10orai03जालौन-उरई। प्रचण्ड गर्मी में भी तालाब न भरे जाने से मवेशियों के लिए जानलेवा स्थितियां बनी हुई हैं। प्रशासन का ग्राम पंचायत सचिवों व प्रधानों पर अंकुश नही है जिसके कारण उनके कागजी आदेश अमल में नही लाये जा रहे।
उदाहरण ग्राम कुवरपुरा के तालाब का है, जिसमें धूल उड़ रही है। ग्रामीणों का कहना है कि अधिकारी चाहें तो 24 घंटे के अंदर तालाब भरा जा सकता है। लेकिन वे बैठकों में फरमान जारी करके अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति पा लेतें हैं। इसलिए उन्हें अपने आदेशों की नाफरमानी की मालूमात नही हो पा रही।
सूखा पड़ा तालाब बच्चों के लिए क्रिकेट का मैदान बन चुका है। अगर गांव में आग लग जाये तो तालाब भरा न होने से आग पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जायेगा। तालाब भरा रहता तो भूमिगत् जल स्तर बरकरार रहने से हैंडपंपों के ठप्प होने का सिलसिला भी नही बढ़ता। विडंबना यह है कि तालाब के किनारे निजी नलकूंप हैं और अगर प्रशासनिक अमले में इच्छा शक्ति होती तो इस नलकूंप से चुटकियों में तालाब भर जाता। पानी की कमी के कारण गांव के लोगों ने अपने दुधारू मवेशी औने-पौने में बेंच दिये हैं जबकि सरकार और प्रशासन पशु पालन बढ़ाने के नाम पर की जाने वाली गोष्ठियों में लाखों रुपये फूंकने से नही चूंकते।

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