
सामाजिक प्रश्नों पर भाजपा को फिलहाल दो घोड़ों की सवारी रास आ रही है। पार्टी का वैचारिक अधिष्ठान वैसे तो आरक्षण की व्यवस्था के विरोध में है लेकिन व्यवहार में यह पार्टी कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण के बचाव हेतु राजनीतिक बाध्यताओं के कारण विवश है। इस तरह उसका आचरण कपटपूर्ण बन गया है जो समाज के दूरगामी हितों के प्रतिकूल है।
आरक्षण चर्चा का ताजा संदर्भ-
आरक्षण पर चर्चा का तात्कालिक संदर्भ उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति पर केन्द्र सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे से संबंधित है। इस हलफनामे में सरकार ने पदोन्नति में भी आरक्षण की व्यवस्था का बचाव किया है और कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण के लाभों को अवैध घोषित कर दिया गया तो कई समस्यायें पैदा हो सकती हैं। इस प्रावधान के तहत प्रमोट हुए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अधिकारियों को रिवर्ट करना पड़ेगा। उनसे इस दौरान की वेतन वृद्धियों की रिकवरी करनी पड़ेगी और पेंशन के निर्धारण में भी कटौती का कदम उठाना पड़ेगा जो इस वर्ग में व्यापक असंतोष को जन्म देगा।
हलफनामे में उसने केन्द्रीय मंत्रालय और विभागों के आरक्षण के बावत आंकड़ों का खुलासा भी किया है। बताया गया है कि केन्द्र के कुल 27 लाख 55 हजार अधिकारियों, कर्मचारियों में 4 लाख 79 हजार 148 पिछड़े वर्ग के हैं और शेष जनरल कैटेगरी के। स्पष्ट है कि जनरल कास्ट के लोगों को वर्चस्व 50 प्रतिशत से अधिक का है और यह अनुपात उनकी आबादी के प्रतिशत की तुलना में बहुत अधिक है। हालांकि जनरल वर्ग में हिन्दू सवर्णो के साथ मुस्लिम समाज भी शुमार है।
भाजपा में वैचारिक खींचतान का अखाड़ा-
भाजपा की वर्तमान स्थिति आजादी के पहले की कांग्रेस जैसी कुछ-कुछ है जिसमें वैचारिक स्तर पर बड़ा घालमेल दिखता है। आजादी के पहले कांग्रेस में समाजवादी और वाम विचारों का प्रतिनिधित्व करने वाले भी थे तो दक्षिणपंथी आर्थिक विचारों को लागू करने के पक्षधरों के लिए भी कांग्रेस एक मंच थी। सामाजिक स्तर पर वे लोग भी थे जो रूढ़िवादी ढ़ांचे को परिवर्तित करने के लिए कदम उठाने पर बल देते थे तो वर्ण व्यवस्था को सही साबित करने और उसकी मजबूती के लिए कार्य करने को प्रतिबद्ध तबका भी था। यहां तक कि लोकमान्य तिलक जैसे प्रतिष्ठित नेता भी छुआछूत जैसी बुराई को हिन्दू समाज की विशेषता बताते थे और उसमें कोई बदलाव न आने देने की कटिबद्धता जताते हुए हिचकते नहीं थे।
आज भाजपा भी सामाजिक मामलों में एक साथ दो घोड़े साधने के सवार जैसा करतब दिखा रही है। भाजपा का वैचारिक अधिष्ठान संघ ऐसे संगठनों को भी पोषित कर रहा है जो संघ की मुख्य धारा द्वारा लागू की जाने वाली नीतियों के विरूद्ध अग्रसर हैं। इनके विचारों में सुधार लाने की बजाय संघ प्रच्छन्न रूप से इनकी लाइन को प्रोत्साहित करता है तो दूसरी ओर हिन्दू समाज में सुधारवादी प्रक्रियाओं को भी अपनाता है। ऐसे कारणों से संघ परिवार और भाजपा कई बार वैचारिक अराजकता के अखाड़े प्रतीत होने लगते हैं जिससे उसकी सरकार को समय-समय पर धर्म संकट का सामना करना पड़ जाता है। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अपनी सरकार के पहले कार्यकाल में गौ रक्षा के नाम पर हो रही माब लिचिंग की घटनाओं से विचलित होकर सार्वजनिक रूप से अपना क्षोभ यह कहते हुए प्रदर्शित करना पड़ा था कि ऐसी हरकतें करने वाले वास्तविक गौरक्षक न होकर गुंडे और मवाली है। हालांकि अब उनका रवैया बदल चुका है और वे इस बीच देश के मानस की ब्रेन वाशिंग को भांपकर आश्वस्त हैं कि ऐसे तत्वों के आचरण के कारण राजनीतिक नुकसान होने की गंुजाइश खत्म हो चुकी है इसलिए इन तत्वों को टोकने की कोई जरूरत अब नहीं रह गई है।
आरक्षण व्यवस्था में सवर्णों की सहमति दरकाने का कौन है जिम्मेदार’-
जहां तक आरक्षण की बात है सामाजिक न्याय के लिए कमजोर वर्ग को विशेष अवसर देने के पक्ष में आजादी के बाद के राजनीतिक नेतृत्व ने काफी हद तक माहौल बना लिया था। संविधान सभा के समय तो सरदार पटेल तक ऐसे किसी प्रावधान का विरोध कर रहे थे लेकिन इसके बाद यह मान लिया गया था कि मन बे मन से कैसे भी इस प्रावधान हेतु सहमति रखी जानी चाहिए क्योंकि यह वक्त का तकाजा है। कांग्रेस के समय हेमबती नंदन बहुगुणा जैसे मुख्यमंत्रियों ने प्रावधान कर दिया था कि हर जिले में डीएम और पुलिस प्रमुख में से एक पद पर अनुसूचित जाति के अधिकारी की तैनाती अनिवार्य होगी। उत्तर प्रदेश की ही बात करें तो 1988 में नारायण दत्त तिवारी ने राज्य सरकार की नौकरियों में 15 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए अनुसूचित जाति, जनजाति आरक्षण के अतिरिक्त आरक्षित किये जाने की व्यवस्था की थी। तत्कालीन स्थितियों में सवर्णो की ओर से प्रकट में ऐसे कदमों को लेकर व्यापक विरोध की स्थितियां सामने नहीं आयी थी।
आरक्षण के खिलाफ असंतोष का विस्फोट वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में पहली बार हुआ जब उन्होंने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा की। इसमें जनरल कास्ट के लोगों को सरकारी नौकरियों में उनकी इजारेदारी खत्म होने का जोखिम दिखाकर इसे बचाने के लिए उकसाया गया था और कहा जाता है कि इस उकसावे में पर्दे के पीछे भाजपा और उसके मास्टर माइंड संगठनों ने मुख्य भूमिका निभायी थी। दूसरी ओर ंसंघ परिवार बहुसंख्यक बहुजन वर्ग पर कमंग फैकने के लिए भी सचेत रहा। कट्टर सवर्णवाद के पुनरूत्थान के माहौल के बीच धार्मिक भावनाओं का बघार लगाकर उसने ऐसी फ्राई बनाई कि उत्तर भारत के कुछ बड़े राज्यों में उसे सत्ता में आने का मौका मिल गया और इस दौरान मुख्यमंत्रियों के चयन में उसने तात्कालिक प्रबंधन के तहत पिछड़ी जाति के नेताओं को वरीयता दी। इस तरह उसने अपना विस्तार करते हुए अंततोगत्वा प्रधानमंत्री पद के लिए भी वंचित तबके का एक चेहरा पेश कर डाला और यह ट्रम्प कार्ड उम्मीद से ज्यादा सफल रहा। हालांकि इसके पीछे संगठनात्मक प्रबंधन, कुशल प्रोपोगंडा के इस्तेमाल जैसे अन्य कारक भी हैं।
पर मूल रूप से जिन तबकों को भाजपा की वर्ग सत्ता के रूप में चिहिंत किया जा सकता है उनका अल्टीमेट गोल वर्ण व्यवस्था की बहाली है और इस दिशा में भाजपा का काम अभी जारी है। इसके चलते देश में भाजपा के चक्रवर्ती साम्राज्य स्थापित होने के बाद से आरक्षण के विरोध में माहौल अत्यंत कटु होता जा रहा है। इसी क्रम में जाति श्रेष्ठता को नये सिरे से मान्यता दिलाने की कशिश भी उग्र स्तर पर उभर रही है। इस जहर को फैलाने में सोशल मीडिया के फेसबुक, व्हाट्सअप और ट्विटर जैसे मंच बड़ी भूमिका अदा कर रहे हैं।
गुम हुआ पिछड़ों ने बांधी गांठ…….का नारा-
डा0 लोहिया स्वयं भी जनरल कास्ट के थे और उन्होंने अपने साथ जनरल कास्ट के तेजस्वी नेताओं की ऐसी पंक्ति तैयार कर ली थी जो पिछड़ों ने बांधी गांठ सौ में पावे साठ का नारा बुलंद करने लगी थी। पर अब ऐसी स्थिति की कोई गुंजाइश नहीं बची है और आरक्षण के मुद्दे पर बड़ी खाई पैदा होती जा रही है। भाजपा की इस मामले में सामंजस्य बनाने में कोई रूचि नहीं है क्योंकि उसने अपने दोनों हाथों में लड्डू ले रखे हैं। साथ में मीडिया उसके अंतरविरोधों को पर्दे में रखने में उसकी सहायता कर रहा है इसलिए पदोन्नति में आरक्षण के पक्ष में उसके द्वारा अपनाये गये स्टैंड की खबर मीडिया में बहुत उजागर होकर सामने नहीं लाने दी गई है।
बहरहाल आरक्षण की व्यवस्था नये भारत के निर्माण का अंतिम लक्ष्य नहीं है पर इसे अपना उद्देश्य पूरा कर लेने तक जनरल कास्ट को पहले की तरह विश्वास में लिया जाना भी आवश्यक है जिसके लिए कपटपूर्ण आचरण को तिलांजलि दिया जाना अपरिहार्य है। भाजपा को कायदे से अपने कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए दीक्षित करना चाहिए कि वे आरक्षण को लेकर दुराग्रह छोड़कर सकारात्मक दृष्टिकोण अपनायें। उन्हें इसके इतिहास से परिचित कराना होगा कि विशेष अवसर के सिद्धांत की शुरूआत भारत से नहीं हुई बल्कि अमेरिका और कनाडा जैसे देशों में पहले यह प्रावधान किये गये थे। दूसरी ओर आरक्षण से लाभांन्वित वर्गों में यह स्पष्ट करने की जरूरत है कि इसके प्रावधान हमेशा के लिए नहीं हैं। उनमें प्रतिस्पर्धी जिजीविषा लानी होगी ताकि वे मेरिट में बिना किसी बैशाखी के जनरल कैटेगरी के मुकाबले आगे निकलकर दिखा सकें। बाबा साहब अम्बेडकर जब तक भारत में रहे उनका मेट्रिकुलेशन तक का प्रदर्शन औसत से भी नीचे का था लेकिन विदेश में पहुंचने पर सकारात्मक माहौल मिलने के बाद उनके अंदर प्रतिभा का ऐसा विस्फोट हुआ कि वे कोलम्बिया विश्वविद्यालय के अभी तक के सबसे मेधावी छात्र के रूप में समादृत किये गये।
कैसे हासिल हो नागरिक समाज के निर्माण का अल्टीमेट गोल-
देश में लोकतंत्र के सफर को मुकम्मल मंजिल तक पहुंचाने के लिए जाति व्यवस्थायें जैसी पुरानी संरचानाओं को पूरी तरह ध्वस्त करके नागरिक समाज की बुलंद इमारत खड़ी करना नये भारत के निर्माण की दिशा में अल्टीमेट गोल है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि इसमें आरक्षण की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी पर जन्म जात श्रेष्ठता का जाति आधारित दंभ कायम रहा तो यह कैसे होगा क्योंकि इसके रहते पुरानी संरचनाओं का मलबा साफ नहीं हो सकता। जो भी हो पदोन्नति में आरक्षण की व्यवस्था के बचाव के लिए केन्द्र सरकार ने जो कदम उठाया है फिलहाल उसे स्वागत योग्य माना जाये।







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