0 हकीकत की जिंदगी में उनको कोई पूंछने वाला नही
cropped-27c0e33e-70ae-40cd-b9cb-6e01381eb0ce11.pngउरई। खेलों के मामले में देश की दुर्दशा के कारणों की तह में जाने पर इसके असली कसूरवार जिम्मेदार लोग ही ठहराये जा सकते हैं। मंचो और कागजों में नवोदित खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने का चाहे जितना दम भरा जाता हो लेकिन हकीकत में इनकी सुध लेने वाला कोई नही है। भ्रष्टाचार और उपेक्षा का ही नतीजा है कि देश में दूर दराज की अधिकांश खेल प्रतिभाएं अपने चरमोत्कर्ष पर पहुंचने के बहुत पहले भ्रूण अवस्था में ही दम तोड़ जाती हैं।
बीहड़ी ब्लाॅक रामपुरा के महूटा गांव मे एथलीट जगत के उदीयमान सितारे को प्रोत्साहन के अभाव में जिस तरह अपना मनोबल तोड़ना पड़ रहा है। उससे राष्ट्रीय गौरव बनने का माद्दा रखने वालों खिलाड़ियों की दुुर्दशा का पता चलता है। महूटा के विपिन द्विवेदी ने पिछले वर्ष नई दिल्ली में आयोजित एनसीसी नेशनल गेम में रिले दौड़ में कांस्य पदक हासिल कर सारे जिले को चैंका दिया था। आयोजन में मौजूद सेना के अफसरों ने पेशेवर दौड़ में महत्वपूर्ण मुकाम बनाने पर उसे अच्छी नौकरी देने का वायदा किया लेकिन जिले में उसे कोई मजबूत कद्रदान नही मिला। विपिन के पिता साधारण कृषक हैं। सीमित आय की वजह से वे विपिन की तरक्की के लिए कुछ खास नही कर सकते। हाईस्कूल 70 प्रतिशत अंकों से पास करने और एनसीसी नेशनल गेम्स में ऊंचा परचम लहराने के बावजूद आर्थिक बाधा की वजह से विपिन रामपुरा में ही पढ़ाई जारी रखने को बाध्य है। जबकि ऐसी प्रतिभाओं के लिए रामपुरा बदनसीब जगह में शुमार क्षेत्र माना जाता है।
विपिन के सर्टिफिकेट देखकर पूर्व जिलाधिकारी रामगणेश ने उसकी पीठ थपथपाई थी और उसे आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मदद का आश्वासन दिया था। लेकिन उनके जाने के बाद उसे इंदिरा स्टेडियम में प्रैक्टिस के लिए घुसने का मौका देना भी क्रीड़ा विभाग को गंवारा नही है। विपिन इस बर्ताव से हतोत्साहित है लेकिन इसके बावजूद उसने अभी उम्मीदों का दामन नही छोड़ा है। वह प्रतिदिन सुबह-शाम पूरी लगन के साथ दौड़ लगाने की प्रैक्टिस कर रहा है। उसकी महत्वाकांक्षा ओलम्पिक जाने वाली भारतीय टीम में जगह बनाने की है। देखो उसकी मदद के लिए कोई कद्रदान मिल पाता है या नही।

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