दलित चिंतकों की विचारधारा भाजपा और संघ परिवार को प्राय असहज करती रही है लेकिन उसने बहुत पहले समन्वयवाद के प्रेरणाश्रोत के रूप में बाबा साहब अम्बेडकर के योगदान को समादृत करना प्रारम्भ कर दिया था। निश्चित रूप से संघ परिवार की इसके पीछे बड़ी सूझबूझ रही है। हालांकि अभी भी कट्टर सवर्णों में बाबा साहब को सबसे बड़ा खलनायक मानने की ग्रन्थि का उन्मूलन संघ परिवार नहीं कर सका है।
इस्लामिक कट्टरवाद के विरोध में बाबा साहब द्वारा लिखी गई पुस्तक को आधार बनाकर संघ परिवार ने एक सेतु बनाया था जिससे वे कट्टर सवर्णों के बीच में भी स्वीकार्य हो सकें। लेकिन यह बाबा साहब की विचारधारा का एक संदर्भ है जबकि उनकी विचारधारा का फलक इससे कहीं बहुत ज्यादा विहंगम है जिसके सकारात्मक फलितार्थ तो बहुत दूर तक संघ परिवार भुनाना चाहता है।
कुछ ऐतिहासिक कारणों से कांग्रेस को बाबा साहब से दुराव की नीति अपनानी पड़ी जबकि महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें संविधान सभा की मसौदा समिति का अध्यक्ष पद स्वीकारने के लिए मनाने हेतु ईमानदारी से प्रयास किया था और नेहरू ने उन्हें अपने पहले मंत्रिमंडल में ससम्मान स्थान भी दिया था। बाबा साहब जिस हिन्दू मैरिज एक्ट के कारण उनके मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने को तत्पर हुए थे उसमें नेहरू तो उन्हीं के स्टैंड के पक्षधर थे लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 राजेन्द्र प्रसाद व कांग्रेस की अन्य प्रभावशाली अनुदार लाबी के कारण वे उनका बचाव नहीं कर सके थे।
बाबा साहब के विरोधी खेमे में चले जाने के बावजूद कांग्रेस ने लम्बे समय तक ब्राह्मण और मुस्लिम समुदाय के साथ दलितों की त्रयी अपने समर्थन में बनाकर देश पर राज किया था। इस त्रयी को तोड़कर कांग्रेस को परे धकेलने के लिए संघ ने शुरू से तपस्या की हद तक जद्दोजहद की। आज जब मोदी के रूप में संघ परिवार को अपनी लाइन के एम्प्लीफायर के बतौर एक नेतृत्व हासिल हुआ है तो उसके प्रयास तेजी से कारगर होने लगे हैं।
आजादी के कुछ समय बाद ही डा0 लोहिया ने कांग्रेस का तख्ता पलट करने के लिए वैकल्पिक सामाजिक गठबंधन के सूत्रपात की दिशा में बाबा साहब से संपर्क किया था। उनके प्रयास कुछ रंग लाते लेकिन इसके पहले ही बाबा साहब का निधन हो गया। इसके बाद वीपी सिंह ने प्रधानमंत्री बनने पर इस दिशा में आगे बढ़ते हुए मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने के पहले बाबा साहब को मरणोपरांत भारत रत्न घोषित किया तो एक बार फिर लोहिया का वैकल्पिक सामाजिक गठबंधन का सपना साकार होने के आसार बने लेकिन उनके प्रयासों पर लोकदल के कुलक चरित्र के पिछड़े नेताओं के कारण पानी फिर गया जिनके और दलितों के बीच वर्ग सामंजस्य संभव नहीं हो सकता था। उन्होंने बाबा साहब अम्बेडकर की महत्वा को स्वीकार करना गवारा नहीं किया।
रिडिल्स इन हिन्दुइज्म जैसी बाबा साहब की रचनायें संघ के लिए बेहद अप्रीतिकर हैं लेकिन उसे बाबा साहब के जिन विचारों ने बहुत प्रभावित किया है वह है उनकी राष्ट्रीय निष्ठा जिसके लिए उनके विचार भारतीय समाज में नये सिरे से एकता के जबरदस्त बीज बोने वाले रहे हैं।
दलित चिंतकों का एक बड़ा तबका मूल भारतीय और उस पर आधिपत्य स्थापित करने वाली बाहरी कौम के संघर्ष की थ्योरी पर बल देता रहा है जबकि बाबा साहब ने पहली बार और बहुत ही विलक्षण तार्किकता के साथ यह स्थापित किया था कि सवर्णों और अछूत सहित शूद्रों के बीच कोई नस्लगत भेद नहीं है यानी वे एक ही पूर्वजों की संतान हैं। उन्होंने वैदिक काल में जाति व्यवस्था के सूत्रपात हो जाने की थ्योरी नकारते हुए लिखा है कि ऋग्वेद के जिस पुरूष सूक्त को शूद्रों को निम्न स्थिति में पहुंचाने का उदघोषक माना जाता है वह मूल ऋग्वेद में शामिल ही नहीं था उसे बाद में प्रक्षिप्त किया गया है यह मानने के पीछे उन्होंने यह शोध प्रस्तुत की कि ऋग्वेद की ऋचायें जिस मीटर में रची गई हैं पुरूष सूक्त का मीटर उससे इतर है।
कायदे से संघ परिवार को बाबा साहब की इस मान्यता से सवर्णों को परिचित कराने का बड़ा अभियान चलाना चाहिए ताकि उनमें अपने दूसरे बंधुओं के प्रति ईमानदारी से भाईचारे की भावना पनप सके और वे उनके जातिपात के निर्धारण और कई जातियों को अछूत तक बनाने के कारणों के बावत बाबा साहब के वैज्ञानिक अनुमानों को समझ सकें व अपने को जन्मना श्रेष्ठ मानने की गंदगी से मुक्त करके सभी को आगे बढ़ने का अवसर देने के लिए प्रवर्त कर सकें।
बाबा साहब की राष्ट्रीय निष्ठा के लिए एक और मिसाल है जो संघ परिवार को राष्ट्रवाद के कारण बहुत मोहित करती होगी। बाबा साहब ने जब हिन्दू धर्म की दंशनाओं से क्रोधित होकर यह निश्चय किया कि इस धर्म में जन्म लेना तो उनके वश में नहीं था पर वे अपने जीवन का उपसंहार इस धर्म में बने रहकर नहीं होने देगें तो उन्होंने अन्य धर्मो का कई वर्षो तक व्यापक अध्ययन किया। इस दौरान उनके सामने मुस्लिम या ईसाई बनने के बेशुमार प्रस्ताव आये जिनमें उन्हें आकर्षक प्रलोभन दिये गये थे पर वे सिर्फ ऐसे धर्म को ही राष्ट्रीय निष्ठा के कारण स्वीकार करना चाहते थे जिसका सूत्रपात भारत की धरती से हुआ हो इसलिए उन्होंने सारे अन्य प्रस्तावों को तिलांजलि देकर बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। इसमें उनके राष्ट्रीय अनुराग की पराकाष्ठा देखी जा सकती है क्योंकि बौद्ध धम्म ही है जिसके कारण सारे विश्व के लिए भारत वर्ष गुरू की भूमि के रूप में वंदनीय हुआ था और बौद्ध धम्म के अनुयायी के नाते ही सम्राट अशोक के काल को भारत का सर्वाधिक स्वर्णिम युग इतिहास में माना गया है।
साथ ही बाबा साहब अम्बेडकर का मानना यह भी था कि उनके पूर्वज हमेशा से अछूत न होकर नागवंशीय क्षत्रिय थे जो कि बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। बाद में जब वे बौद्ध धर्म के परित्याग के लिए सहमत नहीं हुए तो उन्हें प्रताड़ना के तौर पर अछूत स्थिति में धकेल दिया गया। उनकी यह स्थापना इसलिए तर्क संम्मत लगती है कि पहले उनकी जाति महार को मार्शल माना जाता था और ब्रिटिश काल में उनकी जाति के नाम पर अलग से महार रेजिमेंट तब तक चलती रही थी जब तक कि कट्टर हिन्दू नेताओं ने ब्रिटिश शासन पर जोर डालकर इसे समाप्त नहीं करा दिया।
बाबा साहब की पढ़ाई अमेरिका और इंग्लैंड में हुई थी जो उनके समय ही दुनिया के सबसे उन्नत लोकतांत्रिक देशों के रूप में स्थापित हो गये थे। इसके अलावा बौद्धकाल में भी गणतंत्रों का शासन देश में प्रचलित था जिससे बौद्ध संस्कृति के अनुगमन के चलते भी वे लोकतांत्रिक आदर्शो में रच बस गये थे। उन्होंने इन्हीं आदर्शो के अनुरूप नये भारत के उदय का सपना देखा था जिसमें जातिगत मुद्दों और प्रभुत्व का स्थान न होकर नागरिक चेतना के आधार पर चुनाव में राजनीतिक पार्टियों के भाग्य का फैसला हुआ करेगी। जिन लोगों ने अम्बेडकरवादी का बहुरूप धारण करके जातिगत संरचनाओं की समाप्ति की वकालत करने की बजाय उसका पिरामिड उलटकर नया निजाम लाने की वकालत शुरू की वे दरअसल अम्बेडकरवाद को जानते नहीं हैं। अम्बेडकरवाद तब सफल होगा जबकि सही मायने में जनसेवा पर खरा और सुयोग्य दलित नेता के लिए सवर्ण बाहुल्य क्षेत्र से चुनाव जीतने में कोई कठिनाई न हो इसी तरह दलित बाहुल्य क्षेत्र में ऐसे ही गुण वाले सवर्ण नेता को कंठहार बनाने में हिचक न दिखायी जाये। यह स्थितियां आने में अभी बहुत देर लगती है लेकिन संघ अगर ईमानदारी से सवर्ण अहंकार को तृप्त करते रहने का मोह छोड़ दे और सही मायने में अम्बेडकरवाद का अनुशीलन करे तो यह देश जातिवादी जकड़न से उबरकर नागरिक समाज वाले देश में सचमुच तब्दील हो सकता है।

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