हमारे समय की सबसे विचित्र सामाजिक प्रवृत्तियों में एक यह है कि किसी व्यक्ति की बड़ी उपलब्धि सामने आते ही सोशल मीडिया पर उसकी जाति खोजने की होड़ लग जाती है। कोई छात्र संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त करे, कोई वैज्ञानिक अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन करे, कोई खिलाड़ी ओलंपिक में पदक जीत ले, कोई कलाकार विश्वस्तर पर सम्मान पाए या कोई उद्योगपति असाधारण सफलता हासिल कर ले—तुरंत पोस्टें लिखी जाने लगती हैं कि देखो, हमारी जाति ने फिर साबित कर दिया कि हम जन्मजात प्रतिभाशाली हैं। कुछ लोग इसे स्वाभाविक सामाजिक गर्व मानते हैं, लेकिन थोड़ा गहराई से देखें तो यह प्रवृत्ति केवल समाज की संकीर्ण मानसिकता को ही नहीं दर्शाती, बल्कि उस व्यक्ति की व्यक्तिगत मेहनत और प्रतिभा के साथ भी अन्याय करती है। यह उसकी उपलब्धि को उसके पुरुषार्थ से हटाकर जन्म आधारित पहचान की तिजोरी में बंद कर देती है।
किसी भी बड़ी उपलब्धि के पीछे वर्षों का संघर्ष, अनुशासन, असफलताओं से जूझने की क्षमता और निरंतर परिश्रम होता है। एक छात्र रातों की नींद खोकर तैयारी करता है, खिलाड़ी शरीर और मन दोनों को कठोर साधना में डालता है, वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में वर्षों की मेहनत झोंक देता है, तब जाकर कोई मुकाम बनता है। लेकिन जैसे ही समाज उस उपलब्धि को “जाति की जीत” घोषित करता है, वैसे ही व्यक्ति का अपना संघर्ष पीछे छूटने लगता है। संदेश यह जाता है कि उसकी सफलता उसकी व्यक्तिगत क्षमता का परिणाम कम और उसकी जातीय विरासत का प्रमाण अधिक है। कल्पना कीजिए, कोई युवक कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई करके आईएएस बनता है। उसके माता-पिता ने खेत बेचकर पढ़ाया, उसने छोटे शहर की सीमाओं से लड़ते हुए अंग्रेज़ी सीखी, कई बार असफल हुआ, फिर सफलता मिली। लेकिन सोशल मीडिया पर उसकी जाति के लोग यह प्रचार करने लगें कि हमारी जाति तो शुरू से ही बुद्धिमान रही है, तब उस युवक के वर्षों के संघर्ष का क्या मूल्य रह जाता है? उसकी सफलता एक इंसान की प्रेरक यात्रा न रहकर जातीय दंभ का पोस्टर बन जाती है।
कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति यह नहीं चाहेगा कि उसकी उपलब्धि को ऐसे प्रस्तुत किया जाए जैसे वह किसी जातीय विशेषाधिकार का परिणाम हो। क्योंकि यह उसके आत्मविश्वास को भी भीतर से चोट पहुँचाता है। यदि समाज कहे कि फलाँ व्यक्ति इसलिए सफल हुआ क्योंकि वह अमुक जाति का है, तो अप्रत्यक्ष रूप से यह भी कहा जा रहा होता है कि उसकी सफलता का आधार उसकी व्यक्तिगत योग्यता नहीं, बल्कि उसका जन्म है। यही कारण है कि कई बड़े लोग अपनी जातीय पहचान के प्रचार से असहज रहते हैं। वे जानते हैं कि प्रतिभा का संबंध जाति से नहीं होता। यदि प्रतिभा जाति से तय होती, तो इतिहास में हर महान उपलब्धि कुछ ही जातियों के हिस्से में आती। लेकिन ऐसा नहीं है। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर वर्ग, हर समुदाय और हर क्षेत्र से असाधारण लोग निकले हैं।
डॉ. भीमराव आंबेडकर ने विपरीत सामाजिक परिस्थितियों में शिक्षा प्राप्त कर विश्वस्तरीय विद्वान बनने तक का सफर तय किया। उनकी महानता किसी एक जाति का गौरव भर नहीं थी, बल्कि पूरी मानवता के लिए प्रेरणा थी। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम साधारण परिवार से निकलकर भारत के “मिसाइल मैन” और राष्ट्रपति बने। उनकी उपलब्धि किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे देश की प्रेरणा बनी। मेरी कॉम ने सीमित संसाधनों और सामाजिक कठिनाइयों के बीच विश्व मुक्केबाज़ी में भारत का नाम रोशन किया। नीरज चोपड़ा ने ओलंपिक में स्वर्ण जीतकर इतिहास रचा। सचिन तेंदुलकर, पी.वी. सिंधु, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स—इन सबकी उपलब्धियों को यदि केवल जातीय चश्मे से देखा जाए तो यह उनकी महानता का अपमान ही होगा। जब भारत चंद्रयान की सफलता पर गर्व करता है, तब कोई यह नहीं पूछता कि वैज्ञानिक किस जाति के थे, क्योंकि वहाँ उपलब्धि राष्ट्र की चेतना का हिस्सा बन जाती है। लेकिन जैसे ही मामला व्यक्तिगत सफलता का होता है, समाज उसे जातीय खाँचों में बाँटने लगता है।
यदि किसी गाँव का बच्चा बड़ा अधिकारी बनता है, तो पूरे गाँव को खुशी होती है। किसी जिले का खिलाड़ी राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचता है, तो पूरा जिला उत्साहित होता है। यह स्वाभाविक सामाजिक भाव है क्योंकि उस व्यक्ति की सफलता उस क्षेत्र की सामूहिक आकांक्षाओं को भी ऊर्जा देती है। लेकिन जातीय गर्व का स्वरूप अलग होता है। उसमें प्रेरणा से अधिक श्रेष्ठता का भाव छिपा होता है। क्षेत्रीय गर्व कहता है कि हमारे इलाके का बेटा आगे बढ़ा, हमारे बच्चों को भी प्रेरणा मिलेगी। लेकिन जातीय गर्व कई बार यह संदेश देता है कि हमारी नस्ल बाकी लोगों से बेहतर है। यहीं से समस्या शुरू होती है।
सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा कर दिया है। पहले समाज में जातीय पहचान मौजूद थी, लेकिन उसका प्रदर्शन इतना आक्रामक नहीं था। अब हर व्यक्ति के हाथ में ऐसा मंच है जहाँ वह तुरंत अपनी सामूहिक पहचान का प्रदर्शन कर सकता है। किसी उपलब्धि पर बधाई देने से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है अपनी जातीय उपस्थिति दर्ज कराना। लोग उपलब्धि से प्रेरणा लेने के बजाय उसे पहचान की राजनीति का औजार बना लेते हैं। एल्गोरिद्म भी इसी प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं। उत्तेजक और विभाजनकारी सामग्री अधिक तेजी से फैलती है। “हमारी जाति का शेर”, “फलाँ बिरादरी ने फिर मारी बाजी” जैसे नारे अधिक प्रतिक्रियाएँ बटोरते हैं। धीरे-धीरे यह सामान्य व्यवहार बनता जा रहा है। दुर्भाग्य यह है कि इस माहौल में सफल व्यक्ति भी कई बार बहने लगता है। लगातार मिल रही जातीय प्रशंसा उसके भीतर भी सामूहिक श्रेष्ठता का भाव भरने लगती है। लेकिन जब वह अकेले में अपने संघर्ष को याद करता होगा, तब शायद उसे एहसास होता होगा कि उसकी सफलता को कितनी छोटी चौखट में बाँध दिया गया है।
यह भी सच है कि भारत में लंबे समय तक कई समुदायों को अवसरों से वंचित रखा गया। ऐसे में जब किसी वंचित समाज से कोई व्यक्ति बड़ी सफलता हासिल करता है, तो उस समुदाय के लोगों को प्रेरणा और आत्मविश्वास मिलता है। यह भाव समझा जा सकता है। लेकिन प्रेरणा और श्रेष्ठताबोध में फर्क है। यदि कोई समुदाय कहे कि हमारे समाज के बच्चों को भी पढ़ना चाहिए, देखो हमारे बीच से भी लोग आगे बढ़ रहे हैं, तो यह सकारात्मक ऊर्जा है। लेकिन यदि वही बात हमारी जाति सबसे श्रेष्ठ है में बदल जाए, तो वह सामाजिक विभाजन का कारण बन जाती है। उद्देश्य होना चाहिए अवसरों का विस्तार, न कि नए प्रकार का जातीय अहंकार।
हम तकनीकी रूप से आधुनिक हो गए हैं। हाथ में स्मार्टफोन है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की चर्चा हो रही है, अंतरिक्ष अभियान चल रहे हैं, लेकिन मानसिक स्तर पर हम कई बार सदियों पुराने खाँचों में जी रहे हैं। विडंबना देखिए—एक ओर हम वैश्विक प्रतिस्पर्धा की बात करते हैं, दूसरी ओर किसी की सफलता को उसके जन्म से जोड़ देते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई किसान विशाल बरगद बनने वाले पौधे को बोनसाई बनाकर गमले में कैद कर दे। व्यक्ति की उपलब्धि पूरे समाज को प्रेरित कर सकती थी, लेकिन हमने उसे जातीय गर्व के छोटे पात्र में सीमित कर दिया।
सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इसका असर नई पीढ़ी पर पड़ता है। बच्चे और युवा यह सीखने लगते हैं कि सफलता का संबंध मेहनत से कम और पहचान से अधिक है। यदि हर उपलब्धि को जातीय जीत बताया जाएगा, तो धीरे-धीरे योग्यता आधारित समाज का विचार कमजोर होगा। लोग यह मानने लगेंगे कि प्रतिभा जन्मजात होती है, अर्जित नहीं। जबकि वास्तविकता इसके उलट है। कड़ी मेहनत, बेहतर शिक्षा, अनुकूल वातावरण और अवसर ही किसी व्यक्ति को आगे बढ़ाते हैं।
समाज को यह सीखना होगा कि किसी व्यक्ति की सफलता का सम्मान कैसे किया जाए। यदि कोई बच्चा आईआईटी में चयनित होता है, तो उसके संघर्ष की चर्चा हो। यदि कोई खिलाड़ी पदक जीतता है, तो उसकी साधना को सराहा जाए। यदि कोई वैज्ञानिक खोज करता है, तो उसकी मेहनत और जिज्ञासा को प्रेरणा बनाया जाए। जाति की दीवारों में कैद कर देने से उपलब्धि छोटी हो जाती है। हमें यह समझना होगा कि महानता का अर्थ ही सीमाओं को तोड़ना है। जो व्यक्ति असाधारण उपलब्धि हासिल करता है, वह केवल अपने परिवार या जाति का नहीं रह जाता, वह समाज की साझा प्रेरणा बन जाता है।
सभ्यता की यात्रा जन्म आधारित पहचान से कर्म आधारित पहचान की ओर बढ़ने की यात्रा रही है। लेकिन सोशल मीडिया के दौर में हम कई बार उलटी दिशा में चलते दिखाई देते हैं। किसी व्यक्ति की सफलता पर गर्व करना सुंदर भावना है, पर उसे जातीय श्रेष्ठता का प्रमाण बना देना सामाजिक अपरिपक्वता है। यह न केवल समाज को बाँटता है, बल्कि उस व्यक्ति के पुरुषार्थ को भी छोटा करता है जिसने अपने संघर्ष से वह मुकाम हासिल किया। जरूरत इस बात की है कि हम उपलब्धियों को संकीर्ण दायरों में कैद करने के बजाय उन्हें सामूहिक प्रेरणा बनने दें। क्योंकि अंततः इतिहास उन्हीं समाजों को आगे बढ़ते हुए देखता है जो प्रतिभा को जन्म से नहीं, कर्म से पहचानते हैं।







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