प्रशासन से ज्यादा इस स्थिति पर चिंता समाज को करने की है जरूरत
27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ceकोंच-उरई। पिछले कुछ महीनों से कस्बे में कतिपय अराजक तत्वों द्वारा सांम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने की जो कोशिशें की गई हैं उन्होंने प्रशासन के माथे पर चिंता की लकीरें उभार दी हैं। इस स्थिति से निपटने के लिये प्रशासन जल्दी ही कस्बे के भले लोगों के साथ बैठक करके इस पर विमर्श करने और स्थितियां काबू में रखने की दिशा में आगे बढ रहा है। हालांकि अगर देखा और सोचा जाये तो प्रशासन से ज्यादा इस विषय पर चिंता समाज को करने की जरूरत है क्योंकि वह सामाजिक तानाबाना दरक रहा है जिसने मैं और तुम के बजाय हम की सोच पैदा की।
आजकल सोशल मीडिया पर जमकर विष वमन हो रहा है और खासतौर पर धार्मिक उन्माद फैला कर सामाजिक तानेबाने को तितर बितर करने की जो साजिशें की जा रहीं हैं उनका असर यहां पिछले कुछ महीनों के दौरान घटी घटनाओं में साफतौर पर दिखाई देता है। गुजरे साल 5 सितंबर 2015 में ठीक जन्माष्टमी के दिन यहां एक समुदाय विशेष की धार्मिक आस्था पर चोट करने बाला मैसेज वायरल हुआ था। यहां तक तो ठीक था क्योंकि आजकल सोशल मीडिया पर दिन में कम से कम बीस फीसदी मैसेज ऐसे ही भड़काऊ होते हैं जिन पर कान दिये बगैर समझदार लोग उन्हें नजरंदाज कर जाते हैं, लेकिन उस दिन समुदाय विशेष के लोगों ने उक्त मैसेज के जेरोक्स निकलवा कर अपने समुदाय को उकसाया और हजारों की भीड़ एकत्रित कर गुंडई और अराजकता का नंगा नाच किया, दूसरे समुदाय की दुकानें लूट लीं गईं और प्रशासन के हाथों के तोते उड़े रहे रहे। ढाई सैकड़ा लोगों के खिलाफ डकैती की धाराओं में मुकदमा भी कायम हुआ लेकिन अराजक तत्वों के खिलाफ पुलिस या प्रशासन कार्यवाही करने में कतराते रहे। इसी प्रशासनिक ढीलपोल का फायदा उठा कर गुजरी 5 मार्च को भी उसी तरह की पुनरावृत्ति की गई, फर्क सिर्फ इतना था कि अबकी दफा दूसरे समुदाय की भावना आहत करने वाला कृत्य हुआ और लोकदेवता हरदौल की मूर्ति तोड़ दी गई जिसको लेकर उक्त समुदाय के हजारों लोगों ने सड़कों पर आकर अपना विरोध प्रकट किया और पुलिस तथा प्रशासन के सामने मुश्किलें खड़ी की गईं। इसके अलावा भी गाहे-ब-गाहे छिटपुट घटनायें होना अब आम सा हो गया है जिनमें सांम्प्रदायिक सौहार्द प्रभावित होता साफ दिखाई देता है, लेकिन इन दो बड़ी घटनाओं ने प्रशासन को अंदर तक हिला कर रख दिया है और बिगड़ते सौहार्द को लेकर उनकी चिंता स्वाभाविक है।
वैसे, देखा जाये तो यह पुलिस और प्रशासन के लिये कम स्थानीय समाज के लिये ज्यादा चिंता का बिषय है। यहां के बुजुर्ग जिन्होंने गंगा जमुनी संस्कृति के लिये अपने बच्चों में अच्छे संस्कार डाले और यह तहजीब जिंदा रखी लेकिन नई पीढ़ी शायद अब बुजुर्गों की या सुन नहीं रही है या बुजुर्गों ने उन्हें सुनाना छोड़ दिया है जिसका नतीजा सामने है और एक दूसरे का भरोसा भी कहीं न कहीं दरकता सा दिखाई देने लगा है। यहां गौरतलब यह है कि जब भी कोतवाली या इसके इतर भी शांति और सद्भाव को लेकर बैठकें होती हैं तो कोंच के सांम्प्रदायिक सौहार्द की मिसालें दी जानी शुरू हो जाती हैं जबकि हकीकत इससे जुदा है और यह बातें अब कापी किताबों में सिमट कर रह गई हैं। पुलिस और प्रशासन भी इस बात को अच्छे से समझ रहे हैं और दोनों समुदायों के बीच बढती इस खाई को पाटने की दिशा में वह कुछ ठोस करने के हामी हैं। अधिकारियों की अगर मानें तो जल्दी ही दोनों समुदायों के साथ अधिकारी बैठक करके परस्पर विश्वास बनाये रखने के तरीकों पर मंथन करने बाले हैं।

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