आन्दोलनों की मर्यादा


विरोध प्रदर्शनों को लेकर निश्चित रूप से एक नीति होनी चाहिये। इसी के अनुरूप उच्चतम न्यायालय ने गत दिनों व्यवस्था दी है कि लोक तंत्र मंे विरोध प्रदर्शन का अधिकार सभी को है पर स्वतःस्फूर्त आन्दोलन की बात अलग है, योजनाबद्ध तरीके से ऐसे विरोध को अनिश्चितकाल तक जारी रखने की इजाजत नहीं दी जा सकती जिससे आम आदमी के लिये रोजमर्रा की जिन्दगी में दुश्वारिया पैदा हो जाये। उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी शाहीन बाग के चर्चित प्रदर्शन पर दायर याचिका की सुनवाई के दौरान की। दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के दीर्घकालीन धरने के संदर्भ में भी इसकी अर्थ खोजे गये है जो अन्यथा नहीं है।
उच्चतम न्यायालय ने वेलगाम विरोध प्रदर्शन की संस्कृति को लेकर यह रूख पहली बार प्रदर्शित नहीं किया है हालांकि अब धारणा यह बनती जा रही है कि उसकी टिप्पणियों और फैसलांे में सरकार की सुविधा, असुविधा के हिसाब से मन्तब्य जाहिर करने की ध्वनि निकलती है। यह गलत भी नहीं है। अर्नब गोस्वामी को रिहा कराने के लिये जिस तरह से न्यायालय द्वारा व्याकुलता दिखाई गयी वह अभूतपूर्व थी जबकि सरकार ने कई ऐसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को लम्बे समय से जेल में निरूद्ध कर रखा है जिन्हें स्वतंत्र सोच के लिये प्रतिष्ठा प्राप्त है। उनके दमन हेतु बात को बतंगड बनाया जाना प्रथम दृष्टया स्पष्ट है लेकिन सुप्रीम कोर्ट अर्नब गोस्वामी की तरह उनके लिये नहीं पसीजा ।
बहरहाल उच्चतम न्यायालय ने जब सरकार दूसरी थी तो राष्ट्रीय राजमार्ग जांच करने के खिलाफ फतवांनुमा टिप्पणी जारी की थी जिसका व्यापक तौर पर स्वागत किया गया था। मुख्य मार्ग जाम किये जाने से लोगो को भारी परेशानी का सामना करना पडता है। विरोध की इस तरह की प्रवृत्तियां अराजकता को निमंत्रण देती है। इसी कारण एक समय कहा जाने लगा था कि भारत में जरूरत से ज्यादा लोकतंत्र हो गया है जो व्यवस्था को गर्त में धकेल रहा है।
लेकिन अब स्थितियां बदल गयी है। विरोध को लेकर इस समय चरम पर असहिष्णुता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये जबरदस्त मुश्किलें पैदा हो गयी है। बाबा साहब अम्बेडकर ने लोगो के मौलिक अधिकारों का संरक्षण राज्य की मशीनरी के भरोसे नहीं छोडा था क्योंकि उन्हें अन्देशा था कि राज्य अपने निहित स्वार्थ के कारण यह जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभायेगा इसलिये मौलिक अधिकारों का जिम्मा न्यायालय को सुपुर्द कर दिया गया था लेकिन न्यायालय आज इस मामले में निरूपाय बना हुआ है। यह स्थितियां लोकतंत्र के लिये शुभ नहीं कही जा सकती है। अगर दिल्ली की सीमाओं पर किसानों के लम्बे धरने से आम जनजीवन के लिये स्थितियां कष्टप्रद हो रही है तो किसानों के साथ-साथ सरकार भी इसके लिये कम जिम्मेदार नहीं है। यह बात भुलायी नहीं जा सकती कि सरकार ने शुरू में किसानों का मनोबल तोडने के लिये उन्हें खालिस्तानी और न जाने क्या क्या कहलवाया। यह भी कोई तर्क नहीं है कि विरोधी दल उनके आन्दोलन को बल दे रहे है इसलिये आन्दोलन गलत है। राजनीतिक दलों का काम है कि वे जनता के किसी बडे तबके के असंतोष का समर्थन करे, यहां तक कि उसके लिये आन्दोलन चलाने की अगुवाई करें। प्रधानमंत्री ने आन्दोलनजीवी के नाम से एक नई लानत गढी जबकि अगर यह लानत है तो उनकी पार्टी सत्ता में आने के पहले ऐसी ही भूमिका का निर्वाह कर चुकी है। कृषि कानूनो को बनाये रखने की सरकार की जिद नैतिक रूप से कमजोर साबित हो रही है। लगता है सरकार अपनी इस छबि की बंधक बनकर रह गयी है कि वह किसी भी सूरत में अपने इरादे से पीछे नहीं हठ सकती। दुष्टों के लिये इस तरह की छवि ठीक है लेकिन जन भावना के मामले मे अगर स्थितियां पीछे हटने की आ जाये तो उसकी कोई हेठी नहीं हो सकती ।
बहरहाल मुख्य मुददा विरोध प्रदर्शन में भी मर्यादा को ध्यान में रखने का है। गांधी जी ने सविनय अवज्ञा और सत्याग्रह के जरिये उस साम्राज्य को परास्त कर दिया था जिसके बारे में कहा जाता था कि उसके राज में सूर्यास्त नहीं होता । मर्यादा में बंधा आन्दोलन नैतिक रूप से जितना असरदार हो सकता है उतना तोडफोड  और अतिवाद से नहीं हो सकता । अराजक आन्दोलन से दुनिया मंे देश की प्रतिष्ठा भी गिरती है। सुप्रीम कोर्ट ने जो टिप्पणी की है उसे सफल बनाने के लिये सरकार को भी बडप्पन का परिचय देना होगा। विरोध को सहन करने और जायज विरोध को समय रहते स्वीकार कर आन्दोलन का निस्तारण करने की भावना उसे दिखानी होगी।

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