कोंच-उरई। कुओं के जीर्णोद्धार पर मायावती सरकार के समय से जिले में लाखों रुपये का बजट फाइलों पर हर वर्ष खर्च हो रहा है लेकिन दूसरी ओर हालत यह है कि रखरखाव के अभाव में जल संपदा को संजोये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले कुएं तेजी से गायब होते जा रहे हैं।
कस्बे के समीप स्थित चचेड़ा गांव का वनजारों के जमाने का कुआ इस हकीकत की गवाही के रूप में दिखाया जा सकता है। सैकड़ों वर्ष पुराने इस कुएं से ही चचेड़ा गांव के लोग डेढ़ दशक पूर्व तक अपनी दैनंदनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे। इसके बाद हैंडपंप आ गये। जिन्होंने लोगों को सुविधाभोगी बना दिया। नतीजतन कुएं समाज की उपेक्षा की भेंट चढ़ने लगे। सूखे के समय इस चूक के अभिशाप उजागर हुए क्योंकि हैंडपंप पाताल को खाली भर करते हैं। लेकिन पाताल भरने में उनका कोई योगदान नही है। दूसरी ओर कुएं हैं जो कि पाताल को भरे रहते हैं जिससे जल स्तर बरकरार रहता है।
इसीलिए 2007 के सूखे के बाद कुओं की सुध सरकार और प्रशासन को आई लेकिन अगले वर्ष बारिश शुरू होने के बाद यह काम सरकारी बजट हड़पने का एक बड़ा जरिया बन गया। बिहार में लालू यादव का राजनैतिक कैरियर चारा घोटाले में चैपट हो गया लेकिन उत्तर प्रदेश में न जाने कितने स्रोत हैं जिनके परनाले से जनता की मेहनत की कमाई से इकटठा होने वाला सरकारी खजाना बाहर निकला जा रहा है। जिनमें से एक कुआ सफाई की मद भी है।
चचेड़ा के कुआ में पूरी तरह पुराव हो चुका है और झाड़-झंखाड उगा दिखाई देता है। तहसील मुख्यालय के नजदीक के कुएं की यह स्थिति चिराग तले अंधेरे की कहावत को चरितार्थ करती है। हो सकता है कि कागजों में इस कुएं का भी जीर्णोद्धार हो चुका हो। यह तहसील मुख्यालय के अधिकारियों के लिए और भी शर्म की बात होगी। जिलाधिकारी संदीप कौर बार-बार कह रहीं है कि पंचायतें राज्य वित्त आयोग की पहली किस्त का पूरा उपयोग जल निकायों को बचाने में करें। लेकिन उनकी यह भावना केवल प्रवचन की शोभा है या वे यह भी देखती हैं कि उनके निर्देश के मुताबिक जमीनी काम हो रहा है कि नही। इस बात की कसौटी चचेड़ा का कुआ बनेगा। अगर इस कुएं के जीर्णोद्धार की सरगर्मी धरातल पर सामने आई तो यह पूरे प्रशासन के लिए उनके बारे में यह संदेश फैलाने वाला होगा कि वे जो कहती हैं उसे करना जरूरी है अन्यथा संबंधित अधिकारी का नुकसान हो सकता है।







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