भारत में आरक्षण पर बहस होते ही सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला शब्द है—मेरिट। अक्सर यह मान लिया जाता है कि आरक्षण और मेरिट एक-दूसरे के विरोधी हैं; आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपेक्षाकृत कम योग्य है और सामान्य वर्ग का उम्मीदवार अधिक योग्य। सोशल मीडिया ने इस धारणा को एक अत्यंत सरल गणितीय सूत्र में बदल दिया है—जनरल को 80 प्रतिशत अंक चाहिए, जबकि आरक्षित वर्ग को 60 प्रतिशत अंक में ही नौकरी मिल जाती है।
लेकिन क्या भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी अत्यंत कठिन प्रतियोगी परीक्षा के आंकड़े इस लोकप्रिय धारणा की पुष्टि करते हैं?
भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी और सामाजिक विषयों पर आंकड़ा-आधारित हस्तक्षेप करने वाले एम.एस. नेत्रपाल सिंह ने UPSC सिविल सेवा परीक्षा के परिणामों का अध्ययन करते हुए इसी प्रश्न को चुनौती दी। उनके विश्लेषण का केंद्रीय निष्कर्ष यह है कि UPSC में सामान्य और आरक्षित वर्ग के सफल अभ्यर्थियों के अंकों का वास्तविक अंतर उस विशाल अंतर से बहुत कम है, जैसा सार्वजनिक बहस में प्रचारित किया जाता है। नेत्रपाल ने विशेष रूप से 2007 से 2017 तक के आंकड़ों का अध्ययन कर लिखा कि General, OBC और SC अभ्यर्थियों के लिखित अंकों में अंतर अक्सर केवल 1 से 2 प्रतिशत के आसपास था और अंतिम कुल अंकों में भी अंतर बहुत सीमित था।
यहीं से आरक्षण और मेरिट पर बहस एक नए मोड़ पर पहुंचती है।
कटऑफ और औसत अंक : दोनों में फर्क है
आरक्षण-विरोधी तर्क का सबसे मजबूत हथियार कटऑफ का अंतर है। उदाहरण के लिए UPSC की अलग-अलग श्रेणियों के लिए अंतिम कटऑफ अलग होती है। पहली नजर में यह अंतर काफी बड़ा दिखाई दे सकता है। लेकिन नेत्रपाल सिंह का तर्क है कि किसी श्रेणी की कटऑफ उस श्रेणी के सभी चयनित उम्मीदवारों का औसत प्रदर्शन नहीं होती।
कटऑफ केवल उस श्रेणी के अंतिम चयनित उम्मीदवार का न्यूनतम अंक है।
मान लीजिए किसी वर्ष General की कटऑफ 950 है और OBC की 910। इससे केवल इतना पता चलता है कि OBC श्रेणी में अंतिम चयनित उम्मीदवार 910 अंक पर था। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सभी OBC उम्मीदवार 910 के आसपास थे। उसी सूची में OBC उम्मीदवार 1000, 1050 अथवा उससे भी अधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं।
यही नेत्रपाल सिंह के विश्लेषण की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक चुनौती है—बहस में अक्सर कटऑफ को पूरी सामाजिक श्रेणी की क्षमता का प्रतिनिधि मान लिया जाता है, जबकि सांख्यिकीय दृष्टि से यह गलत सरलीकरण है।
UPSC स्वयं चयनित अभ्यर्थियों के प्राप्तांक सार्वजनिक करता है और अलग से श्रेणीवार कटऑफ भी जारी करता है। इसलिए किसी गंभीर विश्लेषण में केवल कटऑफ नहीं, बल्कि सभी अनुशंसित उम्मीदवारों के लिखित, साक्षात्कार और कुल अंकों को देखना आवश्यक है।
नेत्रपाल सिंह की रिसर्च का सबसे मजबूत पक्ष
इस रिसर्च की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह बहस को नारे से निकालकर डेटा की जमीन पर लाने का प्रयास करती है।
सवाल यह नहीं है कि General की कटऑफ कितनी है और SC या OBC की कितनी। असली सवाल यह है कि—
चयनित उम्मीदवारों के पूरे समूह में विभिन्न सामाजिक वर्गों के अंकों का वितरण कैसा है?
यदि किसी श्रेणी के हजारों सफल उम्मीदवारों में बड़ी संख्या General cutoff के बराबर या उससे ऊपर अंक प्राप्त करती है, तो उस पूरी श्रेणी को “कम मेरिट वाला” कहना तार्किक रूप से गलत होगा।
नेत्रपाल सिंह के पुराने विश्लेषण का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह था कि UPSC की लिखित परीक्षा में SC/ST/OBC अभ्यर्थियों का एक बड़ा हिस्सा General merit के स्तर को पार करता है। 2023 में अपने सार्वजनिक वक्तव्य में उन्होंने दावा किया था कि लिखित परीक्षा में SC/ST/OBC के लगभग 60 से 70 प्रतिशत उम्मीदवार General merit cutoff पार कर रहे थे।
यह निष्कर्ष, यदि वर्षवार मूल आंकड़ों के साथ विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया जाए, तो “आरक्षित वर्ग बनाम मेरिट” की प्रचलित भाषा को गंभीर चुनौती देता है।
2022 का उदाहरण : आंकड़ों से बनती दूसरी तस्वीर
हाल के UPSC परिणामों में भी यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि आरक्षित सामाजिक पृष्ठभूमि का होना और कम अंक प्राप्त करना एक ही बात नहीं है।
2022 की सिविल सेवा परीक्षा में OBC पृष्ठभूमि की गरिमा लोहिया और उमा हरथी ने क्रमशः देश में दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त किया। यह अपने आप में इस धारणा को चुनौती देता है कि आरक्षण पाने वाला हर उम्मीदवार केवल कम कटऑफ के कारण प्रतियोगिता में आगे आया है।
दरअसल, आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों के भीतर भी प्रदर्शन का विशाल अंतर होता है। कोई उम्मीदवार अपनी श्रेणी की अंतिम कटऑफ के आसपास हो सकता है, जबकि दूसरा उम्मीदवार देश के शीर्ष दस में शामिल हो सकता है।
इसलिए “आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की मेरिट” को एक इकाई मान लेना उतना ही गलत है, जितना “सामान्य वर्ग की मेरिट” को एक समान मान लेना।
सबसे रोचक सवाल : लिखित परीक्षा और इंटरव्यू
नेत्रपाल सिंह की रिसर्च का दूसरा, और शायद अधिक विवादास्पद पक्ष UPSC के Personality Test या इंटरव्यू से जुड़ा है।
उनके सार्वजनिक विश्लेषण में यह दावा सामने आया कि लिखित परीक्षा में General और आरक्षित वर्गों के अंकों का अंतर अपेक्षाकृत कम है, लेकिन Personality Test में अंतर अधिक दिखाई देता है। 2020 के UPSC परिणामों के बारे में नेत्रपाल ने विशेष रूप से एक पैटर्न की ओर ध्यान दिलाया था कि SC/ST उम्मीदवारों को इंटरव्यू में अपेक्षाकृत कम अंक मिलने का रुझान दिखाई देता है, जबकि सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों में अपेक्षाकृत अधिक इंटरव्यू अंक पाए गए।
यही प्रश्न सबसे संवेदनशील है।
लिखित परीक्षा अपेक्षाकृत अनाम प्रक्रिया है। उत्तर पुस्तिका जांचने वाले को उम्मीदवार की जाति या सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं होती। लेकिन इंटरव्यू में उम्मीदवार सीधे बोर्ड के सामने उपस्थित होता है और उसके Detailed Application Form में उसके बारे में काफी जानकारी होती है।
इसलिए यदि कई वर्षों के बड़े डेटा में यह लगातार दिखाई दे कि समान या लगभग समान लिखित अंक वाले आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को इंटरव्यू में व्यवस्थित रूप से कम अंक मिलते हैं, तो यह गंभीर शोध का विषय है।
हालांकि केवल औसत अंतर देखकर जातीय भेदभाव सिद्ध नहीं किया जा सकता। उसके लिए अधिक कठोर सांख्यिकीय परीक्षण की आवश्यकता होगी।
रिसर्च की पहली कमी : औसत कारण नहीं बताते
यहीं नेत्रपाल सिंह के अध्ययन की पहली और सबसे महत्वपूर्ण सीमा सामने आती है।
मान लीजिए General उम्मीदवारों का औसत इंटरव्यू स्कोर आरक्षित वर्ग से अधिक है। इससे सीधे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इंटरव्यू बोर्ड जाति के आधार पर अंक दे रहा है।
औसत अंतर के पीछे कई कारण हो सकते हैं—
उम्मीदवारों की भाषा और संचार क्षमता, शहरी और ग्रामीण पृष्ठभूमि, पारिवारिक सामाजिक पूंजी, शिक्षण संस्थान, इंटरव्यू का बोर्ड, वैकल्पिक विषय, सेवा वरीयता अथवा उम्मीदवार के Detailed Application Form से जुड़े अन्य कारक।
इसलिए correlation और causation में अंतर करना आवश्यक है।
यदि यह सिद्ध करना हो कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों के साथ इंटरव्यू में व्यवस्थित भेदभाव होता है, तो शोध को समान लिखित अंक, समान या तुलनीय रैंक, समान सामाजिक-शैक्षणिक पृष्ठभूमि और संभव हो तो समान बोर्ड के भीतर उम्मीदवारों की तुलना करनी होगी।
नेत्रपाल सिंह की सार्वजनिक चर्चाओं में यह प्रश्न उठाया गया है, लेकिन उपलब्ध सार्वजनिक प्रस्तुति से यह स्पष्ट नहीं होता कि इतने विस्तृत नियंत्रणों के साथ कोई औपचारिक सांख्यिकीय मॉडल लागू किया गया था या नहीं।
यही उनकी रिसर्च की प्रमुख पद्धतिगत सीमा है।
दूसरी कमी : General cutoff पार करना और General सीट पाना अलग बातें हैं
नेत्रपाल सिंह के विश्लेषण को समझते समय एक और अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीकी अंतर ध्यान रखना चाहिए।
कोई OBC, SC या ST उम्मीदवार यदि General cutoff से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो यह निश्चित रूप से उसकी उच्च प्रतिस्पर्धात्मक उपलब्धि है।
लेकिन इससे अपने आप यह सिद्ध नहीं होता कि उसका चयन UR vacancy के विरुद्ध ही हुआ।
UPSC में उम्मीदवार की सामाजिक श्रेणी और उसका vacancy-adjustment अलग प्रशासनिक प्रश्न हो सकते हैं। किसी उम्मीदवार के अंक General cutoff से ऊपर होना और उसे किस vacancy के विरुद्ध गिना गया, इसकी पुष्टि के लिए विस्तृत चयन और नियुक्ति डेटा देखना आवश्यक है।
इसलिए यह कहना—
“इतने आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों ने General cutoff पार किया”
एक सांख्यिकीय तथ्य हो सकता है।
लेकिन यह कहना—
“इसलिए वे सभी General सीटों पर चयनित हुए”
अलग दावा है, जिसके लिए अलग डेटा चाहिए।
यह अंतर नेत्रपाल सिंह की रिसर्च को कमजोर नहीं करता, लेकिन उसकी व्याख्या में सावधानी की मांग जरूर करता है।
तीसरी कमी : मेरिट केवल UPSC के अंकों का दूसरा नाम नहीं
इस पूरी बहस में एक और दार्शनिक प्रश्न है—क्या UPSC में प्राप्त अंक ही मेरिट की अंतिम परिभाषा हैं?
स्वयं नेत्रपाल सिंह ने मेरिट को एक अमूर्त अवधारणा बताया है।
किसी व्यक्ति के UPSC में अधिक अंक आने का अर्थ यह है कि उसने उस परीक्षा की निर्धारित कसौटी पर बेहतर प्रदर्शन किया। लेकिन क्या इससे प्रशासनिक क्षमता, संवेदनशीलता, नेतृत्व, ईमानदारी, निर्णय क्षमता और सार्वजनिक सेवा की गुणवत्ता भी स्वतः तय हो जाती है?
जरूरी नहीं।
UPSC परीक्षा निस्संदेह अत्यंत कठिन और प्रतिष्ठित चयन प्रणाली है, लेकिन इसे प्रशासनिक क्षमता का पूर्ण और अंतिम मापदंड भी नहीं माना जा सकता।
इसलिए आरक्षण-विरोधी और आरक्षण-समर्थक—दोनों पक्षों के लिए सावधानी आवश्यक है कि वे परीक्षा के अंकों को सामाजिक या मानवीय क्षमता का अंतिम प्रमाणपत्र न बना दें।
फिर रिसर्च हमें क्या सिखाती है?
नेत्रपाल सिंह की रिसर्च का सबसे महत्वपूर्ण योगदान शायद यह नहीं है कि उसने आरक्षण को सही सिद्ध कर दिया या General category को गलत साबित कर दिया।
उसका वास्तविक योगदान इससे अधिक बुनियादी है।
यह रिसर्च हमें चेतावनी देती है कि—
«कटऑफ को मेरिट का पर्याय मत मानिए।»
किसी श्रेणी की न्यूनतम कटऑफ और उस श्रेणी के सभी चयनित उम्मीदवारों की वास्तविक क्षमता में भारी अंतर हो सकता है।
इसी तरह—
«आरक्षित श्रेणी को एक समान बौद्धिक समूह मानना भी गलत है।»
OBC, SC और ST के भीतर सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और भौगोलिक विविधता अत्यंत व्यापक है। इनमें देश के शीर्ष रैंक प्राप्त करने वाले उम्मीदवार भी हैं और कटऑफ के आसपास चयनित होने वाले उम्मीदवार भी।
ठीक इसी प्रकार General category भी कोई समान सामाजिक या आर्थिक समूह नहीं है।
सबसे संतुलित निष्कर्ष
नेत्रपाल सिंह की रिसर्च के आधार पर यह कहना उचित नहीं होगा कि UPSC में आरक्षण का कोई प्रभाव ही नहीं है। कटऑफ में अंतर वास्तविक है और आरक्षण चयन की संरचना को प्रभावित करता है।
लेकिन यह कहना भी तथ्यात्मक रूप से गलत होगा कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों की पूरी सफलता केवल कम कटऑफ का परिणाम है।
सच्चाई इन दोनों अतियों के बीच है।
आरक्षण एक संरचनात्मक अवसर प्रदान करता है, लेकिन उस अवसर का लाभ लेने वाले उम्मीदवारों में बड़ी संख्या अत्यंत उच्च प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता वाले लोगों की भी होती है।
नेत्रपाल सिंह के आंकड़े इसी दूसरे तथ्य को सामने लाते हैं।
उनकी रिसर्च की सबसे बड़ी ताकत है—लोकप्रिय धारणाओं के मुकाबले वास्तविक आंकड़ों को खड़ा करना।
उसकी सबसे बड़ी सीमा है—सार्वजनिक रूप से उपलब्ध विश्लेषण में सभी सांख्यिकीय नियंत्रणों और पद्धतियों का पर्याप्त विस्तार दिखाई नहीं देता।
इसलिए उनकी रिसर्च को अंतिम सत्य मानने के बजाय उसे एक महत्वपूर्ण प्रश्न की शुरुआत मानना अधिक उचित होगा।
अगला गंभीर शोध यह होना चाहिए कि UPSC के कम से कम दस से पंद्रह वर्षों के सभी चयनित उम्मीदवारों के डेटा को एक मानकीकृत डेटासेट में रखकर यह जांचा जाए—
– लिखित परीक्षा में वर्गवार वास्तविक औसत क्या है?
– मध्यिका क्या है?
– अंक-वितरण कितना अलग है?
– कितने आरक्षित उम्मीदवार General benchmark पार करते हैं?
– समान लिखित अंक पर Personality Test के अंक किस प्रकार बदलते हैं?
– क्या अलग-अलग इंटरव्यू बोर्डों में कोई व्यवस्थित अंतर दिखाई देता है?
– और अंततः, परीक्षा में प्राप्त रैंक का प्रशासनिक प्रदर्शन से वास्तविक संबंध कितना है?
तभी शायद भारत की सबसे पुरानी और सबसे भावनात्मक बहस—आरक्षण बनाम मेरिट—नारेबाजी से निकलकर वास्तव में प्रमाण और तर्क की जमीन पर पहुंच सकेगी।
और शायद तब हम यह समझ सकेंगे कि समस्या का सबसे बड़ा हिस्सा आरक्षण नहीं, बल्कि “मेरिट” शब्द को बिना परिभाषित किए उसके नाम पर चलने वाली बहस है।





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