रामकृष्ण हेगड़े: उत्तर प्रदेश पंचायती राज चुनावों के बीच भुलाए गए स्वशासन के वास्तुकार

आज उत्तर प्रदेश में पंचायती राज चुनावों की जोरदार चर्चाएं हो रही हैं। ग्रामीण स्तर पर सत्ता के विकेंद्रीकरण, महिलाओं और पिछड़ों की भागीदारी तथा स्थानीय स्वशासन की मजबूती पर बहस चल रही है। ठीक इसी समय में कर्नाटक के दिवंगत नेता रामकृष्ण महाबलेश्वर हेगड़े की याद दिलाना बेहद प्रासंगिक है। वे दक्षिण भारत के अंतिम प्रभावशाली ब्राह्मण नेता थे, जिन्होंने 1980 के दशक में पंचायती राज को सशक्त बनाने का ऐतिहासिक कार्य किया और भारत में लोकायुक्त जैसी भ्रष्टाचार-विरोधी संस्था की नींव रखी।

उनका यह अवदान इतना बड़ा है कि आज जब देश पंचायती स्वशासन को मजबूत करने की बात कर रहा है, तब हेगड़े को भारत रत्न दिए जाने की मांग जोर पकड़नी चाहिए। उन्होंने बिना प्रचार के जो संस्थागत लोकतंत्र खड़ा किया, वह आज भी प्रासंगिक है।

प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक जड़ें

रामकृष्ण हेगड़े का जन्म 29 अगस्त 1926 को उत्तर कन्नड़ जिले के सिद्दापुर में एक सम्मानित हव्यक ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनके पिता महाबलेश्वर हेगड़े और माता सरस्वती थे। हव्यक ब्राह्मण समुदाय शिक्षा और संस्कृति से गहरा जुड़ा रहा है। उन्होंने सरसी और बाद में वाराणसी के काशी विद्यापीठ तथा लखनऊ विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा प्राप्त की।

1942 के Quit India आंदोलन में भागीदारी ने उनकी राजनीतिक चेतना को जागृत किया। गांधीवादी विचारधारा और विनोबा भावे के प्रभाव से वे प्रभावित रहे। वकालत के पेशे को छोड़कर वे पूर्णकालिक राजनीति में आ गए।

कांग्रेस से जनता पार्टी तक का सफर

हेगड़े की राजनीतिक शुरुआत कांग्रेस से हुई। 1957 में वे पहली बार कर्नाटक विधानसभा पहुंचे। एस. निजलिंगप्पा और वीरेंद्र पाटिल की सरकारों में उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले — सहकारिता, पंचायती राज, वित्त, उत्पाद शुल्क आदि। इस दौरान उन्होंने ग्रामीण विकास और प्रशासनिक कार्यों में गहरा अनुभव प्राप्त किया।

1975-77 के आपातकाल के बाद कांग्रेस से मोहभंग हुआ। वे जनता पार्टी में शामिल हो गए और 1983 के विधानसभा चुनाव में विपक्षी दलों को एकजुट कर कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को तोड़ा। 10 जनवरी 1983 को वे कर्नाटक के पहले गैर-कांग्रेस मुख्यमंत्री बने। 1985 के चुनाव में जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला और वे दोबारा मुख्यमंत्री बने। कुल तीन बार उन्होंने यह पद संभाला।

1980 के दशक में उनका नाम प्रधानमंत्री पद के मजबूत दावेदार के रूप में लिया जाता था।

पंचायती राज: हेगड़े की सबसे बड़ी देन

हेगड़े की राजनीतिक विरासत में पंचायती स्वशासन सबसे चमकदार अध्याय है। उनके कार्यकाल में कर्नाटक ने भारत में पहली बार तीन-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था (ग्राम पंचायत, तालुक पंचायत और जिला पंचायत) को वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों से लैस किया।

उनके ग्रामीण विकास मंत्री अब्दुल नजीर साब के साथ मिलकर उन्होंने यह क्रांतिकारी सुधार लागू किया। पंचायतों को कर लगाने, बजट बनाने, योजनाएं चलाने और स्थानीय मुद्दों का फैसला करने का अधिकार दिया गया। यह मॉडल पूरे देश के लिए उदाहरण बना और 1992 के 73वें संविधान संशोधन के लिए आधार तैयार किया।

आज उत्तर प्रदेश समेत देशभर में जब पंचायती राज चुनाव हो रहे हैं और लोग गांव की समस्याओं के स्थानीय समाधान की बात कर रहे हैं, तब हेगड़े का यह योगदान याद आता है। उन्होंने साबित किया कि सच्चा लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता गांव-गांव तक पहुंच जाए। पंचायती राज को उन्होंने केवल चुनावी वादा नहीं, बल्कि राजनीतिक दर्शन बनाया।

लोकायुक्त: भ्रष्टाचार के खिलाफ संस्थागत जवाबदेही

हेगड़े का दूसरा बड़ा अवदान लोकायुक्त संस्था की स्थापना है। 1984 में कर्नाटक भारत का पहला राज्य बना जहां लोकायुक्त गठित किया गया। यह भ्रष्टाचार के खिलाफ Ombudsman जैसी व्यवस्था थी, जिसमें मुख्यमंत्री, मंत्री और अधिकारी शामिल हो सकते थे।

उन्होंने “Value Based Politics” का नारा दिया और नैतिकता को राजनीति का आधार बनाया। जब आज अरविंद केजरीवाल अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन को भुनाकर सत्ता में आए और सत्ता मिलने के बाद लोकपाल को प्रभावी ढंग से लागू करने में दुम दबा गए, तब हेगड़े की तुलना स्वाभाविक रूप से होती है। हेगड़े ने सत्ता में रहते हुए ही जवाबदेही की मिसाल कायम की, जबकि कई आधुनिक नेता इसे केवल चुनावी हथियार बनाते हैं।

ब्राह्मण नेता के रूप में Non-Brahmin युग में संतुलन

कर्नाटक में ब्राह्मणों की आबादी मात्र 3-5% है। देवराज अर्स ने AHINDA फॉर्मूले से पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा में लाया था। हेगड़े ने इस चुनौतीपूर्ण माहौल में Lingayat-Vokkaliga जैसे प्रभावशाली समुदायों के बीच संतुलन बनाया। वे ब्राह्मण होने के बावजूद ग्रामीण और पिछड़े वर्गों के मुद्दों पर काम करने में सफल रहे।

विवाद और मानवीय कमजोरियां

हेगड़े की छवि शालीन और चारिस्मेटिक थी, लेकिन उनके कार्यकाल में विवाद भी हुए। 1988 का फोन टैपिंग कांड सबसे बड़ा था, जिसमें उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया। परिवार पर कुछ भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे, हालांकि वे कभी अदालत में दोषी सिद्ध नहीं हुए।

ये विवाद उनकी विरासत को धूमिल करते हैं, लेकिन उनके संस्थागत योगदान इनसे कहीं बड़े हैं।

राष्ट्रीय राजनीति और अंतिम वर्ष

वे जनता दल के संस्थापक सदस्य रहे। 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री रहे। बाद में उन्होंने लोक शक्ति पार्टी बनाई और भाजपा के साथ गठबंधन किया। 12 जनवरी 2004 को उनका निधन हो गया।

भारत रत्न की मांग: समय आ गया है

आज जब उत्तर प्रदेश पंचायती राज चुनावों में ग्रामीण स्वशासन की चर्चा हो रही है, तब रामकृष्ण हेगड़े को याद करना और उन्हें भारत रत्न देने की मांग करना राष्ट्र का कर्तव्य है।

उन्होंने पंचायती राज को मजबूत नींव दी और लोकायुक्त जैसी संस्था का प्रवर्तन किया — ये दोनों ही आज भारत के लोकतंत्र की मजबूती के स्तंभ हैं। हेगड़े ने दिखाया कि ब्राह्मण, लिंगायत या वोक्कालिगा से ऊपर राष्ट्र सेवा और संस्थागत सुधार की सोच हो सकती है।

उनकी विरासत हमें याद दिलाती है कि सच्ची राजनीति प्रचार से नहीं, बल्कि ठोस कार्यों से बनती है।

रामकृष्ण हेगड़े कर्नाटक की आधुनिक राजनीति के युग पुरुष थे। उत्तर प्रदेश के पंचायती राज चुनाव उन्हें फिर से प्रासंगिक बना रहे हैं। पंचायती स्वशासन और लोकायुक्त जैसी संस्थाओं के सच्चे प्रवर्तक के रूप में वे भारत रत्न के हकदार हैं।

समय आ गया है कि देश उन्हें वह सम्मान दे जो वे डिजर्व करते हैं।

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