भद्रलोक का पाखंड और निरंकुशता की चढ़ती चाल

देश की राजनीति का वर्तमान परिदृश्य केवल सत्ता संघर्ष की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस तथाकथित “भद्रलोक” के चरित्र का भी आईना बन चुका है, जो स्वयं को नैतिकता, विवेक और संवैधानिक मूल्यों का प्रहरी मानता रहा है। आज जो कुछ हो रहा है, वह इस परतदार पाखंड का धीरे-धीरे खुलता हुआ चेहरा है—जहाँ शब्दों में आदर्शवाद और व्यवहार में सुविधावाद गहरे पैठ चुके हैं।

न्यायपालिका से लेकर नौकरशाही तक, एक व्यापक यथास्थितिवादी मानसिकता दिखाई देती है। यह वह वर्ग है, जो सिद्धांतों की बात तो करता है, परंतु जब उन्हें बचाने की वास्तविक कीमत चुकाने का समय आता है, तब पीछे हट जाता है। “संवैधानिक मर्यादा” और “संस्थागत गरिमा” जैसे शब्द अक्सर एक ढाल बन जाते हैं—जो जोखिम लेने से बचने का औचित्य प्रदान करते हैं।

हाल के वर्षों में कई चर्चित घटनाएँ इस प्रवृत्ति को उजागर करती हैं। चाहे वह संवेदनशील मामलों में न्यायिक विलंब हो, या फिर ऐसे फैसले जिनमें स्पष्ट अन्याय के बावजूद निर्णायक हस्तक्षेप का अभाव दिखा—इन सबने आम नागरिक के मन में यह प्रश्न खड़ा किया है कि क्या संस्थाएँ वास्तव में सत्ता के विरुद्ध खड़े होने का साहस रखती हैं? कई मामलों में जांच एजेंसियों की सक्रियता भी चयनात्मक प्रतीत होती है, जिससे यह धारणा बलवती होती है कि कानून का अनुप्रयोग समान नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार ढलता है।

नौकरशाही की भूमिका भी कम सवालों के घेरे में नहीं है। भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी प्रतिष्ठित व्यवस्थाएँ, जिनसे निष्पक्षता और दृढ़ता की अपेक्षा की जाती है, वे भी अक्सर सत्ता के अनुरूप झुकती दिखती हैं। स्थानांतरण, पदोन्नति और करियर सुरक्षा के दबाव ने एक ऐसा वातावरण बना दिया है जहाँ ‘सही’ से अधिक ‘सुरक्षित’ निर्णय को प्राथमिकता मिलती है।

इस यथास्थितिवाद का सबसे खतरनाक परिणाम यह है कि यह सत्ता को निरंकुश बनने का अप्रत्यक्ष निमंत्रण देता है। जब संस्थाएँ अपने कर्तव्यों के निर्वहन में संकोच करने लगती हैं, तो सत्ता के सामने कोई प्रभावी संतुलन शेष नहीं रहता। परिणामस्वरूप, निर्णय अधिक केंद्रीकृत, आक्रामक और कभी-कभी असंवेदनशील होते चले जाते हैं।

इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज का प्रबुद्ध वर्ग जोखिम लेने से पीछे हटा है, तब-तब लोकतंत्र कमजोर हुआ है। आज भी स्थिति कुछ भिन्न नहीं दिखती। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा या तो सत्ता के साथ खड़ा दिखाई देता है या फिर आत्म-सेंसरशिप का शिकार है। विश्वविद्यालयों और बौद्धिक संस्थानों में भी स्वतंत्र विचार की जगह धीरे-धीरे सीमित होती जा रही है।

परंतु प्रश्न केवल आलोचना का नहीं है, बल्कि आत्ममंथन का भी है। क्या भद्रलोक अपनी सुविधाओं के दायरे से बाहर निकलकर सत्य के पक्ष में खड़ा होने का साहस जुटा पाएगा? क्या न्यायपालिका और नौकरशाही अपने संवैधानिक दायित्वों को केवल औपचारिकता से आगे बढ़ाकर वास्तविक प्रतिबद्धता में बदल पाएंगी?

लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता; वह उन अदृश्य साहसों पर टिका होता है, जो व्यवस्था के भीतर से जन्म लेते हैं। यदि वे साहस ही क्षीण हो जाएँ, तो सबसे मजबूत संविधान भी कागज़ का दस्तावेज बनकर रह जाता है।

आज आवश्यकता है कि भद्रलोक अपने पाखंड से बाहर आए और यह स्वीकार करे कि तटस्थता के नाम पर चुप रहना भी एक प्रकार का पक्ष लेना है। यदि यह वर्ग अब भी नहीं जागा, तो निरंकुशता का यह उभार केवल अस्थायी नहीं, बल्कि स्थायी रूप ले सकता है—और तब शायद सुधार के अवसर भी बहुत कम रह जाएँगे।

Leave a comment