भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान रीतिनीति पौराणिक रूपकों की याद दिलाने वाली है। श्रीमद्भागवत में एक चरित्र है अजामिल का। जिसमें जीवन में अनगिनत पाप किए थे लेकिन अन्त में अपने पुत्र के नाम के कारण उसके मुंह से नारायण निकल गया तो उसे ऊपर वाले ने मोक्ष दे दिया। भारतीय जनता पार्टी ने ऐसे ही न जाने कितने अजामिलों को अपना नाम जपते ही मोक्ष प्रदान करने का रिवाज चला रखा है। भले ही इन अजामिलों के हाथ अतीत में अन्य लोगों के साथ-साथ भाजपा के मासूम कार्यकर्ताओं के खून से रंगे रहे हों। इस कड़ी में उत्तर प्रदेश में एक प्रभावशाली नाम शिवपाल सिंह यादव का जुड़ने जा रहा है जो अपने भतीजे से पूरी तरह निराश होने और पिता के समान सरपरस्त भ्राता मुलायम सिंह का अन्त तक कोई सम्बल न मिल पाने से अपने और अपने बेटे आदित्य के मंझधार में फंसे राजनीतिक कैरियर के उद्धार के लिए शरणागत वत्सल भाजपा के चरणों में लोटने को तत्पर हो चुके हैं।
2017 के पहले जब समाजवादी पार्टी ने सैफई राजकुल का अन्दरूनी महाभारत चरमोत्कर्ष छू रहा था, उस समय मुलायम सिंह यादव अपने अनुज शिवपाल यादव के तरफदार बनकर इकलौेते पुत्र अखिलेश यादव के मुकाबिल थे। सो अपनी राजनीति में शिवपाल यादव के योगदान को बखानते हुए उन्हें चाणक्य जैसा कूटनीतिक सूरमा साबित कर रहे थे। बताते थे कि कैसे जब वे इमरजैन्सी में जेल में बन्द हो गए थे। तब शिवपाल यादव ने पार्टी को सहेजे रखने का कमाल का कौशल दिखाया था। कैसे शिवपाल यादव ने साइकिल से दूर-दूर तक दौरे पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए किए थे।
मुलायम सिंह भी खाता न बही श्रीमान जो कहें वही सही के सिद्धान्त के कायल रहे हैं। सो जो वे कहें उसे सही मानने में ही गनीमत है। जब कि सच्चाई यह है कि इमरजैन्सी के समय मुलायम सिंह का कोई स्वतंत्र राजनीतिक वजूद नहीं बन पाया था। वे सपा की पूर्वज पार्टियों में उभरते हुए कार्यकर्ता की पहचान भर बना पाए थे। यहां तक कि 1989 में जनता दल के सत्ता में आने पर उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के लिए कठिन शक्ति परीक्षण से गुजरना पड़ा था जिसमें शिवपाल की भूमिका की कोई चर्चा नहीं की जा सकती थी। मुख्यमंत्री बनने के बाद पहली बार शिवपाल को राजनीति में जगह दिलाने के लिए वे उन्हें काफी जोर लगाकर इटावा जिला सहकारी बैंक का अध्यक्ष भर बना सके थे।
समाजवादी आन्दोलन की कैसे उत्तर प्रदेश में लोकतंत्र में राजवंश रोपने की परिणति पर पहुंचा। इस इतिहास से सभी परिचित हैं। बिडम्बना है कि एक पवित्र आन्दोलन को खानदानवाद की कर्मनाशा में गर्क करने के जिम्मेदार बने वे समाजवादी पुरोधा जो गफलत में आज भी विभूतियों में शुमार दिखते हैं। इनमें मधु लिमये से लेकर जनेश्वर मिश्र और मोहन सिंह तक के नाम लिए जा सकते हैं। इस स्थिति विकास के अनिवार्य क्रम में 2003 में शिवपाल यादव जब किंगमेकर बनकर उभरे और मुलायम सिंह को बसपा में तोड़फोड़ कराकर उन्होंने तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाया तो सपा के सबसे बड़े शक्ति केन्द्र के रूप में उनका स्थापित हो जाना लाजमी था। शिवपाल न भाषण दे पाते हैं और न किसी वैचारिक सैद्धान्तिक आवरण से उनका कोई परिचय है। वे सीधे-सीधे कबीलाई युग के वीरभोग्या वसुंधरा के उसूल में विश्वास रखते रहे हैं। इसी के दम पर उनकी संगठन क्षमता और सपा कार्यकर्ताओं में उनकी पकड़ के चर्चे खूब हुए थे। इस दृष्टि से प्रदेश में उन्हीं को मुलायम सिंह का उत्तराधिकारी बनना था पर बड़े भाई ने ही उनके साथ दांव कर दिया। 2012 में उन्होंने बहुत सधे अन्दाज में शिवपाल ंिसंह यादव को किनारे धकेलकर पुत्र अखिलेश यादव को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी तो शिवपाल हक्के-बक्के रह गए थे।
स्वाभाविक है कि शिवपाल यादव को अखिलेश के लिए अपने हक को मारा जाना हजम नहीं हुआ था। जिससे सपा में षड़यंत्रों का दौर चल पड़ा था। सांस्कृतिक स्तर पर भी शिवपाल और अखिलेश में जमीन आसमान का अन्तर रहा जो अनदेखा नहीं किया जा सकता था। आधुनिक पढ़ाई लिखाई के कारण अखिलेश यादव को शिवपाल समेत परिवार की पुरानी पीढ़ी के बाहुबली, माफिया नवरत्न गवारा नहीं थे। उन्होंने बुर्जुआजी लोकतंत्र की उस धारा का वरण अपनी प्रकृति के चलते किया जिसमें मध्य वर्ग का दिल जीतने की लालसा रहती है। जाहिर है कि उन्होंने इसी के तहत पार्टी में अवांछनीय और अराजक तत्वों को निथारकर नफासत भरे चेहरे आगे लाने की मुहिम चलाई और नवोन्मेष से युक्त विकास पर जोर देना शुरू किया। यह दूसरी बात है कि इस बीच मोदी ने हिन्दुत्व की ऐसी सुनामी घटित करदी जिसमें सब कुछ और बह जाना ही था और 2017 में अखिलेश को इस का शिकार हो जाना पड़ा।
अब उत्तर प्रदेश में योगी की राजनीति का फण्डा अलग है। वे मुख्य प्रतिद्वन्दी दल सपा को उस पर मनोवैज्ञानिक निशाने के द्वारा लगातार पछाड़ने का तानाबाना बुनने में लगे हैं। विधानसभा के हालिया चुनाव का नगाड़ा बजने के पहले उन्होंने सैफई कुनबे में सेंध लगाते हुए मुलायम सिंह की तथाकथित छोटी बहू अपर्णा को फोड़ लिया था। अपर्णा पर उनके सजातीय पहाड़ी होने के कारण साफ झलकता है कि योगी का उन पर कुछ ज्यादा ही अनुग्रह है। वे उन्हें कमल निशान पर विधानसभा का चुनाव लड़वाना चाहते थे पर भाजपा हाइकमान ने उनकी मंशा पर ब्रेक लगा दिया। इस बीच विधानसभा चुनाव में एक बार फिर योगी सरकार को भारी बहुमत मिला जो पार्टी में योगी की धाक और मजबूती से जम गई। इसके कारण योगी ने एक बार फिर अपर्णा के लिए जोर लगा दिया। उन्हें अपने मंत्रिमण्डल में शामिल करने की कोशिश की लेकिन फिर पार्टी हाइकमान आड़े आ गया।
इसी श्रंखला में योगी अब शिवपाल पर चारा डालने को उद्यत हैं ताकि अपर्णा के भाजपा के पाले में आने से अखिलेश को जिस किरकिरी का एहसास कराया गया है उसमें और पैनापन घोला जा सके। शिवपाल की हालत वैसे भी अखिलेश ने दीनहीन की बना दी थी। उनके लिए बमुश्किल जसवन्तनगर की सीट छोड़ी थी। इसके अलावा कोई और सीट यहां तक कि उनके पुत्र आदित्य के लिए भी सीट छोड़ना उन्होंने मंजूर नहीं किया था। फिर भी स्थितियों से समझौता कर शिवपाल अखिलेश की लातें खाने के लिए तैयार बने रहे थे। इस उम्मीद में कि हालात जल्द ही बदल सकेंगे और अखिलेश दया दिखाकर उनके पुत्र आदित्य का कैरियर संवारने में सहयोग देने को राजी हो सकेंगे।
उधर चुनाव बाद नेता प्रतिपक्ष को लेकर समाजवादी पार्टी में कुछ दिनों ऊहापोह की स्थिति बनी रही। मीडिया में खबरें आ रहीं थीं कि अखिलेश का इरादा स्वयं लोकसभा में ही बने रहकर नेता प्रतिपक्ष का ओहदा चाचा शिवपाल को सौंपने का है तो शिवपाल उत्साहित हो गए और अपने दिन बहुरने का दिवास्वप्न देखने लगे। पर जल्द ही उनका भ्रम टूटने के आसार बन गए। सैफई परिवार के होली मिलन में ही इसकी झलक मिल गई थी जब अखिलेश ने शिवपाल का यथायोग्य सम्मान न करके सभी के सामने उन्हें नजरअन्दाज कर दिया। जो लोग समझदार थे वे इस घटना में छिपे सन्देश को पढ़ चुके थे। इसके बाद अखिलेश ने अचानक आजमगढ़ की लोकसभा सीट से अपना इस्तीफा अध्यक्ष ओम बिड़ला को दिल्ली जाकर सौंप डाला और 26 मार्च को विधानमण्डल दल का नेता चुनने की बैठक आहूत कर दी। जिसमें शामिल होने के लिए चाचा शिवपाल को निमंत्रण तक नहीं भेजा। इस बीच शिवपाल उम्मीद कर रहे थे कि वे अखिलेश से आजमगढ़ सीट अपने बेटे आदित्य को देने के लिए रजामन्द कर लेंगे लेकिन अखिलेश की बेरुखी से उनके सारे अरमान चकनाचूर हो गए।
समाजवादी पार्टी में शिवपाल के पुनर्वास के सभी द्वार जब बन्द होते दिखे तो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन पर डोरे डालने की पहल कर डाली। इस क्रम में न केवल योगी शिवपाल से भेंट कर चुके हैं बल्कि शिवपाल ने भाजपा के केन्द्रीय नेताओं से भी भेंट कर डाली है। उन्होंने अपने ट्विटर अकाउण्ट से मोदी और अमित शाह को फालो करना शुरू कर दिया है। शिवपाल को भाजपा द्वारा राज्यसभा में पहुंचाने अथवा विधानसभा उपाध्यक्ष बनाने जैसी अटकलों का बाजार भी गर्म हो चला है। इसके चलते राजनीतिक विश्लेषक यह आंकलन करने में लग गए हैं कि शिवपाल के पाला बदल से सपा को कितना नुकसान होगा। कुछ विश्लेषक सपा के संगठन में शिवपाल के रहे वर्चस्व के मद्देनजर अन्दाजा लगा रहे हैं कि अगर वे भाजपा में पहुंच गए तो सपा को भारी नुकसान पहुंचाएंगे। फिर भी अखिलेश शिवपाल को लेकर बेपरवाही बनाए हुए हैं।
अधीर राजनीतिक प्रेक्षक भले ही अखिलेश के रुख को आत्मघाती साबित करने में लगे हों लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता। शिवपाल को पार्टी से बाहर जाने के लिए धकेलना अखिलेश की सोची समझी रणनीति भी हो सकती है जिसमें सपा के कायाकल्प की सम्भावनाएं निहित हैं। अखिलेश को अपने मिजाज के अनुरूप पार्टी को ढालनेे के लिए मुलायम सिंह के जमाने के बदनाम तत्वों को छांटने की जरूरत महसूस हो रही है तो यह स्वाभाविक ही है। अखिलेश ने हालिया विधानसभा चुनाव में सपा का नया लुभावना चेहरा मतदाताओं के सामने लाने की कोशिश की थी लेकिन इसमें कहीं न कहीं अधूरापन था जिससे मतदाताओं की आशंकाएं मिट नहीं पाईं। मतदाताओं को यह विश्वास नहीं हो पाया कि अखिलेश के सत्ता में आने से मुलायम सिंह के युग जैसी धांधली और गुण्डागर्दी की पुनरावृत्ति बे रोक पाएंगे। इसलिए भाजपा से खिन्न होते हुए भी लोगों ने फिलहाल भाजपा को ही अवसर देने में गनीमत समझी। कहीं न कहीं अखिलेश को इसका भान है इसलिए वे चाचा शिवपाल जैसे नेताओं से पार्टी का दामन छुड़ाना चाहते हैं ताकि अगली बार मतदाताओं के मन में उन्हें लेकर कोई सन्देह न रह सके। हो सकता है कि इसके बावजूद अखिलेश को अभी एक चुनाव के बाद और तक की प्रतीक्षा करना पड़े। पर अगर वे इसके लिए मानसिक रूप से मजबूत रहे तो निश्चित रूप से उनकी उम्मीदें पूरी होने के आसार हैं। शायद इसीलिए अखिलेश ने भाजपा को यह जवाब देने का इरादा बना लिया है कि चाचा शिवपाल तुम्हीं को मुबारक हों।

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