उरई। खाता न बही बहनजी कहें सो सही। बसपा में शायद अराजकता का ऐसा ही आलम है। पार्टी ने आज ऐसे आदमी की बर्खास्तगी की विज्ञप्ति जारी कर दी जो सरकारी कर्मचारी होने के कारण किसी राजनैतिक पार्टी में पदाधिकारी होना तो दूर सदस्य तक नहीं हो सकता।
चुनाव के पहले बसपा में हमेशा अजीबोगरीब उठापटक मचती है। इस समय भी ऐसा हो रहा है तो इसमें कोई विचित्र बात नहीं है। अचरज है तो इस बात का कि बसपा में कौन सदस्य है कौन पदाधिकारी। इसका कोई लेखा जोखा नहीं होता। इसी चक्कर में पार्टी की कई बार फजीहत हो चुकी है।
शनिवार से बसपा में उठापटक चल रही है। जिसके तहत 7 अप्रैल को ही उच्च सदन के मनोनीत सदस्य तिलक चन्द्र अहिरवार को रिटायर किया गया था लेकिन अर्श से फर्श पर आने का उनका चक्र शायद इतने से पूरा नहीं हो पाया। इसलिये पार्टी ने दो दिन बाद उन्हें बुन्देलखण्ड जोन के प्रभारी पद से हटा दिया। इतना ही नहीं उनके खासमखास और पार्टी के पूर्व जिलाध्यक्ष मानसिंह पाल को तो बेआबरू करके दल के बाहर ही कर डाला। इसी क्रम में रविवार को लोक निर्माण विभाग के कर्मचारी रामऔतार राजपूत को पार्टी से निष्कासित करने की विज्ञप्ति जिलाध्यक्ष शैलेन्द्र शिरोमणि के हस्ताक्षरों से जारी करा दी गयी जबकि रामऔतार राजपूत पार्टी के सदस्य हो ही नहीं सकते। माली हैसियत में बुन्देलखण्ड की हस्तियों में गिने जाने वाले रामऔतार राजपूत की पत्नी मोतीबाई को बसपा ने जिला पंचायत चुनाव में समर्थन जरूर दिया था जिसे लेकर तरह-तरह की चर्चायें मायावती के कानों तक पहुंचीं। इसलिये उनसे दामन छुड़ाने का निर्देश भेज दिया गया। यह दूसरी बात है कि फरमान के अमल के बतौर निष्कासित मोतीबाई को किया जाना था लेकिन लेटर रामऔतार राजपूत के नाम का जारी हुआ। जिससे पार्टी जगहंसाई का कारण बन गयी है।







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