प्रत्येक व्यक्ति के मनोजगत में सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की ग्रंथियां निर्मित होती हैं। एक अच्छे व्यक्ति में भी दुष्ट भावनाएं जन्मती रहती हैं लेकिन वह इनको समय रहते नियंत्रित कर लेता है। दूसरी ओर कतिपय लोग दुष्ट भावनाओं को ही अपनी चालक शक्ति बना लेते हैं। मनोविज्ञान की इस शब्दावली का अगर राजनैतिक रूपान्तरण किया जाये तो इसका प्रकटन स्वेच्छाचारिता के आचरण में होता है। इस आचरण की अति के परिणाम अत्यन्त अनष्टिकारक हो जाते हैं।
संदर्भ वर्तमान सत्ता की कार्यप्रणाली का है। भारतीय जनता पार्टी को हिन्दू जनादेश मिला है इसलिए उसको अधिकार है कि इस जनादेश के अनुरूप अमली कार्रवाइयां करे। पर हिन्दू राष्ट्र के लिए भी एक सिस्टम के तहत कार्य करना होगा। हिन्दू राष्ट्र अराजक और अनियंत्रित व्यवस्था का पर्याय नही है। हिन्दू राष्ट्र के रोल मॉडल के रूप में जिन सम्राटों और राजाओं का उल्लेख किया जाता है वे एकतंत्रीय शासन को भी नियमों और प्रक्रियाओं के तहत संचालित करते थे। हिन्दू राज्यों में ब्राहमण एक कैडर का नाम था जिन्हें सम्राट मार्गदर्शक मानते थे। जिस काम में वे टोका-टाकी कर दें सम्राट का साहस नही था कि उस काम को करने की जुर्रत कर डाले। इसी तरह सम्राट कोई भी निर्णय लेने के पहले ब्राहमणों से परामर्श किया करता था जो कि घनघोर अपरिग्रही, त्यागी, संयमी और निर्भीक होते थे। फिर भी सम्राट उनकी अवहेलना करे या फैसला लेने में चकमेबाजी का रास्ता अपनाये यह संभव नही था।
हिन्दू राष्ट्र के इस मॉडल की तर्ज पर वर्तमान सत्ता तंत्र ने सक्रिय राजनीति से दूर हो चुके वरिष्ठों का एक मार्गदर्शक मंडल बना रखा है लेकिन यह केवल अलंकरण मात्र के लिए है। औपचारिकता के लिए भी इस मार्गदर्शक मंडल की बैठक कभी आहूत होती नही देखी गयी। आज का मार्गदर्शक मंडल मुगल शासन के मॉडल की याद दिलाता है जिसमें शहजादा बादशाह बनने के बाद अपने बाप को जलावतन में धकेल देता था। उसे राजधानी से दूर कहीं कैद में रख दिया जाता था। आधुनिक विश्व में इसके तौर-तरीकों में नफासत आ जाना स्वाभाविक है। इसलिए अब कैद की व्यवस्था तो नही हो रही लेकिन मार्गदर्शकों की उपेक्षित हालत किसी कैद से कम भी नही है।

दरअसल पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में रखे गये बुजुर्गों से सत्ता को अस्थिर किये जाने का भय तो बिल्कुल नही है। वे लोग कोई समस्या पैदा कर सकें उनके लिए इसकी उम्र नही बची है। अगर मार्गदर्शक मंडल की बैठक हो तो उसकी बातें लीक न होने देने के लिए भी वे आसानी से रजामंद हो जायेगें। यशवंत सिन्हा और डॉ मुरली मनोहर जोशी के गुबार फूटे तो इसलिए कि उपेक्षा और अवहेलना का असहनीय दंश उन्हें झेलना पड़ा था अन्यथा ये बुजुर्गवार केवल सम्मान पाकर तृप्त हो सकते थे पर बिना पैसे की दवा भी अगर भाजपा के वर्तमान नेतृत्व को गंवारा नही है तो उसका कारण उसकी मानसिकता में निहित है।
मार्गदर्शक मंडल का मामला तो भाजपा की अपनी पारिवारिक समस्या है। लेकिन स्वेच्छाचारिता की ग्रन्थि में पार्टी का नेतृत्व इस तरह जकड़ा हुआ है जिससे शासन की पूरी व्यवस्था को घुन लगने की स्थितियां पैदा होती जा रही हैं। ताजा उदाहरण सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर प्रधानमंत्री के आवास पर हुई बैठक का है। भले ही सरकार अपने मन के सीबीआई प्रमुख का चयन करवा लेती लेकिन उसे आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन तो करना चाहिए था। नेता प्रतिपक्ष की यह मांग पूरी तरह वाजिब थी कि इसके लिए सरकार जिन अधिकारियों के नाम प्रस्तावित कर रही है उनका पूरा रिकार्ड पहले से समिति को उपलब्ध कराया जाये। ऐसा करने से सरकार के लिए क्या रुकावट आ जाती। निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में भी सरकार ने ऐसा ही बखेड़ा खड़ा कर रखा है। अन्यथा पहले की सरकारें भी अपने मनमाफिक अधिकारियों की ही नियुक्ति संवैधानिक संस्थाओं में करती रहीं हैं। लेकिन सरकार किसी जोखिम के अंदेशे से पीड़ित नही है। उसे मनमानी के प्रदर्शन का शौक चर्राया हुआ है इसलिए विवादित तौर-तरीके उसकी कार्यशैली की पहचान बन गये हैं। यह पूरे सिस्टम को तोड़ डालने जैसा है। अगर आप सिस्टम बचा नही रहने देगें और जब आप नही रह जायेगें तो देश की क्या गत बन जायेगी यह बात भाजपा का नेतृत्व नही सोचना चाहता।
ठीक है मान लिया कि इस देश में हिन्दुओं के गर्व को तृप्त करने वाले काम होने चाहिए भले ही इससे अल्पसंख्यकों को ठेस लगती हो तो इसमें तो बाधा रह नही गयी है। मुसलमानों का कथित तुष्टिीकरण करने वाली पार्टियां सत्ता से बाहर हो चुकी हैं, जो विमर्श देश की चेतना पर हावी है उसके रहते निकट भविष्य में यह संभावना भी नही रह गयी कि विपक्षी पार्टिया बैक मार जायें। अल्पसंख्यकों ने भी जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए की नियति स्वीकार कर ली है। यहां तक कि मुसलमानों का एक वर्ग भाजपा के लिए वोट देने तक का मन बना चुका है तो अब जबकि आपकी सत्ता पूरी तरह सुरक्षित है तब तो आपकी जिम्मेदारी बन जाती है कि एक हिन्दूवादी सरकार कितनी साफ-सुथरी, सात्विक और जनउपकारी हो सकती है यह दिखा दें। लेकिन इस कसौटी पर भाजपा के समर्थक भी मूल्यांकन करते हैं तो उनका मन अपने नेतृत्व को पासिंग मार्क्स देने का भी नही होता। तब एक ही बात आती है जो भाजपा के लिए अपना समर्थन बनाये रखने को मजबूर करती है कि अगर उन्होंने दूसरे विकल्प की ओर ताका तो हिन्दू फिर सहने के लिए विवश होने की स्थिति में पहुंच जायेगें।
नेतृत्व की स्वेच्छाचारिता की यह सनक देश के लिए ही नही खुद भाजपा के लिए भी बहुत भारी बनती जा रही है। केवल अपने अहंकार की पूर्ति के लिए भाजपा के नेतृत्व ने मध्य प्रदेश में मोहन सिंह और राजस्थान में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनवाया। इसी तरह नितिन नवीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष के आसन पर विराजमान कर दिया। हम नही कहते कि यह लोग अक्षम है लेकिन अभी मानसिक रूप से खुद भी ये इतनी बड़ी जिम्मेदारियों के लिए परिपक्व नही थे। कच्चे आम तोड़कर खाने लग जाने की बजाय अभी इनको पकाये जाने की जरूरत थी और इनके नेतृत्व की स्वीकृति के लिए माहौल बनाने का श्रम किया जाना चाहिए था। इस तरह के प्रयोग पार्टी के ऊर्जावान लोगों को कुंठित करने का वायस बन गये हैं। वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान को चुका हुआ नेता मानने का कोई औचित्य नही हो सकता सिवाय इसके कि नेतृत्व को पार्टी की अपने सामने कातरता का आनंद लेना था। तमाम ऊर्जावान भाजपा नेता हैं जो नेतृत्व के इस खिलवाड़ की सजा भोग रहे हैं। भाजपा ने सिफर से शिखर तक का सफर समर्पित मेधावियों के संघर्ष और प्रयासों से तय किया है। नेतृत्व जिसे चाहे उसे माला पहना डाले यह स्वच्छंदता साधना के मूल्य को बर्बाद करने वाली है। धरातल तक इस प्रवृत्ति का विस्तार हो रहा है। जिलों और ब्लॉकों तक में सक्षम लोग हासिये पर धकेले जाने की स्थिति झेल रहे हैं। इनकी कुंठा निकट भविष्य में विध्वंसक ऊर्जा में तब्दील हो सकती है।

आयातित नेताओं के लिए पलक पावड़े बिछाने की नीति भी स्वेच्छाचारी मानसिकता का ही एक पहलू है। असम में हेमंत विस्व सरमा के बाद बंगाल में सुवेन्दु अधिकारी को पार्टी के नये तारणहार के रूप में गददी सौंपे जाने के सिलसिले में कई नैतिक प्रश्न जुड़े हुए हैं। एक समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इनको महाभ्रष्ट बताया था इन पर कार्रवाइयां भी हुई थी। क्या कार्रवाईयों का मकसद ऐसे नगीनों को अपने पाले में खींचना था। इसके पहले महाराष्ट्र में अजित पवांर और प्रफुल्ल पटेल को भ्रष्टाचार के तमाम मामले सामने आने के बाद भाजपा में न सिर्फ पनाह दी गयी बल्कि सिर पर बिठा लिया गया। ईडी द्वारा जेल भेजे गये पंजाब के पूर्व मंत्री संजीव अरोड़ा के बारे में कहा जा रहा है कि वे भी कुछ दिनों बाद भाजपा में शामिल किये जाने वाले हैं जिसके बाद उन्हें राज्य में मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी का चेहरा बनाया जा सकता है। गुण न हिरानो गुण गाहक हिरानों है की भाजपा नेतृत्व की यह दृष्टि पार्टी के उन नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए असहज करने वाली सिद्ध हो रही है जिनकी अहमियत नीव के पत्थर जैसी है। दरअसल ईमानदारी, त्याग और स्पष्ट वक्तृता एक प्रवृत्ति है जो कि संघ के पुराने समय के तमाम कार्यकर्ताओं में मौलिक स्वभाव की तरह रची बसी है। पार्टी का वर्तमान माहौल उन्हें मिसफिट होने का अहसास कराने वाला है। स्वेच्छाचारी मानसिकता के कारण पार्टी के नेतृत्व को यसमैन चाहिए। सिद्धांतवादी कार्यकर्ताओं के लिए यह नीति और अधिक पीड़ा दायक साबित हो रही है। अब समस्या यह नही है कि सब जगह एक खास विचारधारा के लोगों का कब्जा होता जा रहा है। विचारधारा वाले तो जितने वामपंथी या मध्यमार्गी परेशान हैं उससे ज्यादा परेशान दक्षिणमार्गी हैं। खांटी संघियों को भी इसलिए बर्दास्त नही किया जा रहा क्योंकि हां में हां मिलाने की उनकी एक सीमा है। आयातित नेताओं और कार्यकर्ताओं की जिसके कारण उपयोगिता समझी जा रही है उसमें भी वे एक सीमा के बाद नही ढल सकते। यह विरोधाभास अभी राख में दबी चिंगारी के मानिंद हैं लेकिन भविष्य की चाल को समझने वाले इसमें अगर किसी ज्वालामुखी के फटने का अंदेशा महसूस कर रहे हैं तो वे गलत नही है।







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