
बुन्देलखण्ड का इलाका उत्तर प्रदेश के सबसे पिछड़े अंचलों में गिना जाता है। लेकिन यह धार्मिक महत्व का इलाका भी है। माना जाता है कि रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास की जन्म भूमि और कर्मभूमि दोनों बुन्देलखण्ड में थी इसलिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस अंचल के प्रति विशेष अनुराग सर्व विदित है। उत्तर प्रदेश के बुन्देलखण्ड को प्रशासनिक दृष्टिकोण से अब दो भागों में विभक्त कर दिया गया है। झांसी मंडल अलग हो गया है और बांदा मंडल चित्रकूट मंडल के नाम से अलग है। पुलिस की दृष्टिकोण से तो और अधिक भिन्नता है। झांसी रेंज कानपुर जोन का हिस्सा है जबकि बांदा रेंज अभी भी इलाहाबाद जोन में ही शामिल रखा गया है।
बुन्देलखण्ड के कायाकल्प की मशक्कत-
गत दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने झांसी मंडल में दो दिन प्रवास किया। समग्र बुन्देलखण्ड की पानी की समस्या झांसी मंडल में भी गहराई रहती है जिसके स्थायी निराकरण के लिए प्रदेश के जल शक्ति मंत्रालय से कई पेयजल और सिचाई की नयी परियोजनायें शुरू की गई हैं जिनके पूरे हो जाने के बाद यहां की तस्वीर बदल जाने की बहुत ही सुनहरी आशायें जगमगा रही हैं। झांसी जिले में डिफेंस कारिडोर बन रहा है जिससे देश के रक्षा मानचित्र पर यह अंचल अंकित हो जाने वाला है। इसमें रोजगार की तमाम संभावनायें सृजित होने के अनुमान भी निहित किये गये हैं जो यहां पलायन को रोकने में मददगार सिद्ध होंगे। साथ-साथ में बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस-वे का जिक्र भी जरूरी है जिसका निर्माण अंतिम चरण में है। अगले महीने इसका लोकार्पण हो जाने की उम्मीद राज्य सरकार संजोये हुए है।
मंडल की जमीनी हकीकत की नब्ज पर सीएम की गजब की है पकड़-
झांसी मंडल के प्रवास में मुख्यमंत्री ने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं जिनसे यह आभास किया गया कि यहां की जमीनी स्थिति की नब्ज पर भी उनकी अच्छी पकड़ है। योगी-01 में कोरोना की आपातकालीन स्थितियों से जूझने में उनकी सरकार की सारी योजनायें गड़बड़ा गई थी लेकिन जिस तरह की बातें उन्होंने यहां के हालिया प्रवास में की उससे लगता है कि उनके पास यहां की स्थिति को लेकर जो फीडबैक है उसके मद्देनजर योगी-02 में जल्द ही वे ऐसे कदम उठाने की शुरूआत करेंगे जिससे यहां ठोस बदलाव होता नजर आ सके।
भू माफियाओं से मिली भगत को लेकर बेनकाब हुए तो सकपकाये अधिकारी-
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अंदाज तो बहुत मुंहफट तो रहता ही है। इस कारण उन्हांेने झांसी में साफ कह दिया कि भूमि माफियाओं के खिलाफ अन्य मंडलों की तरह यहां कोई कार्रवाई नहीं की गई तो जिम्मेदार अधिकारियों का मुंह इस तरह फक हो गया जैसे उन्हें चोरी करते पकड़ लिया गया हो। शायद वे इस गलतफहमी में थे कि मुख्यमंत्री को झांसी में इस कार्रवाई को लेकर कोई ज्यादा ध्यान नहीं है इसलिए उन्होंने कभी इसके संबंध में वैसा दवाब नहीं बनाया जैसा शुरू में अंदाजा जा रहा था। दरअसल जमीनों और अन्य अचल संपत्तियों पर कब्जे के मामले में इटावा, एटा, कन्नौज, आगरा, कानपुर, प्रयागराज, मऊ आदि जनपदों से झांसी कम कुख्यात नहीं रहा। साईकिल पार्टी के जो लोग साईकिल की हैसियत भी नहीं रखते थे उन्होंने गुंडई और आतंक के बल पर पूरी झांसी में अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया था। सबसे ज्यादा जमीनें और मकान यहां भाजपा के लोगों के ही छीने गये थे और लोगों ने योगी के पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर उम्मीद की थी कि सपा सरकार में दिग्गज बन चुके ऐसे लोगों को अब औकात में लाया जायेगा और कब्जे के शिकार जमीन मकान वालों को अपनी जायदाद वापस मिल सकेगी लेकिन ऐसे लोग अभी तक छलना के शिकार हुए हैं। योगी पार्ट-01 में न केवल सपाई दिग्गजों का एक इंच कब्जा भी खाली नहीं हुआ बल्कि प्रशासन में उन्हीं की वैसी तूती बोलती रही जैसी सपा सरकार में बोलती थी।
ठोस कार्रवाई हुई तो मंडल में भी होगी योगी की भारी जयकार-
अब योगी ने जब अधिकारियों को खुलेआम इस बात पर आइना दिखाया है तो पीड़ितों को बड़ी सांत्वना मिली कि कम से कम मुख्यमंत्री को उनकी कसक का इलहाम तो है। हालांकि अभी भी खुले तौर पर ऐसी कार्रवाईयां प्रकाश में नहीं आयी हैं जिससे विपक्षी पार्टियों की सरकार के मगरमच्छों में कोई बदहवासी फैले लेकिन शायद अभी गोपनीय रूप से कागजी तैयारियां होने लगी हों और जिसके प्रकट नतीजे कुछ दिनों बाद धमाकेदार ढंग से सामने आयें। ऐसा होने का इंतजार भाजपा के साथ-साथ आम लोगों को भी है और अगर इस मामले में वास्तव में कुछ ठोस हुआ तो झांसी मंडल में योगी सरकार की जय जयकार का अलग ही आलम होगा।
एक कान से सुनी फटकार दूसरे कान से निकालने वाले अफसरों का क्या होगा अंजाम-
योगी ने एक और प्रसंग में प्रेक्टिकल समझ का अच्छा दृष्टांत प्रस्तुत किया है। शायद अपराध और कानून व्यवस्था के संबंध में ही उन्होंने टिप्पणी की कि फील्ड पर न जाने वाले आराम तलब अफसर हटाये जायेंगे और यह भी सुनिश्चित किया जायेगा कि उन्हें आगे कोई महत्वपूण पोस्टिंग न मिलने दी जाये। अफसरों को लेकर कांग्रेस के समय सोच और संस्कृति अलग थी। खासतौर से पुलिस में डीआईजी, आईजी जैसे उच्च पदाधिकारियों के मनोबल का संरक्षण करने की बहुत भावना कांग्रेस सरकारों में रहती थी। साहब बहादुरों की शामत तब शुरू हुई जब दूसरी पार्टियों की सरकारें उत्तर प्रदेश में बनने लगी। मुलायम सिंह सरकार में पुलिस के उच्चाधिकारियों को भी अपनी हैसियत मालूम होने लगी और मायावती ने तो यह रिवाज कायम कर दिया कि अगर अपराध बढ़े या गंभीर अपराधों में कार्रवाई के बाबत कोई चूक हुई तो छोटे अधिकारी बाद में नपेंगे पहले डीआईजी, आईजी सस्पेंड किये जायेंगे। यह प्रयोग बहुत कामयाब रहा। डीआईजी, आईजी आये दिन जिलों का दौरा करने लगे जिससे कानून व्यवस्था में नयी कसावट पैदा हुई।
साहबी का गुरूर तोड़ रहा पुलिस का तारतम्य-
पर योगी सरकार ने कांग्रेस के पैटर्न को भी पीछे छोड़ दिया। कांग्रेस के समय में भी पुलिस के उच्चाधिकारी समय-समय पर जिलों का भ्रमण करते रहते थे। इस दौरान उनका दो तीन दिन कैम्प होता था। वे विभागीय बैठके करने के अलावा सभ्रांत नागरिकों के साथ भी बैठकें करते थे जिससे उन्हें सीधे थानों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली की कच्ची पक्की जानकारियां मिल जाती थी और इसके आधार पर वे जिलों के अफसरों को उचित नसीहत देकर टाइट करते रहते थे। लेकिन योगी सरकार ने खासतौर से हाल के कुछ महीनों से यह सिलसिला बंद करा दिया है। समस्या वर्तमान डीजीपी मुकुल गोयल के कार्यभार संभालने के बाद अधिक बढ़ी जिसे लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है। मुकुल गोयल ने अपनी पहली पत्रकार वार्ता में कहा था कि वे दफ्तर में बैठकर पुलिस की व्यवस्था को चलाने की बजाय फील्ड पर जाकर स्थिति को परखते रहने और सुधारने का काम करेंगे लेकिन उनकी नियुक्ति के पीछे पता नहीं कौन से ऐसे पेच फंसे जिससे पुलिस प्रशासन में लाबिंग शुरू हो गई। डीजीपी को ही नहीं जैसे डीआईजी रेंज और एडीजी जोन को भी जिलों में ज्यादा जाकर डिस्टरबेंस पैदा न करने की हिदायत दे दी गई हो। इससे पुलिस की आंतरिक व्यवस्था की लगाम ढीले पड़ने के दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। चोरी, लूट जैसी घटनाओं में वृद्धि के रूप में यह दृष्टिगोचर है।
शायद सीनियर अधिकारियों को जिलों में दौरे से बचने की कथित हिदायत इतनी अगौचर है कि खुद मुख्यमंत्री भी इससे अनभिज्ञ नजर आते हैं। इसी कारण तो उन्होंने झांसी में यह कहा होगा कि पुलिस के सीनियर अधिकारी फील्ड पर जाना सीखें लेकिन कम से कम इसका असर उनके जाने के दो तीन दिन बाद अभी तक झांसी रेंज में तो नहीं पड़ा है। इस रेंज में न तो एडीजी जोन किसी जिले का दौरा कर रहे हैं और न ही डीआईजी रेंज। यही नहीं जिलों से आने वाले पीड़ितों के लिए उनकी उपलब्धता भी दुस्वार है। यह ठीक स्थिति नहीं है। इस रेंज में जिलों के प्रमुख नये हैं जिन्हें माजने के लिए सीनियर अधिकारियों के मौके पर आकर गाइड करने की जरूरत बहुत है।
प्रोफेशनल पटरी से डिरेल की जा रही पुलिस-
हाल में सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ललितपुर में कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से नोटिस प्राप्त करने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश की पुलिस सबसे आगे है और इसमें सच्चाई भी है। दरअसल यहां ठोको नीति घोषित होने के बाद ही स्पष्ट हो गया था कि पुलिस को प्रोफेशनल लाइन की पटरी से नीचे उतारा जा रहा है। बिना आवश्यक कानूनी प्रक्रियायें पूरी किये बुलडोजर चलवाने में भी इस विसंगति को देखा जा सकता है। आरोपितों के चेहरे चस्पा करके पोस्टर लगवाने की कार्रवाई को लेकर भी उत्तर प्रदेश की पुलिस अदालत की लताड़ खा चुकी है। दूसरी ओर पुलिस को इतना अधिकार संपन्न बनाये जाने के बावजूद अदालत से अपराधियों को सजा दिलवाने का प्रतिशत यहां की पुलिस बढ़ा नहीं पा रही।
दरअसल वर्तमान राज्य सरकार कुछ पूर्वाग्रहों के आधार पर कार्रवाई करने में विश्वास रख रही है जिससे सारा सिस्टम गड़बड़ा गया है। अपराध मुक्त वातावरण के लिए दमन के माहौल की कोई जरूरत नहीं है। पश्चिमी देश इसके उदाहरण हैं जहां पुलिस को विधि संम्मत ढ़ंग से कारगर कार्रवाई करने में सक्षम बनाया गया है। जिससे वहां कानून का राज बेहतरी के साथ चल रहा है और लोगों में स्वतः अनुशासित रहने के संस्कार पनपे हैं। उत्तर प्रदेश का यह सौभाग्य है कि योगी आदित्यनाथ जैसा ईमानदार संत यहां का मुख्यमंत्री है। जिनके रहते अगर सुशासन कायम नहीं हो सकता तो यह बिडम्बना बेहद ही आश्चर्यजनक कही जायेगी। धार्मिक स्थलों से गलत ढ़ंग से लगाये गये लाउडस्पीकर उतरवाने की चुनौतीपूर्ण कार्रवाई उन्होंने जिस शान्तिपूर्ण ढ़ंग से संपन्न करा दी वह उनकी दक्षता का प्रमाण है। इस कार्रवाई में पूरी निष्पक्षता दिखायी गई क्योंकि इसकी शुरूआत उन्होंने अपने ही मठ से कराई। निश्चित रूप से इसके लिए वे वाहवाही के हकदार हैं। लेकिन अधिकारियों की लाबिंग में उनको भी उलझाने की ऐसी कोशिश की गई है जिससे वे अवधारणागत त्रुटियों में फंसे हुए हैं। कहा जाता है कि डीजीपी मुकुल गोयल के बारे में उनके आने से पहले ही सीएम के ऐसे कान भरे गये थे जिससे वे उनको लेकर संदेह के शिकार हो गये। पर इस बीच विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें कोई ऐसी बात सामने नहीं आयी जिससे मुकुल गोयल की पेशेवर निष्ठा को लेकर इसकी पुष्टि होती। उनके बारे में अभी तक के महीनों में कोई विवाद या आरोप भी सामने नहीं आया है। उन्हें वाईपास करके पुलिस को अच्छी तरह से चलाने का प्रयोग भी सफल नहीं रहा। कुल मिलाकर बात इतनी है कि अन्य विभागों की तरह पुलिस विभाग भी तभी सही तरीके से संचालित हो पायेगा जब उसके मुखिया को आगे रखकर कार्य कराया जायेगा। योगी-01 में ही पुलिस सुधार के लिए रिटायर्ड डीजीपी सुलखान सिंह की अध्यक्षता में आयोग गठित हो गया था लेकिन अभी तक उसका कार्य शुरू नहीं हो पाया है जबकि सुलखान सिंह बहुत बेदाग अफसर होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री के भी करीबी हैं। आखिर कौन है जिसके कारण पुलिस की संस्थागत मजबूती के लिए अपेक्षित कार्य रूकावत के शिकार हो रहे हैं।
थाना प्रभारियों की तैनाती में गड़बड़ी भी ओझल नहीं रही सीएम से-
मुख्यमंत्री के झांसी मंडल के प्रवास के समय ही ललितपुर के दो थानों में शर्मनाक घटनायें सामने आयी। मुख्यमंत्री ने इस पर यह टिप्पणी भी की कि थानों के कार्यभार के लिए निरीक्षक उपनिरीक्षक के चयन के समय पर्याप्त सावधानी क्यों नहीं बरती जा रही है। इनमें से एक थाने के प्रभारी निरीक्षक कामता प्रसाद का अश्लील वीडियो उसी की गलती से गैर महिला के साथ रतिक्रिया की अवस्था में तब वाट्उप पर शेयर हो गया था जब वह जालौन जिले में तैनात था। इसके बाद उसे तत्काल में तो निलंबित कर दिया गया लेकिन बाद में ललितपुर ट्रांसफर करके मामला रफा दफा कर दिया गया और फिर उसे महत्वपूर्ण थाने का प्रभार सौंप दिया गया। आखिर एडीजी और डीआईजी क्या कर रहे थे। बुलंदशहर में जब तत्कालीन एसएसपी एन कोलांची को थानो की बिक्री करने के आरोप में निलंबित किया गया था उस समय सभी एडीजी जोन और आईजी, डीआईजी रेंज को चेतावनी दी गई थी कि वे थानों के प्रभार की अर्हता में शामिल करने के पहले संबंधित की सीआर से लेकर उनकी आम शोहरत तक का गहन परीक्षण करें। पर यह बात अब भुला दी गई है। थानों के चार्ज पेशेवर बन चुके उन्हीं इंस्पेक्टर, सब इस्पेक्टर को मिल रहे हैं जो हुनरमंद हैं और यह हुनर क्या है इसकी पोल वैभव कृष्ण ने नोएडा में एसएसपी रहते हुए खोली थी जिसके दायरे में आये कुछ आईपीएस हटाये गये लेकिन साथ-साथ वैभव कृष्ण को भी निलंबित कर दिया गया था। हालत यह है कि वैभव कृष्ण अब बहाल तो हो चुके हैं लेकिन डीजीपी दफ्तर में ही अटैच हैं ताकि भविष्य में थानों की नीलामी की हकीकत सामने लाने का दुस्साहस कोई और न कर पाये।
कार्यकर्ताओं के खिलाफ कान भरने की किसने की साजिश–
झांसी प्रवास के दौरे में मुख्यमंत्री ने एक और बात कही। अधिकारियों के भ्रष्टाचार की शिकायत होने पर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से यह कह दिया कि अफसरों को हम सुधार लेगें पर आप तो दलाली करना बंद कर दें। दरअसल इस मामले में भी मुख्यमंत्री के गलत कान भरे गये हैं। उनकी पांच साल की सरकार में भाजपा का कोई आम कार्यकर्ता खाकपति से करोड़पति नहीं बना जबकि उन्होंने कहा है कि अगर किसी के बारे में शिकायत है तो उसे सांसद, विधायक, एमएलसी या जिलाध्यक्ष के माध्यम से हम तक पहुंचायें। यह बहुत ही विचित्र बात है क्योंकि अगर मुख्यमंत्री सर्वे करा लें तो पायेंगे कि भाजपा सरकार में आने के बाद इन सारे महानुभावों की हैसियत कहां से कहां पहुंच गई है इसके बावजूद अगर कोई यह कह रहा कि कार्यकर्ता बेईमान है और ये महानुभाव ईमानदार तो वह धूर्त है। मुख्यमंत्री को वस्तुस्थिति समझनी चाहिए और हर कहीं से फीडबैक हासिल करते रहने के लिए दरवाजे खोलकर रखने चाहिए।
विसंगतियों के बावजूद योगी ही हैं लोगों के भरोसे की किरण-
इस बार के वैश्विक खुशहाली सूचकांक में 149 देशों में भारत 136वे नम्बर पर रहा है। दक्षिण एशिया तक में भारत की स्थिति खराब है। यहां से ज्यादा प्रसन्नता का माहौल तो नेपाल और बंगला देश तक में है। इस सूचकांक को सुधारने में उत्तर प्रदेश बहुत बड़ा योगदान कर सकता है क्योंकि यह देश का सबसे बड़ा सूबा है। पर स्थितियां बताती हैं कि यहां लोग कितने क्षोभ का सामना कर रहे हैं। योगी आदित्यनाथ जैसे कर्मठ और बेदाग नेता के हाथ में इस प्रदेश की बागडोर है इसलिए अगर विसंगतियां दूर हो जाये तो उनके जरिये ही खुशहाली के मामले में उत्तर प्रदेश के साथ-साथ देश का भी उद्वार संभव है। इसलिए उनके प्रति शुभ कामनायें व्यक्त की जाना समीचीन होगा।
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