उरई। स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम हो चुके पुरखों को खोजने की धुन के साथ पूर्वांचल से आकर चंबल पचनदा के बीहड़ों मे साइकिल यात्रा पर निकले एक्टिविस्ट, पत्रकार और दस्तावेजी फिल्मों के निर्माता शाह आलम का शनिवार को उरई में पड़ाव था। उन्हें औरैया के गेंदालाल दीक्षित की दास्तांन ने इस विलक्षण धुन के लिए प्रेरित किया। गेंदालाल दीक्षित ने 1916 में आजादी के लिए देश का सबसे बड़ा क्रांतिकारी संगठन बनाया था। उनकी विरासत आज की पीढ़ी की आंखों से ओझल है।
शाह आलम ने बताया कि अपनी साइकिल यात्रा 29 मई से औरैया से शुरू की थी। औरैया के अलावा जालौन, इटावा, भिंड और धौलपुर के ग्रामीण अंचलों में जाने का रूट चार्ट उन्होंने तैयार किया है। गुमनाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की कुर्बानी की कहानियां एक बार फिर जनमानस के पटल पर लाने के साथ-साथ अपनी साइकिल यात्रा के माध्यम से वे तीन राज्यों में फैली चंबल घाटी के बीहड़ों के मौजूदा हालात से देश-दुनियां को यहां के लोगों के सुख-दुख को समझकर रूबरू कराने का इरादा ठाने हुए हैं।
शाह आलम का कहना है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान तक फैले विशाल बीहड़ांचल को आजादी से पहले और बाद में डाकुओं की शरण स्थली के रूप में जाना जाता रहा है। प्रकृति की मार, डाकुओं की ललकार और सरकार की दुत्कार बीहड़ की नियति बन कर रह गई है। बीहड़ों का विकास आजादी के बाद भी चुनौती बना हुआ है। आज की दुनियां काफी तेजी से बदल रही है, लेकिन ऐसे किसी बदलाव की बयार बीहड़ों में नही बह पा रही है।
उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के इस क्षेत्र के लड़ाकू पुरखों की स्मृतियों को उन्होंने इसलिए अवलंब बनाया क्योंकि कोई कौम और क्षेत्र आत्म गौरव की अनुभूति के बिना विकास के लिए अग्रसर नही हो सकता। इस इलाके के महान स्वतंत्रता सेनानियों का किरदार उनके वशंजों में यह अनुभूति जगायेगा।
उन्होंने कहा कि अपनी साइकिल यात्रा के पड़ाव स्थलों के लोगों से उनकी गुजारिश है कि वे बीहड़ की कठिन जिंदगी का अनुभव बताकर जंगे आजादी के स्मारक और निशान दिखाकर और आजादी से जुड़े प्रमुख स्थानों की फोटो, वीडियों को आम जन तक पहुंचाने के लिए विभिन्न माध्यम् सुलभ कराकर वे उनकी मदद करें तांकि उनका मिशन कामयाब हो सके। शाह आलम ने बताया कि आज जालौन जिले में यात्रा का उनका दूसरा दिन है। शुक्रवार को उन्होंने रामपुरा से माधौगढ़ तक गांवों में भ्रमण करते हुए लोगों से बात की। उन्होंने पाया कि स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के लिए इस इलाकें में अभी भी लोगों में जबर्दस्त लगाव और श्रद्धा है। लोगों ने कहा कि उनका कृतित्व शोषण, उत्पीड़न करने वाली नौकरशाही, नवसामंतों और मगरूर राजनेताओं के खिलाफ प्रतिरोध की असीम शक्ति उन्हें प्राप्त कराता है। लोगों ने उनकी यात्रा को बहुत ही उत्साह के साथ समर्थन दिया।







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