पिछले दिनों भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश सिंह टिकैत ने कहा कि वे अपने मंच से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अनर्गल टिप्पणियां नही करने देगें। जो ऐसा करेगा उसे आन्दोलन से बाहर कर दिया जायेगा। यह अकेली राकेश टिकैत की बात नहीं है। माहौल हाल के दिनों में जिस तरह से बदला है उसके कारण हर एक के लिये प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के प्रति असम्मानजनक शब्दो का प्रयोग न करने की सनद देना अनिवार्य सा हो गया है।
लेकिन हमेंशा से यह स्थिति नहीं थी । हमें याद है कि हम लोग वाह री इन्दिरा तेरे खेल , खा गयी शक्कर पी गयी तेल के नारे तब लगाते हुये बडे हुयेे जब इन्दिरा जी देश की प्रधानमंत्री थी । उस समय इस तरह की नारेबाजी को दिल पर नहीं लिया जाता था। प्रधानमंत्री के खिलाफ ही नहीं विपक्षी नेताओ के लिये भी ऐसी नारेबाजी होती थी जो जड तौर पर अशोभनीय लगे। लेकिन जिस तरह से शादियों में महिलाओं द्वारा गायी जाने वाली गालियां उत्तेजित करने के बजाय उनका निशाना बने लोगो को गुदगुदाती है कुछ वैसा ही आलम नेताओ के लिये प्रयोग की जाने वाली गालियों के संदर्भ में देखा जाता था। ऐसी गालियों को लोकतंत्र के फलने फूलने की निशानी के बतौर संज्ञान में अचेतन तौर पर लिया जाता था।
लोगो ने विश्वास कर रखा था कि बोलने और लिखने की जो आजादी दी गयी है वह ऊचे पायदानों पर बैठे लोगो के खिलाफ भडास निकालने से ही सार्थक होती है। लोकतंत्र है तो लोग दुखी या आक्रोशित होकर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के लिये ही बकेगें , रिक्शा वाले के लिये थोडे ही । लोकतंत्र अस्तित्व में ही इसलिये आया कि लोग सरकारों के खिलाफ कहकर अपना गुबार निकाल ले। राजशाही में ऐसी सुविधा नहीं होती जिससे लोग घुटते रहते है और आखिर में इसकी परिणति खूनी क्रांति के रूप मे होती है। इसलिये पहले सत्तायें और व्यवस्थाये स्थिर नहीं रह पाती थी जिससे जनता को बार बार लुटना पिटना पडता था । लोकतंत्र ने व्यवस्था के मामले में स्थायित्व दिया । पर अब जो नई रीति बन रही है उससे लगता है कि लोकतंत्र का यह वरदान कही छिन न जाये।
देश में उच्च पदों पर बैठे लोगो के सम्मान के कायल लोगो को 2014 के लोक सभा चुनाव के समय फेसबुक पर पोस्ट किये जाने वाले मीमो की याद दिलानी पडेगी । उस समय प्रधानमंत्री डा0 मनमोहन सिंह थे और सत्तारूढ गठबंधन यूपीए की मुखिया सोनिया गांधी थी। जो मीम पोस्ट होते थे उनमें मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को कुत्ता बनाकर पेश किया जाता था जिनके गले में बडा पटटा डालकर उनकी जंजीर हाथ में पकडे नरेन्द्र मोदी जेलर की मुद्रा में तनकर उन्हें खीचते हुये ले जा रहे होते थे। तब प्रधानमंत्री के लिये इतनी गरिमाहीन अभिव्यक्ति को लेकर कहीं कोई कचोट या आपत्ति नहीं देखी गयी । जो लोग तब ऐसा कर रहे थे आज वे ही प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सम्मान को लेकर बहुत ज्यादा सम्वेदनशीलता दिखा रहे है।
इस बयार में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री पर सहज कटाक्ष भी कुफ्र जैसा खतरनाक गुनाह हो गया है। सत्ताधारियों को आलोचनाओं से परे बनाने का यह सिलसिला कहीं लोकतंत्र को सीमित करने की ओर तो नहीं जा रहा है। आखिर कटाक्ष और असम्मान के बीच महीन रेखा ही तो है जिसके मिट जाने पर कटाक्ष भी सबसे बडी गाली बन सकता है। क्या ऐसा माहौल लोकतंत्र के मिजाज के अनुकूल कहा जा सकता है।

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