उत्तर प्रदेश में सात चरणों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव का रंग हर रोज बदल रहा है। भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव को हिन्दुत्व के मुद्दे पर प्ले करके बाजी अपने पक्ष में करना चाहती थी लेकिन विपक्षी दल खासतौर से अखिलेश यादव ताबड़तोड़ लोक लुभावन मुद्दों की ऐसी बम्बारी कर रहे हैं कि भाजपा के होश फाख्ता हो गये हैं। पहले उन्होंने प्रदेश में सभी के लिए 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का ऐलान करके वोटरों में जबरदस्त सेंध लगाई जिसका कोई तोड़ भाजपा नहीं ढंूढ़ पायी। बाद में आचार संहिता लागू होने के पहले उसने बिजली का बिल आधा करके अखिलेश की घोषणा के प्रभाव को बेअसर करने की कोशिश की। इसका प्रतिदान तत्काल दिये जाने से भाजपा को निश्चित रूप से फायदा हुआ। इसी बीच अखिलेश ने लगे हाथों राज्य के कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बहाल करके नेहले पर देहला जड़ दिया। हालांकि एक सर्वे को छोड़कर सभी सर्वे अभी भी भाजपा के बहुमत में आने की भविष्यवाणी कर रहे हैं लेकिन भाजपा भी अब मानने लगी है कि विपक्ष की पैंतरेबाजी से उसके साथ लोक कथाओं की खरगोश और कछुऐ की दौड़ की ट्रेचडी पैदा हो सकती है। इस कल्पना से उसके रणनीतिकारों को भीषण ठंड के इस मौसम में भी पसीने आ गये हैं।
चुनाव की तैयारियां शुरू होने के समय योगी और उन्हें लेकर संघ बहुत मुगालते में था। उसे लग रहा था कि योगी की मुसलमानों के खिलाफ ललकार और कानून व्यवस्था में इकतरफा कार्रवाई भाजपा की जीत के लिए सबसे बड़ा ट्रंम्प साबित होगी। पर अब उसे इस भ्रम से उभरना पड़ा है। स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चैहान और धर्म सिंह सैनी आदि के इस्तीफे के बाद इस हवा ने जोर पकड़ लिया कि योगी की मानसिकता दलितों और पिछड़ों के प्रति भेदभावपूर्ण हैं जबकि ब्राह्मणों में उन्हें लेकर पहले से ही यह असंतोष था जो इस बीच जोर पकड़ गया है। विभिन्न जातियों की भाजपा से इस टूटन ने हिन्दुत्व को भेद डाला है और मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के कब्जे को खाली कराने, अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए तमाम तामझाम शुरू करने और काशी में काशी विश्वनाथ गलियारे के अत्यंत धूमधाम से प्रधानमंत्री द्वारा शुभारम्भ के मेगा शो के बावजूद हिन्दुत्व के लिए वैसा जोश कायम नहीं रह पा रहा है जैसा पहले था। इसके चलते चुनाव में पार्टी के साथ अनहोनी की आशंका और ज्यादा सिर उठा चुकी है।
ऐसी हालत में पहले योगी जो दम भर रहे थे कि चुनाव अभियान को सिर्फ अपने सिर पर रखकर वे बेतरणी पार करा देंगे। अब आरएसएस को इस मामले में आश्वस्त करने में विफल हो रहे हैं। यहां तक कि योगी का भी खुद पर पहले का आत्मविश्वास हिल गया है। नतीजतन उन्हें चुनावी उद्धार के लिए मोदी और अमित शाह के सामने नतमस्तक हो जाना पड़ा है। अब यह स्वीकार कर लिया गया है कि उत्तर प्रदेश के चुनाव को योगी के नाम से फतह नहीं किया जा सकता बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों में उनके विरोध की जो व्यापकता है उससे भाजपा को सुरक्षित करने के लिए चुनाव अभियान में योगी को नैपथ्य में धकेलना पड़ेगा और मोदी के चेहरे को आगे करना पड़ेगा। यह माना जा रहा है कि मोदी के तरकस में अंत तक ऐसे तीर रहते हैं जिससे वे विपक्ष के किसी भी ब्रह्मास्त्र की काट कर सकें। अब मोदी का यही चमत्कार भाजपा अखिलेश यादव द्वारा लोक लुभावन वायदों से की जा रही घेराबंदी तोड़ने के लिए देखने की आशा कर रही है।
उधर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी बाड्रा भले ही अपनी पार्टी में नीचे तक बहुत जान न फूंक पायी हों लेकिन उनका 40 प्रतिशत महिलाओं को चुनाव में टिकट देने और लड़की हूं लड़ सकती हूं महिलाओं के एक वर्ग को इस हद तक आकर्षित कर रहा है कि वे कांग्रेस को वोट देने का संकल्प जताने लगी हैं और यह निश्चित रूप से भाजपा को बड़ी क्षति पहुंचा रहा है क्योंकि महिला वोटरों में उनकी जो सेंधमारी हो रही है उससे भाजपा इसलिए सर्वाधिक प्रभावित होगी क्योंकि महिलाओं में ज्यादातर भाजपा को वोट करती हैं। गरज यह है कि महिलायें धार्मिक मामलों में अधिक भावुक होती हैं जिससे भाजपा की धर्म की दुहाई उनमें ज्यादा असर करती थी।
मजेदार बात यह है कि अमित शाह ने ब्राह्मणों की योगी के प्रति नाराजगी के प्रभाव को समाप्त करने के लिए लखीमपुर खीरी की घटना के कारण किसानों में पैदा हुए गुस्से के बावजूद केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा टेनी को न तो मंत्रिमंडल से हटने दिया था और न ही उनका विभाग बदलने दिया था। जबकि कहा यह जा रहा था कि टेनी मिश्रा व्यापक रूप से प्रदेश में ब्राह्मणों का चेहरा नहीं है क्योंकि उन्हें लखीमपुर खीरी के बाहर कोई जानता तक नहीं है। योगी की भी इच्छा टेनी मिश्रा को केन्द्रीय मंत्रिमंडल से बर्खास्त किये जाने की थी फिर भी अमित शाह अपनी जिद पर बने रहे। पर प्रदेश में अन्य स्थानों पर तो छोड़ दीजिये टेनी के लिए अमित शाह द्वार अपनी फजीहत कराने के बावजूद टेनी को लखीमपुरा खीरी के ब्राह्मणों तक में कारगर नहीं पा सके। यह बात पांच बार के लखीमपुर खीरी के विधायक बाला प्रसाद अवस्थी द्वारा भाजपा छोड़े जाने से सामने उजागर हो गई।
सामाजिक दृष्टिकोण के दूषित होने के अलावा योगी ने गवर्नेस के संचालन में भी नाकाबलियत दिखायी जो लोगों के उनसे बुरी तरह ऊबने का कारण बन गया। इसकी वजह से अधिकारी बेलगाम हो गये। भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों की शिकायतें बेअसर हो गई। योगी के पूरी तरह ईमानदार होने के बावजूद लोगों को अधिकारियों और कर्मचारियों की लूट खसौट का जो सामना करना पड़ा उसमें इंतहा हुई। योगी ने भ्रष्टाचार पर रोक के लिए बनी संस्थाओं को प्रभावी बनाने की जरूरत पर कोई ध्यान नहीं दिया। प्रशासन में उनके कार्यकाल में अन्य संस्थागत सुधारों में भी कोई दिलचस्पी नहीं ली गई। लाल फीताशाही हावी रही। योगी अपने किसी भी संकल्प पर नाकारा अधिकारियों के कारण वैसा अमल नहीं करा सके जैसा कराने में मायावती कारगर रहती थी। उन्होंने पालिथीन हटाओं अभियान में छोटे दुकानदारों को बर्बाद करा दिया लेकिन पालिथीन आज अनिवार्य बुराई की तरह बाजार में छायी हुई है। वरन पहले से अधिक उसका जोर बढ़ गया है। उन्होंने कहा था कि अग्रेजी माध्यमों के स्कूलों की फीस आदि के मामले में नकेल कसी जायेगी पर वे अग्रेजी स्कूलों की लाबी के सामने बेहद कमजोर पड़ गये। यहां तक कि उनके कार्यकाल में विद्या भारती के विद्यालयों को तंत्र भी पूरी तरह लड़खड़ा गया। उन्होंने कहा था कि लंबे समय से जमे सरकार डाक्टर दूसरी जगह स्थानांतरित किये जायेंगे और सरकारी डाक्टरों को प्राईवेट प्रेक्टिस नहीं करने दी जायेगी। पर उनका इस बारे में दम खोखला निकला। यहां तक कि गौ संरक्षण जो उनका सबसे ड्रीम प्रोजेक्ट था उसे भी अधिकारियों ने नाकाम कर दिया। गौ शालाओं में उचित देखभाल और आहार की व्यवस्था के अभाव में हर रोज गायें बड़ी संख्या में दम तोड़ रही हैं। सरकार भी अब इसके कारण इतनी परेशान हो चुकी है कि गायों को बचाने की फिक्र छोड़कर इसकी खबरें बाहर न आने देने के लिए पूरी ऊर्जा खर्च कर रही है। कल्पना कीजिये कि अगर यह मायावती का प्रोजेक्ट होता और सरकार उनकी होती तो क्या इतना खिलवाड़ संभव था।
लोगों को हिन्दुत्व तो चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इसकी दुहाई देने से लोग बेहतर गवर्नेंस  का तकाजा करना बंद कर देंगे। नरेन्द्र मोदी इसका उदाहरण हैं जिन्होंने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए हिन्दुत्व को मजबूत रखा और मुसलमानों को हाशिये पर पहुंचा दिया। पर इससे गवर्नेंस में लियाकत के प्रशर्दन के मामले में उन्होंने कोई चूक नहीं की। कांग्रेस के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसके कारण कई बार गवर्नेंस के पहलुओं पर उनकी तारीफ की थी। मोदी की बेहतर गवर्नेंस और विकास के कारण ही गुजरात एक माडल बन गया था जिसे 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर सफलता पूर्वक भुनाया गया था। योगी इस मामले में अपने मुंह मिया मिटठू बने लेकिन उनकी सरकार का ऊंट जब चुनावी पहाड़ के नीचे आया तो उसका अदनापन बुरी तरह खुल गया है। उस पर अखिलेश की समाज के विभिन्न वर्गों को मुट्ठी में कर लेने में कामयाब घोषणायें जिससे चुनाव का अंत होते-होते राजनीतिक ऊंट किस करवट बैठ जाये यह कहना अब मुश्किल लग रहा है।    

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