भारतीय राजनीति के समकालीन इतिहास में दक्षिणपंथ और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के उभार ने दो ऐसे महानायकों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने आभामंडल से न केवल अपनी पार्टियों को बल्कि देश की राजनीतिक दिशा को भी प्रभावित किया है। ये दो नाम हैं—नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ। प्रथम दृष्ट्या दोनों नेताओं में अद्भुत साम्य दिखाई देता है। दोनों अविवाहित हैं, दोनों का जीवन एक तपस्वी की तरह अनुशासित है, दोनों की छवि भ्रष्टाचार-मुक्त और कड़क प्रशासक की है, और दोनों ही ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में बहुसंख्यक समाज के एक बड़े वर्ग में गहरे तक स्वीकृत हैं।
यह एक स्थापित राजनीतिक यथार्थ है कि योगी आदित्यनाथ के लिए नरेन्द्र मोदी केवल एक मार्गदर्शक नहीं बल्कि एक राजनीतिक लक्ष्य भी हैं। योगी, मोदी की उस विराट राजनीतिक ऊंचाई को छूना चाहते हैं और कई मायनों में खुद को मोदी से भी बड़े और अधिक मुखर ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के रूप में स्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखते हैं। यही कारण है कि शासन प्रणाली से लेकर भाषणों की शैली तक, योगी को कई मामलों में मोदी के पद-चिन्हों पर चलते हुए देखा जाता है। परंतु, इस समानता के बावजूद, दोनों नेताओं के राजनीतिक उभार की परिस्थितियाँ, उनकी सामाजिक स्वीकार्यता का दायरा, और उनके प्रशासनिक कौशल का परसेप्शन (धारणा) एक-दूसरे से काफी भिन्न है। जहाँ मोदी हिंदुओं के सर्वमान्य ‘गौरव पुरुष’ के रूप में निर्विवाद रूप से स्थापित हुए, वहीं योगी आदित्यनाथ के लिए उस राष्ट्रीय दर्जे को हासिल करना एक अत्यंत जटिल और बाधाओं से भरी राह प्रतीत होती है।
आकस्मिक राज्याभिषेक: 1998 का गुजरात बनाम 2017 का उत्तर प्रदेश
नरेन्द्र मोदी और योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुँचने की कहानी में एक अद्भुत और ऐतिहासिक समानता है। दोनों ही नेता अपने-अपने राज्यों के निर्णायक मोड़ों पर ‘डार्क हॉर्स’ बनकर उभरे और पार्टी के स्थापित चेहरों को पछाड़कर सत्ता के शीर्ष पर काबिज हुए।
नरेन्द्र मोदी का उभार (1998 से 2001)
साल 1998 के गुजरात विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने नरेन्द्र मोदी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया था। उस समय मोदी गुजरात की प्रत्यक्ष राजनीति से दूर, दिल्ली में राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) के रूप में काम कर रहे थे। राज्य में पार्टी का मुख्य चेहरा और कमान केशुभाई पटेल के हाथों में थी। भाजपा ने केशुभाई के नेतृत्व में ही वह चुनाव जीता। लेकिन 1998 से 2001 के बीच परिस्थितियों ने ऐसा मोड़ लिया कि केशुभाई पटेल की प्रशासनिक पकड़ कमजोर होने लगी। भुज के विनाशकारी भूकंप के कुप्रबंधन और उपचुनावों में भाजपा की लगातार हार ने केंद्रीय नेतृत्व को चिंतित कर दिया। कुशल प्रशासन की तात्कालिक आवश्यकता को देखते हुए, अक्टूबर 2001 में केंद्रीय नेतृत्व ने अचानक केशुभाई को हटाकर सत्ता का सेहरा नरेन्द्र मोदी के सिर बांध दिया। मोदी, जो कभी राज्य के चुनावी चेहरे नहीं थे, अचानक गुजरात के भाग्यविधाता बन गए।
योगी आदित्यनाथ का उदय (2017)
ठीक इसी तर्ज पर, 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी योगी आदित्यनाथ भाजपा के मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं थे। उस समय पूरा चुनाव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के संगठनात्मक नेतृत्व में लड़ा गया था। जब भाजपा को ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत मिला, तो हर तरफ केशव प्रसाद मौर्य की जय-जयकार हो रही थी और मुख्यमंत्री की रेस में उनका नाम सबसे आगे चल रहा था।
दूसरी ओर, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व उत्तर प्रदेश जैसे विशाल और प्रशासनिक रूप से जटिल राज्य को संभालने के लिए एक सुशिक्षित, अनुभवी और तेज-तर्रार चेहरे के रूप में मनोज सिन्हा की ओर निहार रहा था। राजनीतिक गलियारों में एक और नाम की चर्चा थी—वरुण गांधी। गांधी नाम की विरासत को कांग्रेस से छीनने और एक कट्टर हिंदू युवा चेहरे को उभारने की रणनीति के तहत वरुण गांधी का नाम भाजपा के एक धड़े को काफी रास आ रहा था। लेकिन ठीक उसी तरह जैसे 2001 में गुजरात में हुआ था, सारे कयासों को धता बताते हुए केंद्रीय नेतृत्व ने अचानक गोरखपुर के फायरब्रांड सांसद योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंप दी।
संकट और पहचान का निर्माण: गोधरा (2002) बनाम यू.पी. का दंगा-मुक्त मॉडल
दोनों नेताओं को सत्ता मिलने के तुरंत बाद ऐसी कानून-व्यवस्था की चुनौतियों और सांप्रदायिक तनाव का सामना करना पड़ा, जिसने उनकी भावी राजनीतिक पहचान की नींव रखी।
मोदी और इतिहास का पराजय बोध (2002)
मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद, फरवरी 2002 में गोधरा कांड हुआ और उसके बाद पूरे गुजरात में भयानक दंगे भड़क गए। इस भीषण संकट को नरेन्द्र मोदी ने एक अभूतपूर्व राजनीतिक अवसर में बदल दिया। उन्होंने सदियों के पराजय बोध से कुंठित और रक्षात्मक मुद्रा में रहने वाले हिंदू समाज को एक नया जोश और आक्रामक आत्मविश्वास प्रदान किया। मोदी ने गुजरात की अस्मिता और हिंदू गौरव को एक साथ जोड़कर ऐसा नैरेटिव (कथानक) तैयार किया, जिसने उन्हें केवल एक मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि एक ‘युग पुरुष’ और हिंदुओं के रक्षक के रूप में स्थापित कर दिया।
योगी का पराक्रमी पुरोधा रूप
योगी आदित्यनाथ भी मोदी की इसी वैचारिक लाइन के प्रबल तलबगार थे। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था को अपनी राजनीति का मुख्य हथियार बनाया। दंगों और अपराधियों के मामलों में उन्होंने यह दिखा दिया कि किस तरह से मौजूदा कानून को अपराधियों और उपद्रवियों के एकतरफा दमन के लिए मोड़ा जा सकता है। अपराधियों के घरों पर बुलडोजर चलवाने की उनकी नीति (“बुलडोजर मॉडल”) ने उन्हें बहुसंख्यक समाज के भीतर मोदी की तरह ही एक और ‘पराक्रमी पुरोधा’ के रूप में स्थापित कर दिया। योगी ने यह संदेश दिया कि वे बहुसंख्यक हितों की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।
जातिगत कार्ड की राजनीति: मोदी का चतुराई भरा प्रति-जातिवाद बनाम योगी की ‘ठाकुर परस्ती’
राजनीति में केवल बहुसंख्यक पहचान काफी नहीं होती, उसके भीतर मौजूद आंतरिक जातिगत अंतर्विरोधों को संभालना नेतृत्व की असली परीक्षा होती है। इसी मोर्चे पर मोदी और योगी के बीच का सबसे बड़ा अंतर और योगी की सबसे बड़ी कमजोरी उभरकर सामने आती है।
मोदी की दीर्घकालिक और निरापद रणनीति
गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेन्द्र मोदी पर भी नौकरशाही और प्रशासन में ब्राह्मणों के उत्पीड़न और उन्हें हाशिए पर धकेलने के आरोप लगे थे। तत्कालीन गृह राज्य मंत्री रहे हरेन पंड्या और कई वरिष्ठ ब्राह्मण अधिकारियों (जैसे आर.बी. श्रीकुमार, संजीव भट्ट) के साथ उनके टकराव जगजाहिर थे। लेकिन मोदी ने इस नाराजगी के काउंटर में गुजरात में पिछड़ों को अपने साथ लामबंद करने जैसा कोई तात्कालिक प्रति-जातिवादी कार्ड नहीं खेला। उन्होंने खुद को जाति विमर्श से पूरी तरह दूर रखा और ‘विकास पुरुष’ की छवि बनाए रखी।
जब वे 2014 में राष्ट्रीय राजनीति में आए, तब उन्होंने सही समय पर अपने इस ‘पिछड़ा कार्ड’ (OBC पहचान) को तुरुप के इक्के की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि तब तक वे गुजरात में अपनी विकासवादी छवि के दम पर ब्राह्मणों और अन्य सवर्णों की ओर से खुद को पूरी तरह निरापद (सुरक्षित) बना चुके थे। राष्ट्रीय स्तर पर सवर्णों को यह विश्वास था कि मोदी उनकी अनदेखी नहीं करेंगे, इसलिए उनका पिछड़ा कार्ड दूसरों को नहीं खटका।
योगी आदित्यनाथ का सजातीय मोह और ‘ठाकुर परस्ती’
इसके विपरीत, योगी आदित्यनाथ एक सन्यासी और नाथ संप्रदाय के मुख्य पीठाधीश्वर होने के बावजूद, अपने सजातीयों (क्षत्रियों/ठाकुरों) के सिरमौर बनने के मोह का संवरण नहीं कर पाए। संभव है कि एक सामान्य क्षत्रिय परिवार में जन्म लेने की वजह से बचपन और युवावस्था में जो सामाजिक परिवेश उन्हें मिला, उसमें दबंग क्षत्रिय नायकों की तरह बनने का सपना उनके अवचेतन मन में घर कर गया हो। यही कारण है कि सत्ता मिलने पर उनके हाव-भाव और प्रशासनिक निर्णयों में वही ‘ठाकुरवादी’ रवैया प्रकट होने लगा, जिसके दूरगामी राजनीतिक परिणामों को देख पाने में वे असमर्थ रहे।
योगी सरकार पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि प्रशासन, पुलिस और महत्वपूर्ण पदों पर एक विशेष जाति (ठाकुरों) को तरजीह दी गई। उनकी यह ‘ठाकुर परस्ती’ उत्तर प्रदेश के सामाजिक रूप से जागरूक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली ब्राह्मण समुदाय के एक बड़े वर्ग को असहज और असंतुष्ट करने वाली साबित हुई। ब्राह्मणों की यह नाराजगी ही योगी आदित्यनाथ के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा बन गई है, जो उन्हें मोदी की तरह एक ‘सर्वमान्य हिंदू पुरोधा’ के रूप में पूर्ण स्वीकृति पाने से रोकती है।
सर्व-मान्यता का संकट: आक्रामक समर्थक बनाम चुनावी यथार्थ
योगी आदित्यनाथ ने अपने आक्रामक बयानों, भगवा वेशभूषा और ‘बुलडोजर न्याय’ के जरिए अपने समर्थकों का एक बहुत बड़ा और कट्टर वर्ग तैयार कर लिया है। सोशल मीडिया और दक्षिणपंथी विमर्श में उनके कद को इतना विराट और अपराजेय दिखाया जाता है कि वे मोदी के इकलौते उत्तराधिकारी नजर आते हैं। लेकिन जब बात वास्तविक चुनाव परिणामों की आती है, तो यह कल्पित विराट तस्वीर पूरी तरह पलट जाती है।
विवादित व्यक्तित्व का ग्रहण और सामाजिक अलगाव
एक निष्पक्ष और सही आकलन यह है कि योगी आदित्यनाथ की सर्व-मान्यता की ओर होने वाली ग्रोथ पर उनके ‘विवादित व्यक्तित्व’ का ग्रहण लग गया है। उत्तर प्रदेश की सामाजिक संरचना बेहद जटिल है। योगी की नीतियों और उनके हाव-भाव के कारण न केवल ब्राह्मणों का एक वर्ग उनसे दूर हुआ, बल्कि दलित और पिछड़े वर्ग भी खुद को योगी सरकार से आत्मीयता से नहीं जोड़ पाते।
ग्रामीण इलाकों में छुट्टा पशुओं की समस्या, सरकारी नौकरियों में कथित जातिगत असंतुलन, और दलितों-पिछड़ों के प्रति पुलिसिया तंत्र का रवैया—इन सभी नीतियों के लिए कहीं न कहीं योगी का प्रशासनिक तंत्र ही जिम्मेदार है। इसके कारण गैर-ठाकुर जातियों में यह परसेप्शन बना कि यह सरकार केवल एक विशेष वर्ग के हितों की चिंता करती है। नतीजतन, 2024 के लोकसभा चुनावों में उत्तर प्रदेश के भीतर भाजपा को जो भारी नुकसान उठाना पड़ा, उसने योगी के उस ‘अपराजेय’ होने के मिथक और परसेप्शन को ध्वस्त कर दिया।
ब्राह्मणों का ‘मेंटल स्विच’ और राजनीतिक चातुर्य की कमी
योगी आदित्यनाथ ने अपने कार्यकाल में अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के कायाकल्प, और प्रयागराज कुंभ के वैश्विक भव्यता जैसे सांस्कृतिक कार्यों को चरम पर पहुँचाया। उन्होंने मंदिरों की संस्कृति और धार्मिक कर्मकांडों की लहर को उत्तर प्रदेश में एक ज्वार का स्तर प्रदान किया। वैचारिक रूप से देखा जाए तो, इस धार्मिक पुनरुत्थान के कारण ब्राह्मण समुदाय का समर्थन उनके पक्ष में पूरी तरह उमड़ पड़ना चाहिए था, क्योंकि ब्राह्मणों को हमेशा से हिंदू समाज का ‘मेंटल स्विच’ (वैचारिक मार्गदर्शक) माना जाता रहा है।
परंतु, योगी आदित्यनाथ में उस पारंपरिक राजनीतिक चातुर्य की कमी दिखाई देती है जो मोदी में कूट-कूट कर भरी है। योगी अपने इन महान सांस्कृतिक और धार्मिक योगदानों की राजनीतिक कीमत वसूलने में पर्याप्त सफलता हासिल नहीं कर पाए। वे धार्मिक रूप से तो हिंदुओं को प्रभावित कर सके, लेकिन राजनीतिक रूप से ब्राह्मणों के ‘मेंटल स्विच’ को अपने पक्ष में ऑन नहीं रख पाए, क्योंकि प्रशासनिक स्तर पर उनकी ‘ठाकुर परस्ती’ धार्मिक उपलब्धियों पर भारी पड़ गई।
आर्थिक मॉडल और ब्रांडिंग: गुजरात मॉडल बनाम यू.पी. मॉडल का परसेप्शन
एक कुशल राजनेता को अपनी वैचारिक छवि के साथ-साथ एक मजबूत आर्थिक मॉडल की भी आवश्यकता होती है। इस मोर्चे पर भी दोनों नेताओं के बीच परसेप्शन का एक बड़ा अंतर दिखाई देता है।
मोदी की आकर्षक ब्रांडिंग
नरेन्द्र मोदी ने मुख्यमंत्री रहते हुए ‘गुजरात मॉडल’ की बेहद आकर्षक और आक्रामक ब्रांडिंग कराई थी। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ जैसे आयोजनों के माध्यम से उन्होंने गुजरात को उद्योग, व्यापार और पूंजी निवेश के लिए भारत का स्वर्ग बना दिया। इस मजबूत आर्थिक परसेप्शन के कारण ही राष्ट्रीय स्तर पर लोगों ने उनकी प्रशासनिक सीमाओं और 2002 की कमियों को नजरअंदाज कर दिया और उन्हें एक आधुनिक, विकासोन्मुख प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार किया।
योगी का प्रगतिशील कार्य और परसेप्शन की नाकामी
योगी आदित्यनाथ को उत्तर प्रदेश एक ‘बीमारू प्रदेश’ के रूप में विरासत में मिला था, जिसकी छवि कानून-व्यवस्था और विकास के मामले में बेहद खराब थी। एक सन्यासी होते हुए भी—जिन्हें आम तौर पर रूढ़िवादी और जड़ माना जाता है—योगी ने उत्तर प्रदेश के कायाकल्प के लिए एक गजब की प्रगतिवादी और आधुनिक दृष्टि का परिचय दिया। एक्सप्रेसवे का जाल बिछाने से लेकर, डिफेंस कॉरिडोर, नए एयरपोर्ट्स और ‘ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट’ के जरिए उद्योगों और व्यापार के लिए अनुकूल माहौल बनाने में उन्होंने अभूतपूर्व प्रगति की।
उन्होंने क्रोनी कैपिटलिज्म से खुद को दूर रखने का प्रयास किया। उद्योग और निवेश को बढ़ावा देते हुए भी उन्होंने खुद को भ्रष्टाचार या किसी बड़े उद्योगपति के साथ बेईमानी के गठजोड़ की लपेट से पूरी तरह बचाए रखा। परंतु, राजनीति का क्रूर यथार्थ यह है कि आपकी यह ‘नेक नियती’ तब तक काम की चीज नहीं मानी जाती जब तक आप उसकी सही ब्रांडिंग न कर सकें।
कॉर्पोरेट जगत के बड़े नेता और बड़े औद्योगिक घराने किसी भी राजनेता की हवा बनाने और राष्ट्रीय स्तर पर उसका नैरेटिव सेट करने में बहुत कारगर होते हैं। मोदी इस बात को बखूबी जानते हैं और उन्होंने इसका भरपूर राजनीतिक फायदा उठाया है। इसके विपरीत, योगी आदित्यनाथ गुजरात मॉडल की तरह अपने ‘यू.पी. मॉडल’ का कोई राष्ट्रीय स्तर का परसेप्शन (धारणा) खड़ा नहीं कर पाए। उद्योगों के आने के बावजूद, देश में यू.पी. की छवि ‘विकास के हब’ से ज्यादा ‘बुलडोजर राज्य’ के रूप में ही सीमित रह गई। यह उनकी आर्थिक ब्रांडिंग की एक बड़ी नाकामी है।
सांगठनिक सिपहसालार की कमी: अमित शाह बनाम योगी का एकाकीपन
नरेन्द्र मोदी की राष्ट्रीय और प्रांतीय सफलता का एक बहुत बड़ा रहस्य उनके पीछे खड़े एक मजबूत और वफादार सांगठनिक सिपहसालार का होना है।
नरेन्द्र मोदी के पास अमित शाह जैसा एक अत्यंत मुफीद, कुशल और वफादार साथी शुरुआत से ही मौजूद रहा। मोदी ने संगठन और सत्ता के हर उस ‘स्याह-सफेद’ काम (जिसमें रणनीतिक चातुर्य, वित्तीय प्रबंधन और विरोधियों को पछाड़ना शामिल है) को अमित शाह के भरोसे छोड़ दिया। अमित शाह का उद्योग और व्यापार जगत से पुराना नाता था, जिसने मोदी को देश के सबसे बड़े कॉरपोरेट घरानों का समर्थन और वित्तीय शक्ति दिलाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। शाह ने पार्टी संगठन पर ऐसा नियंत्रण रखा कि मोदी हमेशा विवादों से ऊपर एक बेदाग और नायक की छवि में बने रहे।
योगी आदित्यनाथ का एकाकीपन
इसके विपरीत, योगी आदित्यनाथ का पूरी राजनीति में ऐसा कोई विश्वासपात्र, चतुर और सर्वमान्य साथी नहीं है। वे उत्तर प्रदेश की सत्ता में और पार्टी के भीतर पूरी तरह से अकेले संघर्ष करते नजर आते हैं। संगठन और ब्यूरोक्रेसी (नौकरशाही) दोनों को वे खुद सीधे नियंत्रित करने का प्रयास करते हैं, जिससे उनके खिलाफ पार्टी के भीतर ही एक बड़ा असंतोष (जैसे उपमुख्यमंत्री केशव मौर्य और अन्य मंत्रियों के साथ गाहे-बगाहे होने वाला टकराव) सतह पर आ जाता है। अमित शाह जैसे किसी संकटमोचक और वित्तीय रणनीतिकार के अभाव में योगी को कॉरपोरेट जगत का वह अंधा समर्थन भी हासिल नहीं हो पाता जो किसी नेता को राष्ट्रीय फलक पर स्थापित करने के लिए आवश्यक होता है।
क्या मोदी के बाद के शून्य को भर पाएंगे योगी?
नरेन्द्र मोदी के बाद भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री पद की दौड़ में जो कुछ गिने-चुने नाम सबसे आगे चल रहे हैं, उनमें योगी आदित्यनाथ का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है। उनकी कट्टर हिंदुत्ववादी छवि, बेदाग चरित्र और आक्रामक प्रशासनिक शैली उन्हें बहुसंख्यक समाज के एक बड़े हिस्से का स्वाभाविक प्रिय पात्र बनाती है।
बहरहाल, यक्ष प्रश्न यह है कि क्या योगी आदित्यनाथ प्रधानमंत्री पद पाने की इस दौड़ में अपनी इन तमाम बाधाओं से उबर पाएंगे?
योगी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी छवि को एक ‘क्षेत्रीय जातिवादी नेता (ठाकुरों के रक्षक)’ से ऊपर उठाकर एक ‘सर्वमान्य हिंदू पुरोधा’ और ‘विकास पुरुष’ के रूप में पुनर्गठित करने की है। उन्हें समझना होगा कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ की गलियों की सामाजिक इंजीनियरिंग से होकर गुजरता है। जब तक वे उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों, दलितों और पिछड़ों के भीतर अपनी नीतियों के प्रति विश्वास और आत्मीयता का भाव पैदा नहीं कर लेते, और जब तक वे आर्थिक मोर्चे पर ‘यू.पी. मॉडल’ की एक आकर्षक ब्रांडिंग के जरिए राष्ट्रीय परसेप्शन नहीं बदल लेते, तब तक मोदी जैसी निर्विवाद राष्ट्रीय स्वीकार्यता पाना उनके लिए एक अधूरा सपना ही रहेगा।
राजनीतिक चातुर्य की कमी, सांगठनिक एकाकीपन और सजातीय मोह के जो ग्रहण उनकी ग्रोथ पर लगे हैं, यदि योगी समय रहते उनसे उबरने में कामयाब होते हैं, तभी वे मोदी के बाद पैदा होने वाले राजनीतिक शून्य को भरने के वास्तविक हकदार बन सकेंगे। अन्यथा, इतिहास गवाह है कि केवल आक्रामक समर्थकों की फौज और सोशल मीडिया का आभामंडल किसी भी नेता को सत्ता के अंतिम शिखर तक पहुँचाने के लिए नाकाफी साबित होता है।







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