प्रसार और टीआरपी के शिखर, तब से अब तक………..

केपी सिंह का ब्लाॅग

आज लोगों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि 1886 में ही एक अखबार का सर्कुलेशन 10 लाख हो गया था। यानि कि 135 साल पहले, वह भी भारत से बहुत छोटे देश फ्रांस में यह कीर्तिमान कायम हुआ था। अखबार का नाम था ला पती जर्नल जिसका हिन्दी अनुवाद हुआ लघु पत्रिका। भारत में तो पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों तक भी किसी अखबार का इतना सर्कुलेशन कल्पना से परे माना जाता था। जिस दैनिक अखबार ने 10 लाख के सर्कुलेशन का कीर्तिमान बनाया था वह इंग्लैंड का डेली मेल था और उसने यह करिश्मा सन 1900 में किया था।
भारत में साक्षरता की दर आजादी के समय बहुत कम थी लेकिन जो लोग अक्षर ज्ञान भी रखते थे वे भी अखबार, पत्र-पत्रिकायें और उपन्यास पढ़ने में रूचि रखते थे। यह गलतफहमी है कि मीडिया की वजह से लोगों में जागरूकता आयी है। स्थिति यह है कि राजनीतिक जागरूकता जिसके लिए अखबार पढ़े जाते हैं का स्तर निरक्षर युग में आज के समय से बहुत ऊंचा था। मुझे याद है मध्य प्रदेश के भिण्ड शहर की जहां मेरी पढ़ाई हुई। इस शहर में तीन पुस्तकालय थे। एक भव्य और विशाल पुस्तकालय नगर पालिका ने शहर की सबसे प्राइम लोकेशन मानी जाने वाली गांधी मार्केट में शुरू कराया था। आज किसी शहर में नगर पालिका द्वारा इतना बड़ा पुस्तकालय या मीडिया सेंटर खोलने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
पुस्तकालय सार्वजनिक कार्यो के मामले में प्राथमिकता में इसलिए थे क्योंकि यह निरक्षर युग में लोगों की मांग के अनुकूल था। भिण्ड के तीनों पुस्तकालयों में सुबह-शाम पढ़ने वालों की भीड़ रहती थी। अखबारों के मामले में सबसे ज्यादा वीर अर्जुन पढ़ा जाता था। के नरेन्द्र की थोक में छपने वाले इसके अग्रलेखों पर उस समय के बुजुर्गो की भीड़ टूटी रहती थी। फिर भी पश्चिमी देशों की तुलना में अखबारों का सर्कुलेशन भारत में इतना दरिद्र था तो उसकी वजह यह थी कि लोग घर में अखबार मंगवाना बहुत खर्चीला मानते थे। इसलिए हर कोई इसका साहस दिखाने में अपने को लाचार महसूस करता था। मोहल्ले में एक घर में अखबार आता था और पूरा मोहल्ला उसे पढ़ने का तलबगार रहता था।
उरई में कम से कम तीन दैनिक अखबार रहे जो मेरे द्वारा शुरू कराये गये। जिस अखबार का संपादन मैने किया उसे जिले में सर्कुलेशन की प्रतिस्पर्धा में सबसे ऊपर रखने का मेरा लक्ष्य रहता था और लोगों के सहयोग से मैं इसमें कामयाब भी रहा। 1986 में दैनिक अग्निचरण जब शुरू हुआ तो संपादन की स्वतंत्र रूप से बागडोर मुझे मिली। अपने प्रतिस्पर्धी अखबार के मुकाबले दैनिक अग्निचरण पूरी तरह साधनहीन था। प्रतिस्पर्धी अखबार जमा जमाया था और 15 वर्ष से बिना व्यवधान प्रकाशन जारी रख उसने समाज से लेकर प्रशासन तक में अपनी विशेष जगह बना रखी थी। ऐसे अखबार के मुकाबले आगे निकलने की चुनौती स्वीकार करना दुस्साहस से कम नहीं था। प्रतिस्पर्धी अखबार को भी अपनी हैसियत को लेकर पूरा दंभ था और शुरू में उन्होंने दैनिक अग्निचरण के प्रति काफी हीन भावना प्रदर्शित की।
पर कुछ महीनें व्यतीत होते-होते उन्हें पसीना छूट गया। हमारी रणनीति बहुत सटीक साबित हुई। प्रतिस्पर्धी अखबार का सर्कुलेशन आस पास के कई जिलों के ग्रामीण क्षेत्र में था जिसकी वजह से उन्हें अपना अखबार दूसरी जगहों पर समय से पहुंचाने के लिए नौ बजे रात तक निकाल देना पड़ता था ताकि उसे साबरमती एक्सप्रेस में रखवाया जा सके। हमने निश्चय किया कि हम पहले अपने अखबार को शहर और जिले में केन्द्रित करेंगे। इसलिए हमें सुबह पांच बजे तक अखबार छापने की सुविधा थी। हमने शाम सात बजे से देर रात तक के क्राइम और दुर्घटनाओं को कवर करने में ताकत झोंक दी। इसके कारण प्रतिस्पर्धी अखबार में वे घटनायें पहले दिन नदारत मिलती थी जो दैनिक अग्निचरण में होती थी। अगले दिन वे मजबूरी में छापते थे तो शहर और जिले में उनकी बासी खबर वाले अखबार की इमेज बनने लगी जिससे वे सर्कुलेशन में पिछड़ने पर आ गये। अखबार जहां से छपता है वहीं दोयम हो जाये तो बाहर के क्षेत्रों में भी उसकी साख में गिरावट आती है। जाहिर है कि इससे प्रतिस्पर्धी अखबार का मनोबल टूटा। दैनिक अग्निचरण का डंका वीर बहादुर सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में जोरों से इसलिए गूंज उठा क्योंकि कर्मचारियों की हड़ताल को वे अपनी संकोची और संयमित नीति के कारण उस धड़ल्ले से कवर नहीं कर पाये जिसे हमने किया। राठ का उपचुनाव भी उन दिनों हुआ। जिसमें हमने दैनिक अग्निचरण के विशेष संस्करण सारी जन सभाओं को मौके पर कवर करके निकाले। इस वजह से भी दैनिक अग्निचरण का वजन बहुत बुलंद हो गया।
बाद में दैनिक लोकसारथी के संस्थापक संपादक के रूप में मुझे फिर हाथ दिखाने का मौका मिला। इसके लिए हमने जो रणनीति अपनाई उसकी वजह से हम 2000 प्रतियां प्रतिदिन के सर्कुलेशन तक पहुंच सके। इस अखबार की लोकप्रियता में उस समय के चर्चित रामायण और महाभारत सीरियलों पर आधारित परिचर्चाओं का मुख्य योगदान रहा। क्या द्रोपदी एक जिन्स थी, राधा और कृष्ण के संबंध व सामाजिक नैतिकता जैसे ज्वलंत प्रश्नों पर आधारित इन परिचर्चाओं में शामिल होने के लिए सैकड़ों लोगों ने खत भेजे। चुनावों में प्रत्याशियों के चयन को लेकर मतदाताओं की अपेक्षा जैसी विभिन्न परिचर्चायें भी इस अभियान की मजबूत कड़ी साबित हुई और लोकसारथी ज्यादा सर्कुलेशन के साथ-साथ शहर और जिले के कुलीन समाज का सबसे प्रतिष्ठित अखबार बनकर उभरा। दैनिक सोच समझ में मेरी भूमिका नेपथ्य के संपादक की थी। यह अखबार भी अपनी विशिष्ट संपादकीय नीति के कारण मेरे द्वारा संपादित उक्त दैनिक अखबारों की तरह ही पत्रकार जगत में गरिमापूर्ण स्थान बनाने में सफल रहा जिसकी सराहना राष्ट्रीय स्तर के संपादक और पत्रकार भी करते थे।
फूलन देवी के गिरोह के आतंक के समय उरई से एक साप्ताहिक अखबार गेटे के नाम से निकलता था जिसकी लोकप्रियता का आलम यह रहा कि कई बार यह ब्लैक में बिका। इस अखबार में भी मैने अपनी भूमिका परदे के पीछे रहकर निभायी। फूलन देवी के समर्पण के समय इस अखबार के लिए लिखी गई एक समाचार कथा की वजह से इस आयोजन के मुख्य सूत्रधार एसपी से मेरा जबरदस्त टकराव हो गया और पहली बार समर्पण में हुए प्रदर्शन को लेकर मेरे खिलाफ गंभीर मुकदमें कायम कराये गये।
आज अखबारों के सर्कुलेशन से लेकर टेलीविजन चैनलों की टीआरपी तक करोड़ों की गणना है। लेकिन पाठकों और दर्शकों की वह आस्था इन्हें नसीब नहीं है जो पुराने अखबारों के प्रति रहती थी। तब लोग के नरेन्द्र की संपादकीय के दीवाने हुआ करते थे आज लोगों के लिए मीडिया के प्रति आकर्षण दुष्कर्म, हत्या व अन्य सनसनीखेज अपराधों की खबरों, राजनीतिक गाॅसिप व विजुअल और भांड़ों की तरह चीखते एंकरों की वजह से है। जाहिर है कि सर्कुलेशन या टीआरपी का झामा मीडिया के मनोरंजन उद्योग में बदल जाने की वजह से है। मीडिया अगर राजनीतिक चेतना का माध्यम है तो अब असली पाठक और दर्शक इस उददेश्य की पूर्ति सत्य हिन्दी डाटकाम, द वायर, जनादेश आदि पोर्टलों को देखकर कर रहे हैं। इसीलिए मौजूदा सरकार सोशल मीडिया को नथने का कानून बनाने की इतनी ज्यादा आतुरता दिखा रही है।

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