22orai01 22orai02न्यामतपुर-उरई। सूखे की काली छाया से पूरे जनपद का माहौल मनहूस नजर आ रहा है। महेबा ब्लाॅक की गिनती तो शुरू से डार्क जोन में रही है। जिसके कारण सूखे का सबसे ज्यादा असर इस ब्लाॅक पर पड़ा है। विडंबना यह है कि जनजीवन के लिए मुश्किल हालातों के बावजूद प्रशासन के स्तर पर विसंगतियों और विरोधाभासों का समाधान नही हो पा रहा है।
महेबा ब्लाॅक में नलकूपों की कमी और नहरों का छोर होने की वजह से बहुत बड़ा इलाका है। जिसमें बुबाई तक नही हो सकी है। इन खेतों से उड़ती गर्द सूखे की विकरालता की दास्तां सुना रही है। दूसरी ओर जहां सिचाई का इंतजाम हो गया था वहां बुबाई के बाद लहलहाती फसल के लिए अन्ना जानवर दुश्मन बन गये हैं। किसान का दिन-रात इनकी रखवाली में गुजरता है फिर भी जरा सी चूक होते ही अन्ना मवेशी खेत चरने में देर नही करते। ऐसे किसान सदमे की हालत में हैं। जो कि कोई भी अनहोना कदम उठा सकते हैं। लेकिन प्रशासन की उन्हें संबल देने की कार्रवाइयां केवल अखबारों की विज्ञप्तियों तक में सिमट कर रह गई हैं।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री कुछ सप्ताह पहले ही बुंदेलखंड में अन्ना मवेशियों के चारे के लिए भारी भरकम बजट प्रत्येक जिले को जारी करा चुके हैं। कहते हैं कि अब पछताये का होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत। आज चिड़िया नही भरेपूरे जानवर भूख के कारण खेत चुगने को बेताब बैठे हैं और प्रशासन उन्हें थामने के लिए सरकारी खजाने का मुंह अभी खोलने की बजाय किसानों की पूरी तरह बर्बादी के बाद जागने का निश्चय किये बैठा है। हताश किसानों में इस निष्ठुर रवैया से आक्रोश का ज्वालामुखी धधकने लगा है। जिसमें विस्फोट हो गया तो मुख्यमंत्री का उन्हें मलहम लगाने के लिए सारा किया धरा बेकार हो जायेगा।

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