उरई। जिले के पाल समाज को दलित आरक्षण दिलाने के लिए पूर्व कैबिनेट मंत्री श्रीराम पाल ने सोमवार को सजातीयों की ऐतिहासिक रैली महाकवि कालीदास विद्यालय से कलैक्ट्रेट तक निकाली। रैली में जनसैलाब देखकर उन्हें चुका हुआ नेता घोषित करने की साजिश रचने वालों के चेहरे फक्क हो गये। बाद में मुख्यमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन देने के लिए कलैक्ट्रेट में उस समय रस्साकशी की स्थिति बन गई जब डीएम के मौजूद न होने की वजह से श्रीराम पाल ने किसी और को ज्ञापन देने से मना कर दिया। डीएम को ही बुलाने की जिद पर अड़े श्रीराम पाल को मनाने में अधिकारियों को पसीना छूट गया।
श्रीराम पाल राजनैतिक दृष्टिकोण से महत्वहीन समझी जाने वाली पाल बिरादरी के 1991 में पहली बार एमएलए चुने गये नेता थे। इसके बाद वे सपा-बसपा और भाजपा-बसपा सरकारों में महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। उनके कारण पाल समाज की धाक राजनीति में जमी। जिसकी वजह से वे न केवल बुंदेलखंड बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश में संख्या बल में अच्छी खासी पाल बिरादरी के सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित हुए। वर्तमान में वे सपा में शामिल हैं लेकिन सपा नेतृत्व की कद्रदानी में कमी के कारण हाशिए पर पड़े हैं जबकि सपा का अगले चुनाव में फिर सत्ता में आने का सारा खेल अति पिछड़ी जातियों को बसपा की ओर जाने से रोककर अपने साथ जोड़ने पर निर्भर कर रहा है। षणयंत्रकारियों की कानाफूसी के चलते पालों पर कमंद फेकने के लिए सपा नेतृत्व श्रीराम पाल को भुलाकर पहचान विहीन नेताओं पर दांव लगाने में मेहनत बर्बाद कर रहा है। लेकिन आज की जिले के पाल समाज को धनगर अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र का अधिकारी बनाने के नाम पर उनके द्वारा जुटाई गई भीड़ सपा नेतृत्व की गलतफहमी को दूर करने वाली साबित हो सकती है। वैसे तो रैली की अगुवाई के लिए अखिल भारतीय धनगर महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी धनगर को श्रीराम पाल ने आमंत्रित किया था। लेकिन हर किसी ने इस रैली को श्रीराम पाल के वनमैन शो के रूप में देखा। इंटैलीजेंस एजेंसियों के जरिए श्रीराम पाल की आज भी बरकरार जबर्दस्त स्वीकार्यता की रिपोर्ट मुख्यमंत्री की टेबिल तक पहुंच गई है। अनुमान किया जा रहा है कि इस रैली की वजह से आने वाले दिनों में पूरे बुंदेलखंड में पाल समाज को श्रीराम पाल के जरिए लुभाने की रणनीति सपा नेतृत्व द्वारा उन्हें बड़ी जिम्मेदारी सौंपकर अपनाई जा सकती है।







Leave a Reply