श्मशान घाटों पर न टीन शेड, न पक्के रास्ते; बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच ने डीएम को सौंपा ज्ञापन
उरई (जालौन)। एक ओर देश विकसित भारत और आधुनिक बुनियादी ढांचे की ओर बढ़ने का दावा कर रहा है, वहीं जालौन के कई गांवों में लोगों को अपने परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए भी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। बारिश के मौसम में बिना पक्के श्मशान घाट, टीन शेड और पहुंच मार्ग के अंतिम संस्कार की मुश्किलें और बढ़ गई हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार पिछले एक माह में जिले के नौ से अधिक गांवों से ऐसी शिकायतें सामने आई हैं।
हाल ही में हरकौती गांव में देवेंद्र दोहरे के निधन के बाद हुई बारिश ने समस्या की गंभीरता उजागर कर दी। श्मशान स्थल पर पक्का शेड नहीं होने के कारण परिजनों को बारिश के बीच अंतिम संस्कार की व्यवस्था करनी पड़ी। इसी तरह भदरेखी, नौरेजपुर, सुरावली, गोराकरनपुर, गढ़गुवा, तीतराखलीलपुर, खैरवार व्योना और हैदलपुर समेत कई गांवों में श्मशान घाट तक पक्के रास्ते और अन्य सुविधाओं के अभाव की शिकायतें सामने आई हैं। बारिश में कीचड़ और जलभराव के बीच शवयात्रा निकालना ग्रामीणों के लिए बड़ी परेशानी बन जाता है।
बुंदेलखंड दलित अधिकार मंच के बैनर तले सामाजिक कार्यकर्ताओं, ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों के प्रतिनिधियों ने जिलाधिकारी को ज्ञापन देकर समस्या के स्थायी समाधान की मांग की। मंच के संयोजक एवं हाईकोर्ट अधिवक्ता कुलदीप कुमार बौद्ध ने कहा कि अंतिम संस्कार के लिए सम्मानजनक और सुरक्षित व्यवस्था नागरिक गरिमा से जुड़ा प्रश्न है।
ज्ञापन में हरकौती समेत प्रभावित गांवों में पक्के शेड, ऊंचे चबूतरे, पेयजल, जलनिकासी और पक्के संपर्क मार्ग तत्काल बनवाने की मांग की गई है। साथ ही पूरे जिले की दलित एवं वंचित बस्तियों का सर्वे कर जहां श्मशान के लिए भूमि उपलब्ध नहीं है, वहां सरकारी भूमि चिन्हित करने तथा विभिन्न विकास योजनाओं के बजट का अभिसरण कर निर्माण कराने की मांग रखी गई।
मंच ने यह भी मांग की है कि निर्माण पूरा होने तक मानसून के दौरान अस्थायी शेड, वाटरप्रूफ तिरपाल और सूखी लकड़ी जैसी तत्काल व्यवस्था सुनिश्चित की जाए तथा लापरवाही के लिए संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय हो। प्रतिनिधिमंडल में विभिन्न तहसीलों के पदाधिकारी, ग्राम प्रधान और ग्रामीणों सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे।






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