11orai10रामपुरा-उरई। आधे-अधूरे अस्पताल को हैंड ओवर करने की सजा दस्यु समस्या से ग्रस्त रहे इस पिछड़े क्षेत्र के मरीजों को भुगतनी पड़ रही है। लेकिन जिम्मेदार इस ओर गौर नही कर रहे हैं।
सर्वाधिक जच्चा-बच्चा मौत और संक्रामक बीमारियों के लिए देश भर में कुख्यात रामपुरा क्षेत्र में कारगर स्वास्थ्य और उपचार सेवाओं को प्रदान करना केंद्र व राज्य सरकार के औपचारिक एजेंडे में सबसे ऊपर शामिल किया गया था। जिसकी वजह से एनआरएचएम के जरिए यहां के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का दर्जा बढ़ाकर सीएचसी बनाने की कवायद की गई। लेकिन इसके निर्माण की जिम्मेदारी ऐसी कार्यदायी संस्था को दे दी गई जो कि डिफाल्टर में शामिल थी। इस कार्यदायी संस्था ने न तो कार्य समय पर पूरा किया और न ही गुणवत्ता का ख्याल रखा। अनियमितता के कारण उक्त कार्यदायी संस्था के ब्लैक लिस्टिड हो जाने से कार्य बीच में ही बंद कर दिया गया।
बाद में संस्था के अधिकारियों और शासन के जिम्मेदारों के बीच सैटिंग हो गई जिससे उसे फिर निर्माण शुरू करने की हरी झंडी मिल गई। पेमेंट निकालने के लिए ठेकेदार ने इस प्रक्रिया में थोड़ा बहुत काम कराया। लेकिन काफी काम अधूरा पड़ा था इसके बावजूद अधिकारियों को कमीशन दे दिवाकर हड़बड़ी में इसे हैंड ओवर करा दिया गया। हालत यह है कि 35 बैड का अस्पताल होने के बावजूद इसमें इमरजेंसी की सुविधा नही है। कई बार अस्पताल में ताला ही लटका रहता है जिसके कारण मरीजों को माधौगढ़ या जालौन भागना पड़ता है। निनावली रोड पर बीहड़ के सुनसान क्षेत्र में सीएचसी बनवा दी जाने का नतीजा है कि रात में मरीज अस्पताल जाने से डरते हैं। उधर इस सीएचसी के अंतर्गत तीन गांवों में न्यू पीएचसी स्थापित है जो डाॅक्टरों की तैनाती न होने की वजह से सफेद हाथी बनी हुई हैं। उधर जगम्मनपुर की न्यू पीएचसी में एक महीने में 100-150 तक डिलेवरी केस होते हैं लेकिन यहां बिजली, पंखे, पानी जैसी मूलभूत सुविधाएं भी नही हैं।

Leave a Reply