योगी सरकार पार्ट-2 ने शपथ ग्रहण समारोह संपन्न होने के साथ ही प्रदेश का कार्यभार फिर संभाल लिया है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी के साथ 52 और मंत्रियों ने शुक्रवार को लखनऊ के भारत रत्न अटल विहारी वाजपेयी इकाना अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में पद और गोपनीयता की शपथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में ग्रहण की। इसमें दो उप मुख्यमंत्रियों समेत 18 कैबिनेट मंत्री, 14 राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार और 20 राज्यमंत्री शामिल हैं। खास बात यह है कि इस बार टीम योगी में 31 नये चेहरे देखने को मिले जो योगी सरकार पार्ट-1 में शामिल नहीं थे।

जातिगत दृष्टिकोण से देखें तो मंत्रिमंडल में 20 ओबीसी, 09 दलित, 07 ब्राह्मण, 06 राजपूत, 04 वैश्य, 02 भूमिहार, 01 कायस्थ, 01 सिख और 01 मुस्लिम नेता को जगह मिली है। उप मुख्यमंत्रियों में केशव प्रसाद मौर्य तो चुनाव हार जाने के बावजूद यथा स्थान पर बने रहने में सफल रहे लेकिन पिछली सरकार के ब्राह्मण उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को कुर्सी गंवानी पड़ी। उनके स्थान पर आक्रामक ब्राह्मण चेहरे का प्रतिनिधित्व करने वाले बृजेश पाठक को मंत्रिमंडल में दूसरे नम्बर की पोजीशन दी गई है।

मंत्रिमंडल की चाबी रही केन्द्र के हाथ में-

देखा जाये तो मंत्रिमंडल में केन्द्र का ही पूरा दखल दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि मंत्रियों के चयन में योगी की बिल्कुल नहीं चली। फिर भी योगी किसी तरह का विद्रोह करने के मूड में नहीं हैं वजह साफ है। यह पहली बार है जब किसी मुख्यमंत्री का शपथ ग्रहण समारोह इतना भव्य और वृहद स्तर पर आयोजित किया गया हो। इस मेगा शो के माध्यम से भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने यह झलक दे दी है कि उसके द्वारा योगी को मोदी के उत्तराधिकारी के रूप में तराशे जाने के तकाजे को स्वीकार कर लिया गया है। योगी की सरकार का शपथ ग्रहण समारोह इसीलिए उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट करने का जरिया साबित हुआ। योगी का इससे गदगद होना स्वाभाविक ही है इसलिए उन्होंने केन्द्रीय नेतृत्व की प्रदेश के नये मंत्रियों के बावत सूची को शिरोधार्य करने में कोई हिचक नहीं दिखायी। उन्होंने केशव मौर्य के साथ बृजेश पाठक को उप मुख्यमंत्री बनाने का फरमान सहजता से स्वीकार कर लिया जबकि शपथ ग्रहण करते ही मोदी की लीडरशिप की अवज्ञा करते हुए पाठक ने अपने प्रमोशन को लेकर प्रदेश की जनता और भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व का आभार जताया न कि योगी का किसी तरह का श्रेय माना। अलबत्ता केशव प्रसाद मौर्य इस बार कुछ समर्पण सी मुद्रा में नजर आये जिसकी झलक उन्होंने योगी जी के नेतृत्व में नई प्रदेश सरकार द्वारा सभी वर्गों के उत्थान के लिए कार्य कर पाने की इच्छा व्यक्त करने के साथ दी।

भ्रष्ट मंत्रियों की छुट्टी-

मंत्रिमंडल के मामले में योगी जी ने भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टालरेंस के संकल्प का अनुशीलन किया और जिसे केन्द्रीय नेतृत्व ने भी स्वीकार कर लिया। उन्होंने 21 मंत्रियों की छुट्टी की है जिनमें से अधिकांश पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने का संदेह था फिर चाहे भले ही उनके एक समय प्रिय रहे जल शक्ति मंत्री डा0 महेन्द्र सिंह ही क्यों न हों। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास़्त्री के नाती और खादी ग्रामोद्योग मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह को भी इस बार मंत्रिमंडल से बाहर रखा गया है। सिद्धार्थ नाथ सिंह को योगी आदित्यनाथ तभी मंत्रिमंडल से रूखसत करना चाहते थे जब वे स्वास्थ्य मंत्री थे और उन्होंने डाक्टरो की ट्रांसफर पोस्टिंग में बहुत अपयश कमाया था। पर उस समय योगी सिर्फ उनका विभाग बदल सके थे। उनके बाद बने स्वास्थ्य मंत्री जय प्रताप सिंह, आबकारी मंत्री रहे रामनरेश  अग्निहोत्री और नगर विकास मंत्री आशुतोष टंडन को भी मंत्री पद से हाथ धोना पड़ा है।

मं़त्रमंडल में पुनः शामिल होने से चूके अन्य मंत्रियों में एक चैकाने वाला नाम ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का भी है जिनको विद्युत व्यवस्था पटरी पर लाने का श्रेय दिया जा रहा था। हालंकि उनके बारे में यह कहा जा रहा है कि वे भाजपा के नये प्रदेश अध्यक्ष बनाये जा सकते हैं। पिछली सरकार में औद्योगिक मंत्री रहे सतीश महाना व समाज कल्याण मंत्री रहे रमापति शास्त्री को भी मौका नहीं मिला है। माना जा रहा है कि इन दोनों में से किसी एक को विधानसभा अध्यक्ष बना दिया जायेगा। अन्य अपदस्थ हुए पूर्व मंत्रियों में डा0 नीलकंठ तिवारी, अशोक कटारिया, श्रीराम चैहान, जय कुमार जैकी, मोहसिन रजा, अतुल गर्ग, सुरेश पासी, रमाशंकर पटेल, नीलिमा कटियार, जीएस धर्मेश, महेश गुप्ता और अनिल शर्मा शामिल हैं।

स्वतंत्र देव सिंह को कैबिनेट में जगह-

प्रदेश भाजपा अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह जिनके नेतृत्व में पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में फिर शानदार सफलता हासिल की है उन्हें सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में वापस बुला लिया गया है। स्वतंत्र देव सिंह को पहले उप मुख्यमंत्री बनाया जा रहा था लेकिन ऐन मौके पर उनका पत्ता तमाम किंतु परन्तु लगाकर कटवा दिया गया। अब स्वतंत्र देव सिंह को जल्द ही प्रदेश अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ेगा क्योंकि भाजपा एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत में विश्वास करती है और इसमें अपवाद की कोई गुंजाइश नहीं दी जाती। पीएमओ से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर सक्रिय राजनीति में आये गुजरात कैडर के 1988 बैच के आईएएस अरविन्द शर्मा को भी मुख्यमंत्री ने इस बार अपने मंत्रिमंडल में स्वीकार कर लिया है। हालांकि उन्हें उप मुख्यमंत्री बनाने की बजाय सिर्फ मंत्री बनाया गया है। उत्तराखंड के गवर्नर पद से इस्तीफा देने वाली बेबी रानी मौर्या को भी उप मुख्यमंत्री के दर्रे की लालसा छोड़कर सिर्फ मंत्री पद ही स्वीकार करना पड़ा है।

पंकज सिंह भी नहीं पा सके मंत्रिमंडल में जगह-

रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के सुपुत्र पंकज सिंह भी योगी के मंत्रिमंडल में जगह नहीं पा सके हैं। कहा जा रहा है कि मंत्री के रूप में उनकी शपथ तो खुद राजनाथ सिंह ने ही रूकवा डाली। भाजपा ने पार्टी में वंश परंपरा को उखाड़ फेकने की मुहिम चलाई है जिसका लोगों ने बड़े पैमाने पर स्वागत किया है। राजनाथ सिंह देख रहे थे कि उनके केन्द्रीय मंत्रिमंडल में रहते हुए अगर उनका बेटा प्रदेश मंत्रिमंडल में शामिल किया गया तो पार्टी की साख को धक्का लगेगा। इसलिए उन्होंने अपने बेटे के राजनीतिक कैरियर का फिलहाल बलिदान कर दिया। ईडी के पूर्व अधिकारी राजेश्वर सिंह को भी योगी मंत्री नहीं बनवा सके। इसके विपरीत एक और पूर्व आईपीएस असीम अरूण मंत्रिमंडल में तो समायोजित कर लिये गये लेकिन सिर्फ राज्यमंत्री बनाकर, जबकि उनसे योगी का वायदा उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाने का था। कुर्मी समाज के छिटकने की चर्चाओं के कारण इस बिरादरी के तीन नेता स्वतंत्र देव सिंह समेत कैबिनेट मंत्री बनाये गये हैं जिनमें अपना दल की अनुप्रिया पटेल के पति आशीष पटेल के साथ-साथ जिंदगी भर समाजवादी रहे और इसी चुनाव में भाजपा में शामिल हुए राकेश सचान भी शामिल हैं। बसपा नेता रहे रामवीर उपाध्याय के भाई योगेन्द्र उपाध्याय को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया। चूंकि रामवीर उपाध्याय चुनाव हार गये। कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए पूर्व केन्द्रीय मंत्री जितिन प्रसाद को फिर कैबिनेट में जगह दे दी गई है। सहयोगी दल निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद को भी कैबिनेट मंत्री बनाया गया है। पुराने और अनुभवी चेहरों में सूर्य प्रताप शाही, लक्ष्मीनारायण चैधरी, जय वीर सिंह, धर्मपाल सिंह, नंद गोपाल नंदी, भूपेन्द्र सिंह चैधरी को भी कैबिनेट भी बरकरार रखा गया है जबकि ओमप्रकाश राजभर की काट और उनके बेटे को चुनाव हराने वाले अनिल राजभर भी कैबिनेट मंत्री बनाये गये हैं।

आधी आबादी अभी भी उपेक्षित-

इस बार भाजपा की बड़ी जीत में आधी आबादी यानी महिलाआंे की बड़ी भूमिका रही। फिर भी मंत्रिमंडल में महिलाओं के प्रतिनिधित्व में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं की गई है। पांच महिलाओं को मंत्री बनाया गया है जिनमें बेबी रानी मौर्या कैबिनेट मंत्री व गुलाब देवी राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार हैं। अन्य महिला मंत्रियों में प्रतिभा शुक्ला, रजनी तिवारी व विजय लक्ष्मी गौतम को राज्य मंत्री बनाया गया है। अपर्णा यादव को योगी की भारी संस्तुति के बावजूद मंत्रिमंडल में शामिल करने की अनुमति नहीं मिल सकी है।

32 वर्षीय दानिस अंसारी एक मात्र मुस्लिम मंत्री हैं। वे छह साल से विधार्थी परिषद से जुड़े रहे। बाद में भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश महामंत्री रहे। दानिस किसी सदन के सदस्य नहीं हैं। उन्हें पिछली बार मंत्री रहे मोहसिन रजा के स्थान पर लाया गया है।

2024 पर निगाह-

भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की निगाह अब 2024 के लोकसभा चुनाव पर है। उत्तर प्रदेश की पूरी 80 सीटें आगामी चुनाव में जीतने की विसात भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने बिछायी है क्योंकि अगर उत्तर प्रदेश में भाजपा की सीटें कम हुई तो केन्द्र में उसे सुविधाजनक बहुमत जुटाने में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा। प्रदेश मंत्रिमंडल के गठन की चाबी केन्द्रीय नेतृत्व ने इसी कारण अपने हाथ में रखी क्योंकि योगी अपने पूर्वाग्रहों से मजबूर हैं जिससे खेल बिगड़ सकता था। उत्तर प्रदेश में ओबीसी की आबादी सबसे ज्यादा है और समाजवादी पार्टी को ओबीसी की पार्टी माना जाता है। अगर योगी को अपने हिसाब से टीम बनानी दी जाती तो वे ओबीसी के मंत्रियों की संख्या सीमित रखते। यह स्थिति भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव में घातक बन जाती। मायावती इस चुनाव के बाद समाप्त प्राय हो चुकी हैं इसलिए उनके कोर वोटरों पर कमंद फैंकने में भी भाजपा कोई गफलत नहीं होने देना चाहती। अमित शाह ने इसी कारण योगी की इच्छा न होते हुए भी इस बार तीन जाटव मंत्री बनवा दिये।

बहरहाल राजनीतिक दृष्टि से बेहद परफेक्ट होने के साथ-साथ योगी-2 मंत्रिमंडल कामकाज में कितना कुशल और प्रभावी साबित होगा यह देखने वाली बात होगी। खासतौर से लोगों की फरियाद पर तत्परतापूर्वक कार्रवाई व रोजमर्रा के भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के मामले में उसकी परफारमेंस उसका परीक्षा फल तय करेगी।    

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