राज्य आखिर क्यों है? यह सवाल राजनीतिक दर्शन की किताबों में जितना पुराना है, आज के भारत में उतना ही नया और बेचैन करने वाला बनता जा रहा है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य से नागरिक की पहली अपेक्षा यही रही है कि वह उसे जीवन की बुनियादी सुरक्षा और गरिमा उपलब्ध कराएगा। शिक्षा मिलेगी, इलाज मिलेगा, पीने का पानी मिलेगा, आने-जाने के साधन होंगे, बिजली और आवास जैसी आवश्यकताओं को बाजार की मनमानी पर नहीं छोड़ा जाएगा। गरीब आदमी को यह भरोसा रहेगा कि उसकी जेब खाली हो जाने पर भी बीमारी उसे बर्बाद नहीं करेगी और बच्चे की शिक्षा केवल पैसे वालों का अधिकार नहीं बनेगी। लेकिन जब राज्य धीरे-धीरे लोककल्याणकारी भूमिका से पीछे हटकर बाजार के लिए रास्ता बनाने लगे और शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, आवास तथा दूसरी आवश्यक सेवाएं खरीदने की वस्तुएं बनती चली जाएं तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि आखिर राज्य का औचित्य क्या बचता है?

भारत में यह सवाल इसलिए ज्यादा तीखा है क्योंकि एक तरफ आर्थिक विकास, निजी निवेश और बाजार विस्तार की कहानी है और दूसरी तरफ आम आदमी के घरेलू बजट पर शिक्षा, इलाज, मकान, बिजली, परिवहन और दूसरी आवश्यकताओं का बढ़ता बोझ है। जिसके पास पैसा है वह बेहतर स्कूल, बेहतर अस्पताल, बेहतर परिवहन और बेहतर आवास खरीद सकता है। जिसके पास पैसा नहीं है, उसके लिए सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहना मजबूरी है। ऐसे में “समान अवसर” का लोकतांत्रिक वादा धीरे-धीरे “जिसकी जेब भारी, उसकी सुविधा भारी” में बदलने लगे तो बेचैनी स्वाभाविक है।

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें चीन को लेकर भारत में जिज्ञासा पैदा होती है। चीन लोकतांत्रिक अर्थ में जनवादी राज्य नहीं है, लेकिन उसकी राजनीतिक भाषा में “common prosperity” यानी साझा समृद्धि एक केंद्रीय अवधारणा बन चुकी है। चीन का मॉडल यह दावा करता है कि बाजार आर्थिक विकास का इंजन हो सकता है, लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य, वृद्धावस्था देखभाल, सामाजिक सुरक्षा और आवास जैसी आवश्यक सेवाओं में राज्य की भूमिका कमजोर नहीं होनी चाहिए। चीन की 2026-2030 की नीतिगत रूपरेखा में भी taxation, social security और transfer payments के जरिए आय-वितरण को मजबूत करने तथा शिक्षा, स्वास्थ्य और elderly care की सार्वजनिक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

इसका अर्थ यह नहीं कि चीन में बिजली, पानी, इलाज, परिवहन, शिक्षा और मकान सब कुछ हर नागरिक को मुफ्त मिलता है। ऐसा दावा तथ्यात्मक रूप से गलत होगा। चीन में बाजार भी है, निजी क्षेत्र भी है और नागरिक अनेक सेवाओं के लिए भुगतान भी करते हैं। फर्क यह है कि आवश्यक सेवाओं में राज्य की भूमिका बहुत मजबूत है। सार्वजनिक अस्पतालों, अनिवार्य शिक्षा, सार्वजनिक परिवहन, बुनियादी ढांचे और subsidized housing जैसी व्यवस्थाओं में सरकार की सक्रिय भागीदारी है। हाल के वर्षों में चीन ने “common prosperity” के नाम पर सार्वजनिक सेवाओं को ग्रामीण और कम आय वाले क्षेत्रों तक ज्यादा पहुंचाने की नीति पर भी जोर दिया है। यानी चीन का प्रयोग “सब कुछ मुफ्त” का नहीं, बल्कि “आवश्यक सेवाओं को बाजार की पूरी दया पर न छोड़ने” का है।

यह अंतर भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत को चीन से यह सीखने की जरूरत नहीं कि सरकार हर वस्तु मुफ्त कर दे। सीख यह हो सकती है कि बाजार को विकास का साधन मानते हुए भी नागरिक की बुनियादी जरूरतों को बाजार की वस्तु बनने से कैसे रोका जाए। चीन आज भी बड़े पैमाने पर infrastructure पर राज्य की शक्ति लगाता है। सितंबर 2026 में भी चीन ने स्थानीय परियोजनाओं और परिवहन जैसे infrastructure क्षेत्रों के लिए 800 अरब युआन के policy-financing programme का इस्तेमाल शुरू किया है। यह बताता है कि बाजार अर्थव्यवस्था के बावजूद वहां राज्य infrastructure से पीछे हटने को तैयार नहीं है।

दुनिया में इससे अलग एक दूसरा प्रयोग नॉर्डिक देशों का है। डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों ने बाजार अर्थव्यवस्था को समाप्त नहीं किया, बल्कि ऊंचे करों के जरिए मजबूत welfare state बनाया। वहां स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं पर भारी सरकारी खर्च होता है। इसका मतलब यह नहीं कि वहां सब कुछ मुफ्त है। नागरिक ऊंचे कर चुकाते हैं और उसी सामूहिक कर व्यवस्था से स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी सुरक्षा, वृद्धावस्था सहायता और अन्य सुविधाओं का वित्तपोषण होता है। इसीलिए “मुफ्त” शब्द के बजाय “कम प्रत्यक्ष कीमत पर सार्वभौमिक सार्वजनिक सेवा” ज्यादा सही अभिव्यक्ति है।

यहीं से भारत के सामने असली प्रश्न खड़ा होता है—क्या आम भारतीय को भी बिजली, पानी, शिक्षा, इलाज, सार्वजनिक परिवहन और आवास जैसी आवश्यक सेवाएं नाममात्र के शुल्क पर मिलनी चाहिए? इसका उत्तर बहुत हद तक हां में हो सकता है, लेकिन इसके लिए वित्तीय संसाधन चाहिए। और यहीं सवाल आता है कि वह संसाधन आएगा कहां से?

क्या गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग पर टैक्स बढ़ाया जाए? नहीं। यदि सरकार एक हाथ से महंगी शिक्षा और चिकित्सा के कारण नागरिक को परेशान करे और दूसरे हाथ से उससे अधिक कर वसूल करे तो लोककल्याण का उद्देश्य ही पराजित होगा। इसके बजाय कर व्यवस्था का सिद्धांत होना चाहिए—जिसकी भुगतान क्षमता जितनी अधिक, उसका सामाजिक योगदान उतना अधिक।

यहीं wealth tax की बहस महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत में फिलहाल वार्षिक net wealth tax नहीं है। दुनिया में भी wealth tax का अनुभव मिश्रित रहा है। OECD के अनुसार कुछ देशों ने इसे प्रशासनिक कठिनाइयों और कम राजस्व के कारण समाप्त किया, लेकिन नॉर्वे, स्पेन और स्विट्जरलैंड जैसे देशों में संपत्ति पर वार्षिक कर की व्यवस्थाएं अभी भी मौजूद हैं। ऐतिहासिक रूप से wealth-tax की दरें लगभग 0.2 प्रतिशत से 1.5 प्रतिशत तक और कुछ देशों में top rates 2.5 प्रतिशत तक रही हैं।

इसलिए भारत में अरबपतियों या अत्यधिक संपन्न परिवारों की शुद्ध संपत्ति पर 1 प्रतिशत wealth tax का विचार अपने आप में कोई असंभव या दुनिया से बाहर का विचार नहीं है। सवाल इसकी दर से ज्यादा इसके डिजाइन का है। ₹10 करोड़ का मकान रखने वाले मध्यमवर्गीय परिवार और ₹10,000 करोड़ की संपत्ति वाले उद्योगपति को एक ही तराजू पर रखना मूर्खता होगी। किसी भी wealth tax की पहली शर्त बहुत ऊंची exemption threshold और उसके ऊपर progressive rate होनी चाहिए। उदाहरण के लिए ₹100 करोड़ से नीचे कोई annual wealth tax न हो और उसके बाद 0.25, 0.5 तथा 1 प्रतिशत जैसी क्रमिक दरों पर विचार किया जा सकता है। इससे मकान की कीमत बढ़ने से अचानक मध्यमवर्ग wealth tax के दायरे में नहीं आएगा।

हालांकि wealth tax लगाना जितना आसान सुनाई देता है, उसका प्रशासन उतना आसान नहीं है। शेयर बाजार में listed shares का मूल्य पता लगाया जा सकता है, लेकिन unlisted companies, जमीन, private businesses, trusts और offshore assets का मूल्यांकन कठिन होता है। OECD का अनुभव भी यही बताता है कि wealth tax की सफलता उसके threshold, valuation rules और enforcement पर निर्भर करती है। नॉर्वे जैसे देशों में मुख्य आवास को बाजार मूल्य से कम taxable valuation देने जैसी व्यवस्थाएं भी हैं।

इसलिए भारत में wealth tax का उद्देश्य “अमीरों को सजा देना” नहीं होना चाहिए। उद्देश्य होना चाहिए—अत्यधिक संपत्ति-संकेंद्रण से पैदा होने वाली असमानता का एक हिस्सा सार्वजनिक सुविधाओं में बदलना। अगर हजारों करोड़ की संपत्ति रखने वाला व्यक्ति सालाना अपनी संपत्ति का एक छोटा हिस्सा सामाजिक infrastructure के लिए देता है और उसी पैसे से गरीब बच्चों के लिए स्कूल, जिला अस्पताल, पेयजल और सार्वजनिक परिवहन बेहतर होते हैं तो यह संपत्ति विरोध नहीं, सामाजिक अनुबंध की मजबूती होगी।

लेकिन केवल wealth tax पर्याप्त नहीं होगा। यहां Corporate Social Responsibility यानी CSR की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत में FY 2023-24 में कंपनियों ने ₹34,908.75 करोड़ CSR पर खर्च किए। 2019-20 से 2023-24 के पांच वर्षों में CSR expenditure ₹1.44 लाख करोड़ से अधिक रहा। यह राशि सरकारी सामाजिक खर्च की तुलना में छोटी है, लेकिन अपने आप में इतनी बड़ी है कि यदि इसका उपयोग ईमानदारी और परिणाम-आधारित तरीके से किया जाए तो लाखों लोगों की जिंदगी बदल सकती है।

दिक्कत यह है कि CSR को केवल “पैसा खर्च कर दिया गया” मान लेना पर्याप्त नहीं है। सरकार ने इस क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण सुधार किए हैं। CSR-1 registration, annual reporting और बड़े CSR projects के independent impact assessment जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं। जिन कंपनियों की औसत CSR obligation तीन वर्षों में ₹10 करोड़ या उससे अधिक है, उनके निर्धारित बड़े projects के लिए independent impact assessment का प्रावधान है। हाल में भारतीय Institute of Corporate Affairs ने भी CSR को expenditure से आगे ले जाकर impact, outcomes और value addition से जोड़ने पर जोर दिया है।

फिर भी CSR को वास्तविक जनकल्याण का साधन बनाने के लिए और आगे जाना होगा। कंपनी ने किस NGO को पैसा दिया, NGO ने किस जिले में कौन-सा काम किया, कितने लाभार्थी हुए, प्रति लाभार्थी कितना खर्च हुआ, project जमीन पर मौजूद है या नहीं—इन सभी का डिजिटल सार्वजनिक रिकॉर्ड होना चाहिए। ₹10 करोड़ के अस्पताल का उद्घाटन हो जाना CSR की सफलता नहीं है; अस्पताल में डॉक्टर हैं या नहीं, मरीजों का इलाज हो रहा है या नहीं, मशीन चल रही है या नहीं—यह सफलता की कसौटी होनी चाहिए। CSR का हिसाब “expenditure” से नहीं, “outcome” से होना चाहिए।

यही सिद्धांत धार्मिक संस्थाओं पर भी लागू किया जा सकता है। भारत में बड़े धार्मिक स्थलों और धार्मिक ट्रस्टों के पास श्रद्धालुओं से प्राप्त दान और चढ़ावे के रूप में बड़ी आर्थिक शक्ति है। यहां भी किसी धर्म विशेष को निशाना बनाने के बजाय एक समान कानून की जरूरत है। मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, जैन या बौद्ध संस्थान—जो भी सार्वजनिक दान से बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाते हैं, उनसे वित्तीय पारदर्शिता और सामाजिक दायित्व की अपेक्षा की जा सकती है।

लेकिन इसे “सरकार चढ़ावे का पैसा छीन ले” के रूप में देखना गलत होगा। बेहतर व्यवस्था यह हो सकती है कि बड़े सार्वजनिक धार्मिक ट्रस्ट अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, पेयजल, छात्रवृत्ति, वृद्धजन सेवा, दिव्यांग सहायता और आपदा राहत जैसे कार्यों पर खर्च करें। पैसा सरकार को देना अनिवार्य न हो; संस्था स्वयं करे, किसी प्रमाणित NGO के माध्यम से करे या किसी पारदर्शी सामाजिक कोष में दे। शर्त केवल यह हो कि पैसा वास्तव में जनहित में खर्च हुआ हो और उसका हिसाब सार्वजनिक हो।

इससे आस्था और जनसेवा के बीच एक खूबसूरत सेतु बन सकता है। श्रद्धालु मंदिर में चढ़ावा देते हैं तो उन्हें यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनकी आस्था से निकला संसाधन समाज में क्या कर रहा है। किसी मंदिर का सामाजिक अस्पताल केवल हिंदुओं के लिए नहीं, सभी के लिए हो; किसी मस्जिद या गुरुद्वारे की सामाजिक परियोजना भी धर्म की सीमा से बाहर निकलकर सर्वजन के लिए हो। तब धार्मिक दान संकीर्ण धार्मिक खर्च से आगे बढ़कर सार्वजनिक संपदा का रूप ले सकता है।

इस पूरी बहस में एक और बात नहीं भूलनी चाहिए। CSR और धार्मिक दान को सरकार के बजट का विकल्प नहीं बनाया जा सकता। राज्य की पहली जिम्मेदारी राज्य की ही रहेगी। सरकार यह नहीं कह सकती कि अस्पताल बनाने के लिए कंपनियां हैं, स्कूल चलाने के लिए NGO हैं और गरीबों की मदद के लिए धार्मिक संस्थाएं हैं, इसलिए सरकार की जिम्मेदारी कम हो गई। उलटे राज्य को इन अतिरिक्त संसाधनों का बेहतर नियमन और समन्वय करना चाहिए।

कल्पना कीजिए कि भारत में एक “राष्ट्रीय सामाजिक निवेश ढांचा” बनाया जाए। सरकार अपनी जिम्मेदारी के अनुसार स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी, परिवहन और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करे। इसके ऊपर CSR से आने वाला लगभग ₹35 हजार करोड़ सालाना संसाधन जोड़ा जाए। अत्यधिक संपन्न वर्ग से सीमित और progressive wealth tax से अतिरिक्त राजस्व आए। बड़े धार्मिक और charitable trusts अपने संसाधनों का एक निश्चित हिस्सा प्रमाणित जनकल्याणकारी कार्यों में लगाएं। और इन सभी स्रोतों से होने वाले खर्च का एक सार्वजनिक डिजिटल dashboard हो।

तब नागरिक देख सकेगा कि उसके जिले में कितने पैसे आए और कहां खर्च हुए। किस कंपनी ने कितना दिया, किस धार्मिक ट्रस्ट ने कितना लगाया, सरकार ने कितना दिया और उससे कितने लोगों को लाभ मिला—सब कुछ सामने हो। इससे CSR भी राजनीतिक कृपा का साधन बनने से बचेगा और धार्मिक दान भी अपारदर्शी आर्थिक शक्ति में बदलने से।

चीन की “common prosperity” नीति का सबसे उपयोगी पाठ भी शायद यही है। चीन ने बाजार को समाप्त नहीं किया है। वहां निजी कंपनियां हैं, अरबपति हैं और पूंजी बाजार है। लेकिन राज्य यह संदेश देता है कि निजी आर्थिक शक्ति इतनी बड़ी नहीं हो सकती कि सार्वजनिक हित उसके सामने गौण हो जाए। Alibaba और Ant Group के मामले में चीन ने monopoly और financial regulation के जरिए बड़ी निजी आर्थिक शक्ति पर नियंत्रण दिखाया; दूसरी ओर common prosperity के तहत taxation, social security और transfers को आय-वितरण के साधन के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। चीन की वर्तमान नीतिगत दिशा शिक्षा, स्वास्थ्य, elderly care और subsidized housing तक सार्वजनिक पहुंच बढ़ाने पर भी जोर देती है।

भारत को चीन का राजनीतिक मॉडल अपनाने की जरूरत नहीं है और न ही अपनाना चाहिए। लोकतंत्र भारत की बुनियादी ताकत है। लेकिन लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ यह भी है कि नागरिक की गरिमा बाजार की क्रयशक्ति पर निर्भर न हो। यदि गरीब आदमी का बच्चा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित है क्योंकि उसके पास फीस नहीं है, यदि इलाज के खर्च से परिवार कर्ज में डूब जाता है, यदि शहर में सार्वजनिक परिवहन इतना कमजोर है कि नौकरी करने के लिए निजी वाहन रखना जरूरी हो जाता है, तो आर्थिक विकास की चमक के बावजूद लोकतंत्र का सामाजिक आधार कमजोर होता है।

इसलिए भारत को न तो पूरी अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए और न ही हर सामाजिक जरूरत को बाजार के हवाले कर देना चाहिए। बीच का रास्ता ही अधिक मानवीय और व्यावहारिक हो सकता है। सरकार आवश्यक सेवाओं की न्यूनतम गुणवत्ता और पहुंच की गारंटी दे। निजी क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा और नवाचार की पूरी जगह मिले। गरीब को आवश्यक सेवाएं मुफ्त या लगभग मुफ्त मिलें। निम्न-मध्यम वर्ग को नाममात्र के शुल्क पर उच्च गुणवत्ता की सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध हों। और जो लोग असाधारण रूप से संपन्न हैं, उनसे उनकी क्षमता के अनुरूप अधिक सामाजिक योगदान लिया जाए।

यहां “मुफ्त” शब्द से भी सावधान रहने की जरूरत है। दुनिया में शायद ही कोई देश ऐसा है जहां रोटी, कपड़ा, मकान, बिजली, पानी, परिवहन, शिक्षा और इलाज सब नागरिकों को पूर्णतः मुफ्त मिलता हो। जहां सेवाएं नागरिक को मुफ्त या बेहद सस्ती दिखाई देती हैं, वहां उनकी कीमत करदाता पहले से चुका रहा होता है। इसलिए भारत को “सब कुछ मुफ्त” का नारा नहीं, बल्कि “आवश्यक सेवाएं सबकी पहुंच में” का लक्ष्य रखना चाहिए।

आखिर राज्य की सफलता का पैमाना यह नहीं हो सकता कि उसने कितनी बड़ी GDP बनाई। सवाल यह भी होना चाहिए कि उस GDP ने आम नागरिक के जीवन को कितना आसान बनाया। अगर अर्थव्यवस्था बढ़ती जाए और साथ में शिक्षा, चिकित्सा और आवास महंगे होते जाएं तो विकास का लाभ किसके लिए है? यदि अरबपतियों की संपत्ति कई गुना बढ़ती रहे और सरकारी अस्पताल में गरीब को दवा के लिए भटकना पड़े तो विकास की नैतिकता पर सवाल उठेंगे ही।

भारत के सामने इसलिए एक नया सामाजिक अनुबंध बनाने की जरूरत है—ऐसा अनुबंध जिसमें बाजार आर्थिक विकास का साधन हो लेकिन नागरिक का जीवन बाजार की दया पर न छोड़ा जाए। अमीर अधिक योगदान दें, गरीब कम दें; CSR का पैसा वास्तविक परिणाम पैदा करे; बड़े धार्मिक और charitable institutions अपने संसाधनों का एक हिस्सा सर्वजन हित में लगाएं; सरकार भ्रष्टाचार और leakage को कम करे; और शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, बिजली तथा सार्वजनिक परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करे।

आखिरकार सवाल यह नहीं है कि चीन कितना जनवादी है, नॉर्डिक देश कितने कल्याणकारी हैं और भारत कितना बाजारवादी। असली सवाल इससे कहीं बड़ा है—क्या किसी आधुनिक राज्य की सफलता का अर्थ यह हो सकता है कि नागरिक को जीवित रहने और सम्मान से जीने की आवश्यक चीजें बाजार से खरीदनी पड़ें?

यदि इसका उत्तर नहीं है तो भारत को विकास की दिशा पर फिर से विचार करना होगा। बाजार रहे, मुनाफा रहे, निजी उद्यम रहे—लेकिन नागरिक की बुनियादी गरिमा बिकाऊ वस्तु न बने। यही किसी भी सच्चे लोककल्याणकारी राज्य की पहली पहचान होनी चाहिए।

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