसकी अग्रसरता में गतिरोध समाप्त करने के लिए निहायत आवश्यक था । इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी मशाल थामने के लिए अगली कड़ी के रूप में थे लेकिन उन्होने हार्ड लाइन बदल कर अटलजी की अनुकृति के रूप में अपने को ढालने के लिए जिन्नाह के पुनर्मूल्यांकन की गफलत कर डाली जिससे उनकी गाड़ी पटरी से उतर गई जिससे आरएसएस को मोदी के रूप में तत्काल नया चेहरा तलाशना पड़ा । फिर भी यह मानना नादानी होगा कि मोदी प्रचंड हिंदुत्व के जयघोष के कारण रातोंरात राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर छा पाये ।

दरअसल उनकी सफलता के पीछे दूसरे कारक ज्यादा महत्वपूर्ण  हैं । अन्ना आंदोलन के समय भ्रष्टाचार के मुद्दे ने ज़ोर पकड़ना शुरू किया लेकिन कांग्रेस अपने गुमान में बनी रही जिससे स्थिति सुधारने की दिशा में कोशिश करने की बजाय उसने रसातल की ओर अपनी अग्रसरता जारी रखी । विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे ने इसमें आग में घी डालने जैसा काम किया । मोदी की पिछड़े वर्ग के चेहरे के रूप में प्रस्तुति ने सामाजिक समीकरणों को भाजपा के पक्ष में व्यवस्थित कर दिया और सबसे महत्वपूर्ण रहा मायावी प्रचार जिसके लिए मोदी के इशारे पर थैलीशाहों ने खर्च में पूरी ताकत झोंक दी ।

पर संयोग कुछ ऐसे बने जिससे नमकहराम फिल्म के राजेश खन्ना के किरदार को जीने लगना उनकी नियति बन गया । मोदी के रिमोट कंट्रोल बने उनके पूंजीपति मित्रों के कारोबार भूमंडलीय हो चुके हैं जिनकी सुविधा की खातिर मोदी के लिए विवादित प्रतिबद्धताओं से मुकरना या बरकाव करना लाजिमी था । अयोध्या मुद्दे पर उनका ढुलमुल रवैया बहुत कुछ स्पष्ट कर गया । वर्णव्यवस्था हिन्दू राष्ट्र की अभिन्न विशेषता है लेकिन उन्होने बाबा साहब अंबेडकर को आधुनिक भारत के सर्वोच्च मसीहा के रूप में पेश करने को पार्टी की वैचारिकता की केंद्रीय विषयवस्तु बना दिया और कुलद्रोही रवैये को और ज्यादा विस्तार आरक्षण को कभी ख़त्म न होने देने की हुंकार भरने के बाद अनुसूचित जाति , जनजाति उत्पीड़न अधिनियम के संबंध में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था को पलटने के साथ और प्रखरता से स्पष्ट कर दिया । यानी हिन्दू राष्ट्र की संघ की पटकथा में मोदी अपने हिस्से की भूमिका निभा चुके हैं और संघ को अपने अगले कार्यभार के लिए दूसरे चेहरे की तलाश करना अनिवार्य हो गया है । इसी बीच मोदी ने अपने एकछत्र राज्य के लिए बराबरी के सभी नेताओं को बोनसाई कर दिया है । ऐसे में संघ उनके विकल्प के तौर पर राजनाथ सिंह को निगाह डालनी चाहिये लेकिन उन्हे भी आडवाणी की तरह उदारवाद का वायरस ग्रसित कर गया जिससे संघ ने उनका पत्ता काट दिया है ।

संघ के योजनाबद्ध विकल्प में मोदी के बाद अब योगी  ही न केवल अगला सोपान हैं बल्कि उसकी लीलाकथा में वे पूर्णावतार की तरह प्रतिष्ठित दिख रहे हैं । उन्होने जता दिया है कि उन्हे भारत के बहुलतापूर्ण वर्तमान यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है । शहरों के नाम बदलने के बहाने वे देश की पहचान से हर मुस्लिम पहचान मिटा  देने का इरादा जाहिर कर चुके हैं , विकास की बजाय सांस्कृतिक घमंड को बहाल करने को उन्होने अपनी सरकार के एजेंडे में होली , दीवाली राजकीय पर्व की तरह मनाने की परंपरा शुरू कर सर्वोच्च प्राथमिकता दिखाया है । आदिगुरु शंकराचार्य ने चार धाम सर्वोच्च तीर्थ के रूप में स्थापित किए थे लेकिन आज जबकि वर्णाश्रम व्यवस्था का अनुशासन संकट में है किन प्रतीकों को महत्व दिया जाना चाहिये , एक अलग किस्म की पीठ के पीठाधीश्वर होने के वाबजूद योगी इससे अच्छी तरह अवगत हैं । इसलिये अयोध्या मुद्दे पर मोदी की तरह उन्हे कटिबद्धता में किसी तरह का झोल मंजूर नहीं है । हर घमंड की तरह सांस्कृतिक घमंड भी दूसरे लोगों के स्वाभिमान की कीमत पर होता है और बताने की जरूरत नहीं है कि इसके बदले किनके स्वाभिमान की बलि ली जानी है । सहारनपुर के जातीय दंगों और अधिकारियों की ट्रांसफर , पोस्टिंग में वर्ण आधारित अर्हता की नीति से उनके विचारों की झलक बखूबी मिल रही है ।

इसलिये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह गोरक्षा के नाम पर उपद्रव करने वाले को अराजक ठहरा कर चेतावनी देना उन्हे गवारा नहीं है । संघ को अपने दुलारे नायक की सही समझ पर बुलंदशहर की घटना को उन्होने जिस तरह का टर्न दिया उससे तथाकथित गोरक्षक हर शर्मिंदगी से बरी हो गए । अब पूरी बहस इस पर केंद्रित हो गई है कि प्रशासन ने इज्तिमा की परमीशन  क्यों दी , इसके बाद जब जितनी संख्या के लिए परमीशन दी गई थी तो भी प्रशासन ने इज्तिमा रद्द क्यों नहीं किया । वगैरह –वगैरह ।

गोवंश का वध करने वाले तो पापी हैं ही वे भी कम पापी हैं ही , पर वे कम पापी नहीं है जो गो वंश को पूजते हैं लेकिन अपनी आंखों के सामने भूख से तड़प कर गो वंश का मरना वे नजरअंदाज कर जाते हैं । गोरक्षा आंदोलन की जिम्मेदारी धर्मप्राण जनता में किसी गाय को भूखा न रहने देने का जज्बा भरना भी होना चाहिये पर इस जागृति के लिए काम करने की दिलचस्पी कर्णधारों में नहीं है इसलिये ऐसी किसी बहस में नहीं पड़ना चाहते । बहरहाल संघ के लक्ष्य और प्रतिबद्धताओं के अनुरूप कार्यनीति में योगी ने अपने को सबसे सुपर सिद्ध कर दिया है । इसलिये हिन्दू राष्ट्र को कवायद उन पर पहुँच कर अपनी परिणति प्राप्त करेगी इसमें संदेह नहीं होना चाहिये ।

 

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