महेबा-उरई। मिडडे मील के लिए ग्रीष्मावकाश में विद्यालय खोलने का फरमान शिक्षकों को रास नही आ रहा। उनके भारी विरोध की वजह से सरकार और प्रशासन भी इसके लिए आधे-अधूरे मन से ही कार्य कर रहा है। इसका खामियाजा भुखमरी के कगार पर खड़े बच्चों को भोगना पड़ रहा है।
विकराल सूखे के कारण माहौल बेहद दारुण है। रोज कमाने खाने वाले लोगों के यहां फाकाकशी की नौबत देखी जा रही है। यहां तक कि बच्चों को भी भूखों सोना पड़ रहा है। सरकार ने इसको देखते हुए ग्रीष्मावकाश में भी स्कूल खोलकर मिडडे मील बनवाने के निर्देश प्रधानाध्यापकों को दिये थे। बच्चों के साथ-साथ अगर कोई बड़े भी खाने को मोहताज हो तो मिडडे मील में उसके पेट भरने की भी उम्मीद संजोई गई थी। अंदाजा यह था कि मानवीयता के तकाजे को देखते हुए अध्यापक इसमें संवेदनशीलता का परिचय देंगे और स्वेच्छा से मिडडे मील बनाने के दायित्व का निर्वाह करेंगे। लेकिन शिक्षकों ने इस फरमान के खिलाफ बगावत कर दी। चुनावी वर्ष होने की वजह से सरकार भी अनुशासन की तलवार किसी में चलाने में नाकाम है। जिसके कारण मिडडे मील अधिकांश गांवों में ठप्प देखा जा रहा है। दमरास गांव इसकी मिसाल है। इस गांव में न तो प्राथमिक विद्यालय में और न ही कन्या पूर्व माध्यमिक विद्यालय में शिक्षकों के अघोषित असहयोग आंदोलन की वजह से मिडडे मील बन पा रहा है। प्राथमिक विद्यालय के सामने तो कई दिन से विद्यालय न खुलने की वजह से गंदगी का भारी अंबार लग गया है। इसका दालान मवेशियों की आरामगाह है। जिसके चलते गंदगी की बदबू असहनीय हो गई है।
मिडडे मील बनवाने की कटिबद्धता अगर सरकार और प्रशासन में होती तो मोटी तनख्वाह पर मौज छानने वाले खंड शिक्षाधिकारियों की नकेल स्कूलों का लगातार निरीक्षण करते रहकर यह व्यवस्था सुनिश्चित करने के लिए कसी जाती। लेकिन सारे खंड शिक्षाधिकारी साहिबान गर्मी के कहर से बचने के लिए दिन भर अपने घरों में एसी में दुबके रहते हैं। जिससे शिक्षक छुटटा हैं। जियो और जीने दो का मजाक बना सिद्धांत इस मामले में अमल में दिखाई दे रहा है। जबकि डिप्टी साहब कह रहे हैं कि हम भी बिना कुछ किये पगार लेंगे और गुरुजनों आप भी इसी तरह से बिना कुछ किये धरे तनख्वाह उठाने के लिए हमारी तरफ से आजाद हो।







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