दिल्ली की एक अदालत द्वारा मीडिया को अडाणी के खिलाफ समाचार देने से कथित तौर पर रोकने को लेकर पूरे तथ्य स्पष्ट हुए बिना ही एक वर्ग ने जिस तरह हल्ला काट दिया वह अत्यन्त खेद जनक है। अडाणी को मोदी सरकार जिस तरह से अनुग्रहीत करने के लिए लीक से हटकर कार्य कर रही है उसकी वजह से लोगों में क्षोभ पैदा होना स्वाभाविक है। भारत के प्रति ट्रंप के प्रतिशोध के पीछे भी एक कारण मोदी सरकार का अडाणी प्रेम माना जा रहा है। अगर यह बात सही है तो यह अत्यन्त आपत्तिजनक है क्योंकि एक उद्योगपति के लिए सरकार को देश के हित दांव पर लगाने की अनुमति नही दी जा सकती। लेकिन निष्पक्ष विश्लेषकों को दूसरे पक्ष की स्थिति सुनने के लिए भी अपनी खिड़की खुली रखनी चाहिए। निष्पक्ष विश्लेषक पार्टी नही हो सकते और न ही सरकार या उसके चहेते कारपोरेट की सुपारी लेने जैसा आभास उन्हें देना चाहिए। यह उनकी प्रतिष्ठा के प्रतिकूल है। दिल्ली की एक अदालत के अडाणी की अर्जी पर दिये गये आदेश को मनमाने ढंग से प्रस्तुत करके मीडिया ने बहुत बड़ी गलती की है जिससे उसका नैतिक बल प्रभावित हो रहा है।
सोमवार को सोशल मीडिया पर एक खबर को लेकर न्यायपालिका पर जमकर पटाखे दागे गये। खबर यह थी कि दिल्ली हाईकोर्ट ने अडाणी की याचिका पर मीडिया के लिए यह आदेश पारित कर दिया है कि उनकी कंपनियों के खिलाफ कोई खबर तब तक प्रकाशित नही की जायेगी जब तक कि पत्रकार के पास पुष्टिकारक तथ्य न हों। माना गया है कि यह अदालत की बेजा सेंसरशिप है। जाने-माने पत्रकार डिबेट पर बैठ गये कि न्यायपालिका ने यह जुर्रत कैसे की। अडाणी के खिलाफ अमेरिका में मुकदमा चल रहा है, उसकी खबरें विभिन्न श्रोतों पर वायरल हो रही हैं जिनकी अंतर्राष्ट्रीय मान्यता है तो भारतीय पत्रकार उस पर चर्चा क्यों नही करें। उन्हें दुनियां भर की मीडिया की खबरों के बावजूद क्या कोर्ट की पुष्टिकारक जरूरत पूरा करने के लिए क्या अमेरिका जाना पड़ेगा। फिर मीडिया कोई एजेंसी तो है नहीं जिसे समन करने जैसे संबंधित पक्षों को बुलाने के अधिकार हों तो उसके लिए पुष्टिकारक की शर्त का मतलब क्या है।
मीडिया के जाबाजों के फड़कते नथुने देखकर पूरे मीडिया संसार में रोष जनित जोश फैलने लगा। लेकिन गहराई में जाने पर जो तथ्य सामने आये हैं वे निराश करने वाले हैं। मीडिया को अपने ऊपर पूर्वाग्रहों को हावी करके किसी मामले में अधीरता नही दिखानी चाहिए। दरअसल हुआ यह था कि अडाणी की कंपनी अडाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड यानी एईएल के खिलाफ कुछ संगठनों, व्यक्तियों और मीडिया मंचों ने समाचार छापे थे। जिसे लेकर एईएल ने दिल्ली की सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इसी क्रम में एईएल ने कोर्ट से दरख्वास्त की कि संबंधितों को इस समाचार के सिलसिले को जारी रखने से रोका जाये जो कि प्रथम दृष्टया भ्रामक और मान हानिकारक हैं। दिल्ली के सीनियर सिविल जज अनुज कुमार सिंह ने इस प्रार्थना पत्र को स्वीकार कर लिया और अगली सुनवाई 9 अक्टूबर तक के लिए कोर्ट के सामने विचाराधीन मामले में मीडिया ट्रायल जैसा कुछ करने से संबंधितों को बरज दिया।
स्पष्ट है कि मीडिया को रोकने का आदेश देने में दिल्ली हाईकोर्ट की भूमिका नही है। जिसके उल्लेख के कारण इतनी उत्तेजना फैली। कौआ कान ले गया…… की अफवाह पर विश्वास करने से पहले मीडिया के वरिष्ठों को अपना कान टटोलकर तो देख लेना चाहिए था। जब अपना कान सही सलामत है तो क्यों चिल्लाना। दिल्ली के सीनियर सिविल जज ने जो आदेश दिया वह कोई अनोखा कदम नही है। किसी विशिष्ट संदर्भ में यह आदेश पहले भी कई मामलों में अदालते दे चुकी हैं। मीडिया के वरिष्ठों को शायद यह ध्यान नही रहा कि अडाणी हिन्डनबर्ग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही व्यापक कवरेज पर रोक लगाने की याचिका खारिज करके एक व्यवस्था दे दी थी तो निचली कोई अदालत भले वह हाईकोर्ट हो उसके परे कैसे जाती। सीनियर सिविल जज ने एक खास मामले में जो रोक लगाई भी है वह स्थाई नही है, अंतरिम है। मीडिया को अपनी इस हरकत पर अफसोस होना चाहिए। यह चूंक करके उसने अडाणी को लोगों की हमदर्दी बंटोरने का एक मौका दे दिया है।
दूसरी ओर कुछ मामलों में मीडिया की एकतरफा राय बनती जा रही है तो उसके पीछे सरकार भी कम दोषी नही है। अडाणी को लेकर या किसी अन्य मामले में सरकार की सत्य निष्ठा पर उंगली उठाने वाली कोई खबर अगर मीडिया या किसी अन्य मंच पर आती है और उसमें अगर चुनिंदा तथ्यों का इस्तेमाल कोई खास धारणा बनाने के लिए किया जा रहा है तो सरकार को तत्काल सामने आकर पूरे तथ्यों की रोशनी में स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए। अगर सरकार ऐसा करने लगे तो उसके खिलाफ हो रहे हमलों की धार भौंथरी हो जायेगी। पर सरकार इसमें अपनी हेठी समझती है। जबकि सरकार का ऐसा अहंकार लोकतंत्र के तकाजों के सर्वथा विरुद्ध है। मतदाता सूचियों में धांधली के आरोपों को ही लें तो क्या चुनाव आयोग या सरकार को इस मामले में लगाये जा रहे आरोपों के प्रतिवाद के लिए आगे नही आना चाहिए। आप लगाये जा रहे आरोपों की वास्तविकता पर कोई चर्चा नही करना चाहते तो जनता की अदालत में आपको दोषी ठहरा दिया जाना लाजिमी है। भले ही आप मुख्य धारा की मीडिया का प्रबंधन करके अपने बचाव के लिए कितनी भी शुतुरमुर्गी अदा दिखा लें।
इस घटनाक्रम से अमर सिंह की गोपनीय रूप से टेप की गयी रसीली टॉक की यादें फिर ताजा हो गयीं। इसके कुछ अंश अखबारों में प्रकाशित हो गये थे तो हड़कंप इस बात के कारण मच गया था कि इससे जजों की नियुक्तियों से लेकर उनके फैसलों तक में कमसिन लड़कियों की भूमिका उजागर हो रही थी। किसी भी राष्ट्र के लिए उसकी व्यवस्था के एक सबसे मजबूत स्तंभ में कथित तौर पर अगर इस तरह की गंदगी पोसी जाने की सुगबुगाहट सामने आती है तो बहुत चिंता का विषय हो जाता है। कहा जाता है कि अमेरिका के अत्यंत लोकप्रिय राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या खुद सीआईए को इस कारण करानी पड़ गयी थी क्योंकि दिल फेंक कैनेडी और दुनियां की सबसे खूबसूरत फिल्म अदाकारा मर्लिन मुनरो के बीच मधुर संबंधों में उसे केजीबी द्वारा अपने राष्ट्रपति का हनी ट्रेप किये जाने की सूचनाएं मिली थीं। कहीं भारत में राष्ट्र विरोधी तत्व इसी ट्रिक से न्यायपालिका में सेंध लगाकर कोई षणयंत्र तो नही कर रहे यह बात उस समय दिमाग में रखकर व्यापक गोपनीय पड़ताल करायी जानी चाहिए थी। लेकिन न्यायपालिका ने वीटो का इस्तेमाल करते हुए अमर सिंह के फोन टेप पर किसी भी तरह के कवरेज को प्रतिबंधित कर दिया था। आगे चलकर इसका क्या हुआ। मीडिया को इसकी फॉलोअप स्टोरी करानी चाहिए।








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