12orai02कोंच-उरई। कस्बे के मोहल्ला गोखलेनगर स्थित पीपलेश्वर महादेव मंदिर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह ज्ञान यज्ञ के तीसरे दिवस की कथा में कथा प्रवक्ता संत गिरि उमेशदत्त शांडिल्य ने कहा कि व्यक्ति को अपना कर्तव्य तब तक करते रहना चाहिये जब तक कि मन शांत न हो जाये। उन्होंने कहा कि भगवान वेदव्यास ने जब चारों वेदों की रचना कर दी और पंचम वेद महाभारत की भी रचना करने के बाद भी उनका अशांत ही रहा। इसके बाद उन्होंने पुराणों की रचना का क्रम प्रारंभ किया और सत्रह पुराण लिखने के बाद भी जब मन में अशांति का वास रहा तो वे विचलित हो उठे। उसी समय देवर्षि नारद का वहां अभ्युदय हुआ और उन्होंने व्यासजी से मुख पर छाई अशांति का कारण जानना चाहा तो उन्होंने अपने मनोभाव उन्हें बताये। तब नारद ने उन्हें श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना करने का परामर्श दिया और उनके कहे अनुसार श्रीमद्भागवत की रचना करने के उपरांत व्यासजी को परम शांति का अनुभव हुआ।
कथा व्यास ने अपना मंतव्य स्पष्ट करते हुये कहा कि जिसने इस नश्वर जगत में शरीर धारण किया है उसे जीवन भर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करना पड़ता है किंतु उसके अंदर संतुष्टि का भाव जागृत नहीं होता है। संतुष्टि और परमानंद की प्राप्ति का एक मात्र आश्रय भगवद् शरणागति ही है। कथा प्रवाह को गति प्रदान करते हुये कथा व्यास कहते हैं कि वे नासमझ हैं जो तर्क वितर्क के द्वारा ईश्वर और उसके अस्त्वि पर सवाल करते हैं, ईश्वर परीक्षा का नहीं बल्कि प्रतीक्षा का विषय है। अपने कथन को पुष्ट करने के लिये उन्होंने माता सती की कथा सुनाई जिसमें सीता अन्बेषण के लिये वन वन भटक रहे प्रभु राम के ईश्वर होने पर उन्हें संदेह जागा और उन्होंने भोलेनाथ से उनकी परीक्षा लेने का आग्रह किया। भोले नाथ ने माता सती को समझाने की काफी चेष्टा की लेकिन वे नहीं मानीं और सीता का वेश धारण कर प्रभु राम के सम्मुख पहुंच गईं। राम ने उन्हें माता का संबोधन देकर जब प्रणाम किया और अपने आराध्य भगवान शंकर के बारे में पूछा तो सतीजी को अपनी भूल स्वीकारनी पड़ी। सतीजी के ही माध्यम से कथा व्यास ने यह भी कहा कि जहां मान सम्मान न हो और औपचारिक रूप से बुलाया न जाये वहां बिल्कुल नहीं जाना चाहिये क्योंकि इसके परिणाम बहुत ही भयंकर भी हो सकते हैं। जिस तरह से दक्ष प्रजापति द्वारा किये गये यज्ञ में भगवान आशुतोष को नहीं बुलाया गया था लेकिन शिव पत्नी सती अपने पति द्वारा रोके जाने के बाद भी पिता के यज्ञ में गईं और उन्हें अपने प्राणों का उत्सर्ग करना पड़ा।

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