2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में समाजवादी पार्टी का सत्ता में वापस लौटने का ख्वाब भले ही पूरा न हो पाया हो लेकिन इसके बावजूद उसके प्रदर्शन में कुल मिलाकर उसे उत्साहित करने वाले तत्व हैं। समाजवादी पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा है और सीटें भी 125 हो गई हैं। समाजवादी पार्टी ने जिस ढ़ंग से चुनाव लड़ा उसमें कमी ढूढ़ना मुश्किल है। यह पार्टी इससे बेहतर और ज्यादा क्या कर सकती थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में अकाट्य जन समर्थन था जिसे भेदना नितांत मुश्किल हो गया था।
समाजवादी पार्टी ने चुनाव अभियान के दौरान अपनी सारी खामियों को दूर करने में कोई कसर बांकी नहीं रखी थी। 2017 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के पिछड़ने की एक बड़ी वजह सैफई परिवार का एक न रह पाना भी था जिससे समाजवादी पार्टी के कोर वोटरों यानी यादवों में उन्हें भ्रमित करने वाला गलत संदेश गया। 2022 के चुनाव में इसे रोकने के लिए सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल सिंह यादव को चुनाव गठबंधन में अपना लिया ताकि यादव लैंड में वोटों का कोई बिखराव न हो। उन्होंने चाचा की पार्टी प्रगतिशील सपा का समाजवादी पार्टी में विलय भले ही स्वीकार न किया हो पर शिवपाल यादव को अपनी ही पार्टी के चुनाव चिन्ह पर जसवंत नगर के अपने गढ़ से चुनाव मैदान में उतरने की इजाजत दी थी। शिवपाल यादव को जसवंत नगर से जीतना ही था सो वे जीते पर चाचा भतीजा एक होने से यादव लैंड में समाजवादी पार्टी जिस सफलता की उम्मीद कर रही थी बिडम्बना यह है कि उससे उसे महरूम रह जाना पड़ा। समाजवादी पार्टी और इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को निश्चित रूप से इसके कारण गहरा धक्का लगा होगा लेकिन फिर भी किसी ने यह अंदाजा नहीं किया था कि इतनी जल्दी अखिलेश फिर से चाचा को झटकने के मूड में आ जायेंगे।
पर शनिवार को समाजवादी पार्टी के विधान मंडल दल की नया नेता चुनने के लिए आयोजित हुई बैठक में शिवपाल यादव को शामिल होने का निमंत्रण तक नहीं भेजा गया। शिवपाल यादव इससे हतप्रभ हैं और तात्कालिक प्रतिक्रिया में उनका अवसाद छुपा नहीं रह गया। प्रेक्षक यह मानते हैं कि बुद्धिमत्ता का तकाजा यह था कि अखिलेश यादव फिलहाल शिवपाल यादव के साथ गठबंधन को और मजबूत बनाते क्योंकि नई लोकसभा के चुनाव भी निकट हैं जिसमें पार्टी के वर्तमान टैंम्पो को बरकरार रखने के लिए सैफई परिवार की एकजुटता उतना ही महत्व रखती है जितना विधानसभा चुनाव मंे महसूस की गई थी।
समझ में नहीं आता कि चाचा के साथ मेल मिलाप बनाये रखने में अखिलेश को घाटा क्या  हो सकता था सिवाय फायदे के। शिवपाल की उम्र अब इतनी नहीं बची है कि उन्हें अगर सिर पर चढ़ाया जाये तो अगले विधानसभा चुनाव में वे कोई खुराफात कर सकें। उनकी टीम भी बिखर चुकी है। अखिलेश की उपेक्षा और मुलायम सिंह के अदब में शिवपाल द्वारा वक्त का इंतजार करने में इतना वक्त जाया हो गया है कि वे बिना नखदंत के रह गये हैं। अलबत्ता शोभा की मूर्ति के बतौर सपा में उन्हें बनाये रखने की आवश्यकता है ताकि पार्टी के कोर वोटर में आगे भ्रम की गुंजाइश न रह जाये।
लेकिन लगता है कि चाचा को लेकर अखिलेश के मन में कोई ऐसी फांस है जिसे वे निकाल नहीं पा रहे हैं। विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद जब यह स्पष्ट हुआ था कि अभी प्रदेश में विपक्ष की भूमिका ही निभाना उनकी नियति है तो अखिलेश की मंशा शुरूआत में यह बनी कि वे विधानसभा में योगी के सामने बैठकर अपना कद घटाने की बजाय लोकसभा में ही रहे और विधानसभा में चाचा को योगी सरकार के खिलाफ मोर्चा संभालने दें। शायद उनके ऐसे इशारे की वजह से ही मीडिया में यह खबरें आ गई थी कि सपा विधान मंडल दल के नेता शिवपाल यादव बनाये जायेंगे और इन खबरों पर यकीन कर शिवपाल मुदित भी हुए थे।
पर इसके बाद सपा के हल्कों से ही सूत्रों द्वारा मीडिया को खबर दी गई कि अखिलेश खुद विधान मंडल दल में पार्टी के नेता बने रहने के इच्छुक हैं और इसके अनुरूप जब उन्होंने लोकसभा से अपना इस्तीफा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दिया तो इसकी पुष्टि भी हो गई। शिवपाल ने अखिलेश के बदले रूख पर कोई आपत्ति भी जाहिर नहीं की थी न किसी तरह की बगावत का संकेत दिया था। शिवपाल पहले ही जता चुके थे कि वे पूरी तरह परिस्थितियों से समझौता करने के लिए अपने को मानसिक रूप से तैयार कर चुके हैं। आश्चर्य है कि इसके बावजूद अखिलेश का उन पर अविश्वास क्यों गहरा गया।
26 मार्च को सपा विधान मंडल दल की बैठक के दौरान शिवपाल अपने लिए बुलावे का इंतजार करते रहे। उनका कहना है कि पहले वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाने वाले थे लेकिन इसी बैठक के कारण उन्होंने लखनऊ में ही बने रहने का निश्चय किया था। पर पूरे दिन उन्हें बैठक में उपस्थित होने का आग्रह करने के लिए न कोई फोन आया और न कोई संदेश मिला। वे कहते है कि उन्होंने अपनी तरफ से भी सपा के कुछ नेताओं से बातचीत की थी लेकिन संभवतः वे लोग पार्टी सुप्रीमो की मंशा भांपकर खामोश रहने के लिए बाध्य हो गये थे। शिवपाल ने अपने इस तिरस्कार पर निराशा तो प्रकट की है लेकिन उनकी मुद्रा अत्यंत कातर दिखी और जिसमें यह स्पष्ट हो रहा था कि वे अभी अखिलेश से फिर विद्रोह करने की हिम्मत नहीं संजो पा रहे हैं।
शिवपाल को आशा है कि नेता जी यानी उनके बड़े भाई मुलायम सिंह यादव अखिलेश को समझायेंगे लेकिन लगता नहीं है कि मुलायम सिंह अखिलेश पर दबाव बनाना तो दूर कोई बात करने की भी स्थिति में हैं। अखिलेश सारे फैसले खुद करने के अभ्यस्त हो चुके हैं और मुलायम सिंह उनका मूड भांपकर अपना मान बचाये रखने के लिए पुत्र को किसी तरह की राय न देने में ही खैरियत समझ रहे हैं।
चाचा को लेकर अखिलेश के मन में संशय की एक वजह अपर्णा नजर आती हैं। संभवतः उन्हें याद है कि जब पार्टी को लेकर परिवार में झगड़ा चरम पर था तब चाचा शिवपाल सौतेली मां साधना और बहू अपर्णा के साथ खिचड़ी पकाने में कसर बांकी नहीं रख रहे थे। उनकी उस समय की षणयंत्रकारी भूमिका को अखिलेश अभी भी भुला नहीं पाये हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव के समय शिवपाल और अपर्णा की राहें अलग-अलग हो गई थी। शिवपाल भतीजे के आतुरता पूर्ण शरणागत होने के लिए तत्पर थे तो अपर्णा योगी के साथ सहोदर प्रेम में मतबाली हो गयी थी। प्रत्यक्ष तौर पर तो अपर्णा की हैसियत ऐसी नहीं रही जिससे वे भाजपा में शामिल होने के बावजूद सपा में कोइ सेंध लगा पाती फिर भी अखिलेश को उनके जाने का बहुत मलाल है क्योंकि भाजपा खेमे को इसके कारण उनकी पार्टी का मनोबल गिराने के लिए मनोवैज्ञानिक हथियार चलाने का मौका मिल गया। हालांकि फिलहाल तो अपर्णा की स्थिति घर की रही न घाट की, के मानिन्द है। भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने न तो उन्हें टिकट मिलने दिया और न ही योगी को उन्हें अपने मंत्रिमंडल में शामिल करने की इजाजत दी। अखिलेश को इससे संतोष होगा लेकिन उनके दगा देने से जो टीस उनके मन में उभरी है शायद उसकी जद में चाचा भी आ गये हैं।
अखिलेश को लगा है कि अपर्णा के भाजपा में शामिल होकर उनका माहौल बिगाड़ने के खेल में चाचा की भी दुरभिसंधि रही है इसलिए चाचा के प्रति उनका व्यवहार फिर से निर्मम हो गया है। एक पारिवारिक पार्टी की यही बिडम्बना है कि वह महल के अंदर के षणयंत्रों की उठा-पटक झेलते रहने को अभिशप्त होती है। सपा के साथ भी यही हो रहा है। दूसरी ओर भाजपा ने वंशवादी और पारिवारिक राजनीति के खिलाफ जबरदस्त माहौल बना दिया है जिसके रहते सपा के आगे बढ़ने की सीमा तय हो गई है और भविष्य में भी उसे इसकी कीमत चुकाती रहने पड़ेगी। इससे वह तभी उभर सकती है जब वह जीतने के नाम पर गंदे जोड़तोड़ की राजनीति से अपना दामन बचाकर आम आदमी पार्टी जैसी नागरिक मुद्दों पर आधारित राजनीति के लिए काम करने का रोड मैप बना सके और इस मामले में उसे धैर्य दिखाना होगा क्योंकि ऐसी साख बनाने के लिए उसे आगे भी कुछ चुनाव हारते रहना पड़ सकता है।

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