• रामजी मंदिर के शताब्दी समारोह में मानस प्रवचन में संतों ने बताई राम की महिमा

कोंच-उरई । संत शिरोमणि राजेश्वरानंद सरस्वती ने कहा है कि सुमति परमात्मा से मिलन कराती है और कुमति परमात्मा से दूर करती है। उन्होंने भरत को सुमति और मंथरा को कुमति के प्रतीक बताते हुए कहा कि अयोध्या में जब तक भरत रहे परमात्मा का वहां निवास रहा लेकिन जैसे ही वह अपने ननिहाल जाते हैं वैसे ही कुमति रूपी मंथरा हावी हो गई और परमात्मा जीव से दूर हो गए। यह बात उन्होंने यहां तिलक नगर स्थित रामजी मंदिर के शताब्दी समारोह के मौके पर आयोजित मानस प्रवचन माला के दौरान कही।

रामप्रताप पचीपुरा बाले के बाड़े में संयोजित मानस प्रवचन में बतौर मुख्य वक्ता अंतरराष्टï्रीय संत राजेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि मानव मात्र को आदर्श जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करने बाला ग्रंथ है श्री राम चरित मानस। बाबा तुलसी ने मानस के माध्यम से सुसंगति और कुसंगति का सुंदर दर्शन कराते हुए कहा है कि सत्संग में रह कर मानव मात्र परमात्मा के अधिक समीप रहता है जबकि बुरी संगत में पड़ कर मानव न केवल परमात्मा से दूर हो जाता है अपितु वह नाना प्रकार के दुखों को भोगता है। उन्होंने कहा कि राम का चरित्र अनुकरणीय है तथा परिवार और समाज को संगठित करने में सहायक है। वे संतों और सत्संगियों पर कृपा करते हैं। वनवास के दौरान उन्होंने चित्रकूट में ऋषियों मुनियों को दर्शन देकर उन्हें कृतार्थ किया। राम तो लोक कल्याण की प्रतिमूर्ति हैं। उन्होंने हनुमान जी महाराज को बड़भागी बताते हुए कहा कि लंका विजय के बाद प्रभु श्रीराम अयोध्या लौटते हैं जहां उनका राज्याभिषेक होता है और वह अपने सभी सखाओं को विदा कर देते हैं लेकिन हनुमान जी महाराज अयोध्या में ही रह जाते हैं। राम जी स्वयं कहते हैं कि वे तो हनुमान के ऋणी हैं और इस ऋण से वह कभी उऋण नहीं हो सकते हैं। संचालन सुनील पाठक ने किया। स्वामी सतरूपानंद, पं. इच्छाराम शास्त्री चित्रकूट, पूजा द्विवेदी, कल्पना, राजेश पाठक आदि ने मानस के गूढ रहस्यों पर प्रकाश डाला। इससे पूर्व भगवान राम विराजमान मंदिर के समक्ष भी धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए, परीक्षित और कथा आयोजक रामबाबू ददइया व उनकी पत्नी चंदनदेवी ने भगवान की आरती उतारी। इंजीनियर लक्ष्मणसिंह, इंजीनियर मधुपसिंह, संजीव निरंजन, दीनानाथ निरंजन एडवोकेट आदि व्यवस्थाओं में लगे थे।

 

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