उरई। जालौन जिले के सबसे लोकप्रिय वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रहे बीएल यादव के आज लखनऊ में गोमती नगर स्थित उनके आवास पर देहावसान की खबर से पूरे जनपद में शोक की लहर छा गई।
बीएल यादव 1985 से 1987 तक जालौन जिले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर रहे। पब्लिक पुलिस रिलेशन के लिए बेहद संजीदा अफसर माने जाने वाले बीएल यादव ने जनपद के पुलिस कप्तान रहते हुए चार सौ गांवों में सुरक्षा समितियां गठित कराई थीं जो कि कम्युनिटी पुलिसिंग के लिहाज से जनपद का ही नही पूरे प्रदेश और देश का अभी तक का सबसे बड़ा नेटवर्क कहा जायेगा। उनके कार्यकाल में इंदिरा स्टेडियम में क्रिकेट का रणजी ट्राॅफी टूर्नामेंट आयोजित हुआ, जो कि जनपद में क्रिकेट का अभी तक का सबसे बड़ा आयोजन माना जा सकता है। दस्यु उन्मूलन के क्षेत्र में भी उनका अभूतपूर्व योगदान रहा। माधौगढ़ और कोटरा थाने के नये भवन, सिरसाकलार में नये थाने की स्थापना और जिला मुख्यालय पर स्थित अग्नि शमन भवन हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे।
जालौन जनपद से स्थानांतरित होने के बाद बीएल यादव सीतापुर, सहारनपुर और मेरठ जिलों में एसएसपी, आगरा और वाराणसी में डीआईजी और कानपुर जोन के आईजी जैसे पदों पर रहे लेकिन इसके बावजूद पहला जिला होने की वजह से उन्होंने जालौन जिले से परिवार की तरह अंत तक लगाव रखा। डीजी ट्रेनिंग रहते हुए उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था कि मगरौल के नजदीक पुलिस का ट्रेनिंग स्कूल जनपद में बन सका।
बीएल यादव 1993 में झांसी रेंज के डीआईजी बनकर आये तो एक बार फिर जालौन जिला उनकी देखरेख में आ गया। इस दौरान वरिष्ठ फौजदारी अधिवक्ता यज्ञदत्त त्रिपाठी के आवास पर हुए डकैती कांड में पुलिस की अभद्र भूमिका पर लगाम लगाने की उनकी कार्रवाई उनकी समूची कार्यशैली का ऐसा दृष्टांत रही कि जिले के लोग कभी उसे भुला नही सकते। कानपुर जोन के आईजी के रूप में वे प्रदेश की दस्यु उन्मूलन कमान के इंचार्ज थे। इस मुकाम पर उन्होंने एक बार फिर जालौन जिले के लिए अपना जबर्दस्त समर्पण दिखाया। इसमें निर्भय सहित जिले की जनता को त्रस्त करने वाले दस्यु सरगनाओं की व्यक्तिगत रूप से घेराबंदी का उनका योगदान उल्लेखनीय है। उन्ही की व्यूह रचना का परिणाम था कि इस जनपद के साथ-साथ समूचा पंचनद क्षेत्र आज दस्यु विहीन बन सका है।
बीएल यादव का व्यक्तित्व बहुआयामी था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से फिजिक्स में एमएससी, बीएल यादव प्रदेश के पहले डायरेक्ट ओबीसी आईपीएस थे। हालांकि उस समय मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू नही हुई थी, इसलिए अपने चयन में उन्हें आरक्षण का कोई लाभ नही मिला था। दूसरी ओर इकलौते ओबीसी आईपीएस होने के बावजूद जिले के पुलिस मुखिया की पोस्टिंग के लिए उन्हें लंबा इंतजार कराया गया। सेवा के 9 वर्ष बाद उन्हें सीधे जालौन जिले में एसएसपी के रूप में पोस्टिंग मिली लेकिन अपनी कार्यशैली में उन्होंने कभी भी किसी वर्ग को इसकी तिक्तता का अहसास नही होने दिया। उनकी गिनती समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के नजदीकी अफसरों में होती थी। लेकिन उन्होंने किसी भी दल के नेता के साथ पक्षपात नही होने दिया।
उन्हें इतिहास और संस्कृति के विभिन्न पक्षों का असाधारण ज्ञान था। साहित्य, कविता और शेर ओ शायरी में गहरी रुचि की वजह से वे जहां रहते थे महफिल सजा लेते थे। उनका आॅव्जर्वेशन सबसे अलग हटकर था। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने हिमांचल प्रदेश के धर्मशाला व चीन के सीमावर्ती इलाके का भ्रमण करके अपने पैने आॅव्जर्वेशन से ऐसे रहस्य खोज निकाले थे जिन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित करने की उनकी योजना थी और ऐसा होता तो उनकी पुस्तक अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक हलचल मचा देती। लेकिन वे जिस मिजाज के थे उसके कारण समाज को किसी विवाद के भंवर में डुबोने से उन्होंने हमेशा परहेज रखा। इसीलिए मित्रों के आग्रह के बावजूद अंत में उन्होंने उक्त पुस्तक प्रकाशित करने की अपनी योजना ड्राॅप कर दी थी।







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