12orai04 12orai05उरई। एक दशक पहले बने यहां के राजकीय मेडिकल काॅलेज का अभी तक पुरसाहाल नही है। राजकीय मेडिकल काॅलेज का नाम भर ही भारी भरकम है लेकिन संसाधनों के अभाव में इसकी सार्थकता गांव की डिस्पेंसरी से भी कमतर नजर आती है। इसी कारण मेडिकल काॅलेज से जिले में बेहतर उपचार सुविधाओं की उम्मीद पालने वाले जनमानस में गहरी निराशा और ठगे जाने की अनुभूति छायी हुई है।
205 एकड़ क्षेत्रफल में बने मेडिकल काॅलेज के निर्माण पर अरबों रुपये का बजट खर्च किया गया है। 2006 में मुलायम सिंह यादव ने प्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से उरई में जब मेडिकल काॅलेज के निर्माण का एलान किया था। उस समय लोगों के सपने मे भी यह उम्मीद नही थी कि जिले में एक-दो दशक में कोई सरकार इसका वरदान दे सकती है। इसीलिए लोग अचरज और खुशी में झूम उठे थे। लेकिन अगले वर्ष ही प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हो गया तो मडिकल काॅलेज की स्थापना को भी ग्रहण लग गया। परवर्ती मायावती सरकार ने भले ही घोषणा को रदद न किया हो। लेकिन उन्होंने इसके निर्माण को लो-प्रोफाइल में धकेल दिया। वैसे तो इस मेडिकल काॅलेज की ओपीडी का शुभारंभ सन् 2009 में ही झांसी मण्डल के तत्कालीन कमिश्नर ने कर दिया था। लेकिन यह केवल दिखावे की कार्रवाई थी। इसलिए लंबे समय तक मेडिकल काॅलेज में इलाज शुरू नही हो पाया। सन् 2012 में जब प्रदेश में एक बार फिर सत्ता परिवर्तन हुआ और समाजवादी पार्टी के हाथ दोबारा सरकार की बागडोर आ गई तो मेडिकल काॅलेज का निर्माण युद्ध स्तर पर पूरा करा दिया गया। यह दूसरी बात है कि इसके बावजूद यहां के मेडिकल काॅलेज के दिन सही मामले में अभी तक बहुर नही पाये हैं।
मेडिकल काॅलेज में निर्माण से लेकर मशीनों तक का तामझाम भरपूर है क्योंकि इसमें कमीशन की बंदरबांट से सरकार में बैठे लोगों से लेकर अधिकारियों तक को अपनी जेबे दोनों हाथ से गरम करने का मौका था। लेकिन उपयोगिता के लिहाज से मेडिकल काॅलेज का ठीक तरह से लाभ अभी भी यहां के लोगों को नही मिल पा रहा है।
मेडिकल काॅलेज की असलियत का पता तब चलता है जब यहां हर मरीज को बाहर से दवा लाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इस स्थिति को लेकर मेडिकल काॅलेज के प्रधानाचार्य डाॅ. सुरेश चंद्रा से जब बात की तो वे बोले कि वे क्या अपने घर से दवा लायें। सरकार दूसरे नये मडिकल काॅलेजों को तीन-तीन करोड़ रुपये का बजट दिया है। जबकि उरई के मेडिकल काॅलेज के हिस्से में दवा के नाम पर आठ माह के लिए केवल तीन लाख रुपये का बजट दिया गया है। इसमें कितने को हम दवाई दे सकते हैं। उस पर सांसद और विधायक अलग हमारे ऊपर डंडा लेकर खड़े रहते हैं। उन्होंने कहा कि जन प्रतिनिधि अगर जिले के मरीजों की भलाई वास्तव में चाहते हैं तो उन्हें हम पर दबाव बनाने की बजाय सरकार पर दबाव बनाना चाहिए तांकि मरीजों को दवा देने के लिए यथोचित बजट मिल सके। यही बात मेडिकल काॅलेज अस्पताल के सीएमएस मेजर डाॅ. रणवीर सिंह ने कही।

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