वर्तमान वर्ष 2022 में पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा व पंजाब में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए जिनमें विभिन्न पार्टियों के खर्च का आंकड़ा चुनाव आयोग ने जारी किया है। सबसे अधिक खर्चा भाजपा ने किया है जिसने लगभग तीन सौ चालीस करोड़ रूपये नम्बर एक में इन राज्यों में चुनाव जीतने के लिए झौंके। नम्बर 2 का खर्चा शामिल हो जाये तब तो इंतहा ही हो जायेगी क्योंकि अब तो पार्टियांे में मतदाताओं को नगदी पहुंचाये जाने का रिवाज भी फल फूल रहा है। भाजपा के बारे में कहा जाता है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में उसने मतदाताओं के लिए पांच-पांच हजार रूपये नगद और महिलाओं को एक-एक साड़ी की अतिरिक्त व्यवस्था की थी। हो सकता है कि इस तरह की किवदंती अतिश्योक्तिपूर्ण हो लेकिन नगदी बटी इसमें संदेह नहीं है। मीडिया मैनेज करने का खर्चा भी कोई पार्टी उजागर नहीं करती। बहरहाल अधिकृत खर्च में इस प्रतिस्पर्धा में दूसरे नम्बर पर कांग्रेस है जिसने 194 करोड़ रूपये से ज्यादा खर्च की जानकारी चुनाव आयोग को दी है।
कांग्रेस अपने सुनहरे दिनों में पानी की तरह पैसा बहाकर चुनाव जीतने के लिए बदनाम रही। अभी भी इस मामले में कांग्रेस में बहुत दमखम है। हालांकि भाजपा का मोदी युग में फंडा यह है कि अपनी पार्टी के लिए राजनीति को पूरी तरह पैसे का खेल बना दो और दूसरी पार्टियों की फंडिंग की सारी लाइने ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग आदि ऐजेसिंयों का इस्तेमाल करके काट दो। इस मान मर्दन अभियान से कांग्रेस की हालत पतली जरूर हुई है लेकिन अभी भी उसे चंदा देने वाली पार्टियां किसी अन्य प्रतिपक्षी दल की तुलना में बहुत हैं।
एक समय विरोधी दल राजनीति में थैली शाही का प्रभाव रोकने के लिए जिन वैकल्पिक नीतियों की वकालत करते थे उनमें चुनाव खर्च को सीमित करना भी शामिल था। जनसंघ से भाजपा तक यह पार्टी भी इस आदर्श के लिए प्रतिबद्धता दर्शाती थी। समाजवादी और वामपंथी दल तो वैकल्पिक नीतियों के लिए बढ़ चढ़कर उत्साह दिखाते थे। वामपंथी दलों ने काफी हद तक चुनाव खर्च के मामले में आदर्श का निर्वाह भी किया लेकिन समाजवादी विचार धारा से प्रेरित दल जब प्राईवेट लिमिटेड पार्टी के परनाले में गर्क हो गये तो उनके आदर्श भले ही कुछ रहे हो पर व्यवहारिक रास्ते बदल गये। उन्होंने धनबल से चुनाव जीतने के लिए भ्रष्टाचार की इंतहा कर डाली।
जब पार्टियों का कैडरबेस कमजोर होता है तब वे गलत हथकंडों का सहारा सत्ता में आने के लिए लेते हैं। यह एक धारणा है। इसलिए कारपोरेट और उद्योगपतियों के चंदे की निर्भरता कम से कम करने के हामी सिद्धांतकार इस बात पर बल देते थे कि पार्टियों को अपने ज्यादा से ज्यादा कार्यकर्ता तैयार करने पर बल देना चाहिए। बूथ स्तर तक अगर पार्टियों के पास लोगों तक संदेश पहुंचाने के लिए समर्पित कार्यकर्ता होंगे तो उसे वोटर खरीदने और चुनाव प्रचार पर ज्यादा से ज्यादा पैसा बहाने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताआंे की फौज खड़ी करना एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है जिसमें अन्य पार्टियां फिसड्डी साबित हुई पर बीजेपी ने कमाल ही कर दिया। उसका दावा है कि आज के समय वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है। बूथ स्तर तक पूरे देश में उसके पास कार्यकर्ताओं को संजाल है। काफी हद तक भाजपा का यह दावा सच्चाई के नजदीक भी है।
पर इसके बावजूद भाजपा को आज राजनीति के लिए जितने स्याह सफेद धन की जरूरत पड़ रही है उतनी किसी पार्टी को नहीं पड़ी थी। चुनाव प्रचार में अंधाधुंध खर्च इसके बाद भी कहीं न जीत सके तो विधायक और सांसदों को उनकी कल्पना से परे कीमत चुकाकर खरीदने का खर्च। भाजपा का पूरा राजनीतिक संचालन पैसे के ही खेल मे तब्दील हो गया है जिसकी देश बड़ी कीमत चुका रहा है। भाजपा को फंडिंग करने वाले कारपोरेटों पर कर्ज के जरिये बैंकें लुटाई जा रही हैं। उन्हें बिना किसी टैंडर के हवाई अड्डे से लेकर रेलवे स्टेशन तक सौंपे जा रहे हैं। इस मेहरबानी की वजह से जिस कारपोरेट की कंपनियों की गणना दुनिया की शीर्ष 500 कंपनियों में भी नहीं है वह दुनिया का दूसरे नम्बर की सबसे अमीर शख्सियत बन गया है। चहेते कारपोरेट ने अभी अपनी यूनिवर्सिटी शुरू भी नहीं की कि उसकी प्रस्तावित यूनिवर्सिटी उन सौ विश्वविद्यालयों में शामिल कर ली गई जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने के लिए भारी सरकारी फंडिंग होगी। लड़ाकू विमान की कोई कंपनी न होने के बावजूद भी चहेते कारपोरेट को राफैल में पार्टनर बनवा दिया गया यह क्या तमाशा है। इन गलत नीतियों का परिणाम जन सामान्य को बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के रूप में भोगना पड़ रहा है।
भाजपा हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना दिखाती है। बाबा साहब ने कहा था कि वामपंथी शासन एक अच्छी व्यवस्था है लेकिन वह धम्य को शामिल किये बिना सार्थक लक्ष्य हासिल नहीं कर सकता तो शुचितापूर्ण निजाम के लिए धर्म आधारित शासन अनावश्यक नहीं हो सकता बशर्ते तालिबान जैसा धार्मिक शासन न हो। हर धर्म तात्विक स्वरूप में मजबूत नैतिक व्यवस्था का पक्षधर है। खासतौर से हिन्दू धर्म तो इसके लिए राजे महाराजों के त्याग और बलिदान की कहानियों से भरा पड़ा है। सच्चाई के लिए राजा हरिशचन्द्र सत्ता त्यागकर शमशान की पहरेदारी करने वाले डोम की नियति में पहुंच गये थे। फिर भी उन्होंने उफ नहीं की। भगवान श्रीराम ने अपने राज्य की नैतिक स्थिति को लेकर प्रजा में गलत संदेश न जाये इसके लिए पारिवारिक जीवन की भेंट चढ़ा दी। पर आज हिन्दू धर्म के इन तात्विक पहलुओं के प्रति कोई निष्ठा कहां दिखायी जा रही है। तालिबान यही तो किया। इस्लाम में नशा करना और नशे का व्यापार करना हराम है पर तालिबान ने अफगानिस्तान को स्मैक के व्यापार का अड्डा बना दिया। क्योंकि इस्लाम की करूणा से उनका कोई लेना देना नहीं है। धार्मिक शासन को लेकर लोगों के मन में जो यूटोपिया है वह तभी सजीव हो सकता है जब इसमें धर्म के तात्विक सिद्धांतों पर अमल के प्रति तड़प दिखायी जा सके। पर वर्गीय स्वार्थो के लिए अगर रूपगत विशेषताओं की ओर धार्मिक रूझान को मोड़ा जायेगा तो नैतिक व्यवस्था की बजाय कुरीतियां हावी होंगी।
आज यही हो रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने देश के सार्वजनिक जीवन को पूंजीशाही के चंगुल से बचाने के लिए चुनाव खर्च हेतु सरकारी फंड कायम करने के एजेंडे की जबरदस्त वकालत की थी और भाजपा ने भी परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से इस पर सहमति जताई थी। लेकन आज नग्न सत्तावाद के खेल में सिद्धांतों को भुला दिया गया है। आदर्शो की बात राजनीति में बेमानी हो गयी है। राजनीतिक सुधारों की चर्चा तक बंद कर दी गई है। यह एक शुभ लक्षण नहीं है। भाजपा सत्ता में है और उसके पास विराट पार्टी संगठन भी है। इसलिए उसे राजनीति करने और चुनाव जीतने के लिए अंधाधुंध खर्चे से बाज आकर काम करना चाहिए ताकि कारपोरेट वर्तमान की तरह उसकी सत्ता का गलत इस्तेमाल न कर सकें।








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