छात्र शक्ति, हिंसा का नैरेटिव और पाखंड का पर्दाफाश: असम, गुजरात से कॉकरोच तक

भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में छात्र आंदोलन बार-बार व्यवस्था की नाकामी के खिलाफ खड़े हुए हैं। 1973-74 का गुजरात नवनिर्माण आंदोलन और 1979-85 का असम आंदोलन इसके clearest उदाहरण हैं। दोनों में छात्रों ने सत्ता को चुनौती दी, बड़े पैमाने पर जनता जुड़ी, हिंसा हुई, गालियाँ दी गईं, अराजकता के आरोप लगे—और फिर भी इन आंदोलनों को बाद में ‘जन-आंदोलन’, ‘पहचान की लड़ाई’ या ‘भ्रष्टाचार विरोधी संघर्ष’ के रूप में याद किया गया। उनके नेता सत्ता में पहुँचे। आज 2026 में जब ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ या कॉकरोच आंदोलन युवा असंतोष—पेपर लीक, बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता—को लेकर सड़क पर उतर रहा है, तब सत्ता और उसके समर्थक मीडिया का नैरेटिव एकदम उलटा है: “गालियाँ दी जा रही हैं”, “हिंसा भड़काई जा रही है”, “अराजकता फैल रही है”, “मीम पॉलिटिक्स है”, “व्यवस्था तोड़ने वाले हैं”। 

सबसे खतरनाक तर्क यह चलाया जा रहा है कि “भीड़ के कहने से मंत्री हटाये जाएंगे तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा”। यह तर्क सुनने में लोकतंत्र की रक्षा जैसा लगता है, लेकिन इतिहास इसे झुठलाता है। 1974 में गुजरात में ठीक यही हुआ था—भीड़ (छात्रों और जनता) के दबाव से मुख्यमंत्री हटाए गए थे। तब आज के सत्ताधारी पक्ष की वैचारिक पूर्वज पीढ़ी (जनसंघ-ABVP) उस भीड़ का हिस्सा थी, और तत्कालीन सत्ता पक्ष (कांग्रेस) ने भी “लोकतंत्र खतरे में” वाली दुहाई नहीं दी थी। वह झुकी थी। आज वही तर्क उलटे मुँह से बोला जा रहा है। यही पाखंड इस लेख का केंद्र है।

### गुजरात नवनिर्माण: मेस बिल से सरकार गिराने तक का सफर और हिंसा का सच

दिसंबर 1973 में अहमदाबाद के एल.डी. इंजीनियरिंग कॉलेज और मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में मेस बिल महज 20-40 प्रतिशत बढ़ गया। सब्सिडी वाली अनाज व्यवस्था हटने और महंगाई के कारण छात्र भड़क गए। 20 दिसंबर को कैंटीन में आग लगाई गई। पुलिस-छात्र झड़प हुई। कई छात्र निलंबित हुए। यह छोटी सी घटना जंगल की आग बन गई।

जनवरी 1974 तक मुद्दा महंगाई, मूंगफली तेल की कीमतें और चिमनभाई पटेल सरकार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों तक फैल गया। नवनिर्माण युवक समिति बनी। मनीषी जानी, नरहरी अमीन जैसे छात्र नेता सामने आए। ABVP, कांग्रेस (ओ), जनसंघ का समर्थन मिला। नारा गूँजा—“चिमन चोर, गद्दी छोड़ो”। रात में थालियाँ-बेलन बजाकर ‘सरकार का मृत्युघंट’ बजाया गया। राज्यव्यापी बंद पड़े। 25 जनवरी के बंद में 33 शहरों में झड़पें हुईं। कर्फ्यू लगे। सेना बुलाई गई।

आधिकारिक आंकड़ों में करीब 100-110 लोग मारे गए, हजारों घायल हुए, 8,000 से अधिक गिरफ्तार हुए। विधायकों के घर घेरे गए। 167 में से 95 विधायकों से इस्तीफे ले लिए गए। पुलिस फायरिंग हुई। दंगे हुए। दुकानें लूटी गईं। अराजकता का माहौल था। फिर भी 9 फरवरी 1974 को चिमनभाई पटेल को इस्तीफा देना पड़ा। 16 मार्च को विधानसभा भंग कर दी गई। मोरारजी देसाई के अनशन ने निर्णायक भूमिका निभाई। जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन की प्रशंसा की और बाद में बिहार में संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया।

यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि हिंसा हुई। गालियाँ दी गईं। सत्ता को ‘चोर’ कहा गया। पुलिस पर हमले हुए। लेकिन बाद के इतिहास लेखन में इसे ‘छात्र शक्ति की जीत’, ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ जन-आंदोलन’ और ‘लोकतंत्र की रक्षा’ के रूप में याद किया गया। इसके नेता राजनीति में गए। युवा नरेन्द्र मोदी (तब आरएसएस प्रचारक) भी इसमें शामिल रहे। 1975 के चुनाव में जनता मोर्चा सत्ता में आया। आंदोलन को ‘अराजक’ कहकर खारिज नहीं किया गया। बल्कि उसे प्रेरणा स्रोत बनाया गया।

सबसे महत्वपूर्ण बात: तब किसी ने यह नहीं कहा कि “भीड़ के कहने से मुख्यमंत्री हटाना लोकतंत्र को खतरे में डालना है”। इंदिरा गांधी सरकार ने दबाव महसूस किया और झुक गई। विधानसभा भंग की गई। चुनाव करवाए गए। लोकतंत्र की दुहाई देकर आंदोलन को कुचला नहीं गया। आज के सत्ताधारी पक्ष की वैचारिक धारा (जनसंघ-ABVP) उस भीड़ का सक्रिय हिस्सा थी। तब भीड़ को ‘जनता की आवाज’ माना गया। आज उसी तर्क को उलट दिया गया है।

### असम आंदोलन: पहचान की लड़ाई, हिंसा और सत्ता का मार्ग

1979 में असम में आसू (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) ने अवैध घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु कुमार फुकन जैसे छात्र नेता सामने आए। ऑल असम गण संग्राम परिषद बनी। बैंड, आर्थिक नाकाबंदी (तेल पाइपलाइन रोकना), रेल रोको, सत्याग्रह—ये तरीके अपनाए गए। नारा था—“सेव असम टुडे टु सेव भारत टुमॉरो”।

आंदोलन छह साल चला। 1983 में राज्य चुनाव कराने के फैसले के बावजूद बहिष्कार हुआ। हिंसा चरम पर पहुँची। नेल्ली नरसंहार में कुछ घंटों में दो हजार से अधिक (अनौपचारिक आंकड़ों में तीन हजार तक) बंगाली-भाषी मुसलमानों की हत्या हुई—ज्यादातर महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग। खोइराबाड़ी में भी हिंसा हुई। पूरे आंदोलन में आधिकारिक तौर पर करीब 855-860 लोग मारे गए। कई जगह असमिया और बंगाली समुदायों के बीच सांप्रदायिक झड़पें हुईं। वामपंथी संगठनों से टकराव हुए। पुलिस-सेना कार्रवाई हुई। कर्फ्यू लगे। राष्ट्रपति शासन लगा।

सरकार (इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी) का रुख दमनकारी रहा। फिर भी 15 अगस्त 1985 को असम समझौता हुआ। छात्र नेताओं ने असम गण परिषद बनाई। 1985 के चुनाव में भारी बहुमत मिला। 33 वर्षीय प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री बने। छात्र छात्रावास से सीधे मुख्यमंत्री आवास तक पहुँचे।

यहाँ भी हिंसा हुई। गालियाँ दी गईं। ‘विदेशी’ और ‘घुसपैठिए’ जैसे तीखे शब्द इस्तेमाल हुए। अराजकता फैली। लेकिन बाद में इसे ‘असमिया पहचान की रक्षा’, ‘जनसांख्यिकीय संतुलन की लड़ाई’ और ‘छात्र नेतृत्व की सफलता’ के रूप में स्थापित किया गया। नेल्ली जैसी त्रासदी को आंदोलन की ‘अनियंत्रित परिणति’ कहा गया, लेकिन आंदोलन की मूल वैधता पर सवाल नहीं उठाया गया। AGP सत्ता में आई। मुद्दा राष्ट्रीय एजेंडे पर बना रहा।

### कॉकरोच आंदोलन: वही पैटर्न, उलटा नैरेटिव

2026 में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी—जिसमें कुछ बेरोजगार युवाओं या फर्जी डिग्री वालों को ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ कहा गया—से यह आंदोलन शुरू हुआ। अभिजीत दीपके जैसे युवा ने इसे व्यंग्यात्मक ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का रूप दिया। इंस्टाग्राम पर करोड़ों फॉलोअर्स जुटे। मुद्दा पेपर लीक (NEET आदि), शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, बेरोजगारी और व्यवस्था के प्रति युवा असुरक्षा बना। जंतर-मंतर पर धरना, मास्क, संविधान की प्रति और गुलाब—प्रतीक बने। कुछ प्रदर्शनों में पुलिस से झड़पें हुईं। लाठीचार्ज और टियर गैस का इस्तेमाल हुआ। कुछ जगह उत्तेजना फैली।

अब सत्ता और समर्थक नैरेटिव देखिए: “गालियाँ दी जा रही हैं”, “हिंसा भड़काई जा रही है”, “अराजकता फैल रही है”, “मीम पॉलिटिक्स है”, “विपक्षी साजिश है”, “विदेशी ताकतों का खेल है”, “व्यवस्था तोड़ने वाले हैं”, “राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है”। और सबसे ऊपर—“भीड़ के कहने से मंत्री हटाये जाएंगे तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा”। सोशल मीडिया अकाउंट रोके गए। ‘एंटी-नेशनल’ का लेबल चिपकाया गया। कुछ नेताओं ने इसे ‘आतंकियों की बी-टीम’ तक कह दिया।

यही वह पाखंड है जिसकी तुलना गुजरात और असम से की जानी चाहिए।

### पाखंड का पर्दाफाश: एक ही पैमाना क्यों नहीं?

**पहला और सबसे बड़ा पाखंड—भीड़ बनाम लोकतंत्र का dual standard।** 

 

आज कहा जा रहा है कि भीड़ के दबाव से मंत्री हटाना लोकतंत्र के लिए खतरा है। लेकिन 1974 में गुजरात में ठीक यही हुआ। छात्रों और जनता की भीड़ ने चिमनभाई पटेल को हटवाया, 95 विधायकों से इस्तीफे लेवाए और विधानसभा भंग करवाई। तब तत्कालीन सत्ता पक्ष (कांग्रेस) ने “लोकतंत्र खतरे में” की दुहाई देकर आंदोलन को नहीं कुचला। इंदिरा गांधी ने दबाव स्वीकार किया। आज के सत्ताधारी पक्ष की वैचारिक पूर्वज धारा (जनसंघ-ABVP) उस भीड़ का हिस्सा थी। तब भीड़ को ‘जनता की आवाज’ माना गया। आज उसी तर्क को उलटकर लोकतंत्र की रक्षा का मुखौटा पहनाया जा रहा है। यह इतिहास की चयनात्मक स्मृति है। जब भीड़ अपनी हो तो लोकतंत्र मजबूत होता है, जब दूसरों की हो तो लोकतंत्र खतरे में।

**दूसरा पाखंड—हिंसा का dual standard।**  

गुजरात में 100 से अधिक मौतें हुईं, असम में 855 से अधिक (नेल्ली अकेले हजारों)। दोनों में पुलिस फायरिंग, दंगे, विधायकों के घर घेरना, आर्थिक नाकाबंदी शामिल थे। फिर भी इन्हें ‘जन-आक्रोश’ कहा गया। कॉकरोच आंदोलन में अब तक कोई ऐसी बड़े पैमाने की हिंसा या नरसंहार नहीं हुआ। पुलिस कार्रवाई के बाद झड़पें हुईं, लेकिन उसे ‘अराजकता’ करार दिया जा रहा है। जब सत्ता अनुकूल हो तो हिंसा ‘अनियंत्रित आक्रोश’ है, जब असुविधाजनक हो तो ‘जानबूझकर भड़काई गई हिंसा’।

**तीसरा पाखंड—गालियों और भाषा का dual standard।**  

गुजरात में “चिमन चोर” का नारा लगा। असम में ‘विदेशी’ और ‘घुसपैठिए’ जैसे तीखे शब्द इस्तेमाल हुए। सत्ता को गाली दी गई। फिर भी बाद में इन्हें ‘जनता की भाषा’ कहा गया। आज कॉकरोच आंदोलन में अगर युवा ‘कॉकरोच’ शब्द को खुद अपनाकर व्यंग्य करते हैं या व्यवस्था पर तीखी टिप्पणी करते हैं, तो उसे ‘गाली-गलौज’ और ‘अश्लीलता’ बताया जा रहा है। अपमान का जवाब अपमान से देने को ‘अराजकता’ कहना पाखंड है। CJI की टिप्पणी खुद अपमानजनक थी। युवाओं ने उसे अपना प्रतीक बना लिया। यह प्रतिरोध है, अराजकता नहीं।

**चौथा पाखंड—संगठन और समर्थन का dual standard।**  

गुजरात में ABVP, जनसंघ, कांग्रेस (ओ) का समर्थन था। असम में क्षेत्रीय संगठन और छात्र संघ थे। फिर भी इन्हें ‘जन-आंदोलन’ माना गया। आज कॉकरोच को ‘विपक्षी साजिश’ या ‘सोरोस-पाकिस्तान’ का खेल बताकर खारिज किया जा रहा है। बिना सबूत के विदेशी फंडिंग के आरोप लगाना पुराना हथियार है। असम और गुजरात में भी ‘अलगाववाद’ और ‘साजिश’ के आरोप लगे थे।

**पाँचवाँ पाखंड—मीडिया और नैरेटिव कंट्रोल।**  

तब स्थानीय मीडिया ने समर्थन दिया, राष्ट्रीय मीडिया ने हिंसा पर फोकस किया, लेकिन मूल मुद्दे (महंगाई, घुसपैठ, भ्रष्टाचार) को नकारा नहीं। आज मुख्यधारा का बड़ा हिस्सा युवा असुरक्षा को नजरअंदाज कर ‘मीम’, ‘गाली’ और ‘अराजकता’ पर फोकस कर रहा है। सोशल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है। यह नैरेटिव सेटिंग है, न कि वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग।

**छठा पाखंड—परिणाम का dual standard।**  

गुजरात में सरकार गिरी, विधानसभा भंग हुई, नए चुनाव हुए। असम में समझौता हुआ, नई पार्टी बनी, सत्ता मिली। दोनों मामलों में छात्र नेता राजनीतिक मुख्यधारा में आए। आज कॉकरोच आंदोलन को ‘कोई भविष्य नहीं’ बताकर खारिज किया जा रहा है। इतिहास बताता है कि छात्र आंदोलन अक्सर राजनीतिक जगह बनाते हैं—चाहे पार्टी के रूप में हो या दबाव समूह के रूप में।

### व्यवस्था की असहजता और युवा आवाज

गुजरात और असम के आंदोलनों ने दिखाया कि जब व्यवस्था महंगाई, भ्रष्टाचार या पहचान के संकट को नजरअंदाज करती है, तो छात्र सड़क पर उतरते हैं। हिंसा होती है क्योंकि सत्ता दमन करती है और आक्रोश फूटता है। लेकिन बाद में सत्ता उन्हीं आंदोलनों से समझौता करती है या उन्हें अपना लेती है।

आज कॉकरोच आंदोलन उसी असहजता को दर्शाता है। पेपर लीक बार-बार हो रहे हैं। युवा बेरोजगारी और परीक्षा घोटालों से त्रस्त हैं। CJI की टिप्पणी ने उस गुस्से को संगठित कर दिया। सत्ता का जवाब दमन और नैरेटिव कंट्रोल है—गाली, हिंसा, अराजकता और “लोकतंत्र खतरे में” का ठप्पा। 1974 में भीड़ ने मुख्यमंत्री हटाया था और लोकतंत्र नहीं मरा था। उल्टे नए चुनाव हुए, नई सरकार बनी। आज वही तर्क उलटे मुँह से बोला जा रहा है तो यह लोकतंत्र की रक्षा नहीं, सत्ता की असहजता है।

इतिहास की सबसे बड़ी सीख यही है: सत्ता हमेशा हिंसा, अराजकता और लोकतंत्र खतरे का नैरेटिव तब सेट करती है जब वह असुविधाजनक सवालों का जवाब नहीं दे पाती। गुजरात में चिमनभाई पटेल हटे। असम में समझौता हुआ। आज भी अगर युवा आवाज को गाली, हिंसा और “भीड़ से लोकतंत्र खतरे में” का ठप्पा लगाकर कुचला गया, तो व्यवस्था की विश्वसनीयता और गिरेगी। छात्र शक्ति इतिहास रचती है—कभी हिंसा के साथ, कभी व्यंग्य के साथ, लेकिन हमेशा व्यवस्था को जवाबदेह ठहराते हुए। पाखंड का पर्दाफाश यही है कि एक ही पैमाना सभी पर लागू होना चाहिए। नहीं तो इतिहास खुद सत्ता को याद दिलाएगा कि कॉकरोच कभी मरते नहीं।

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