डाॅ. राकेश द्विवेदी
anuragi Shishu Pal yadavउरई। घनश्याम अनुरागी घनश्याम अनुरागी की रणनीतियों को चारों खाने चित्त कर पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष शिशुपाल ने सुमन निरंजन को अध्यक्ष बनवाकर अपना खोया हुआ रुतबा फिर से हासिल कर लिया है। अब वह हासिये से उठकर जिला पंचायत की मुख्य धारा से जुड़ गये हैं। स्पष्ट संकेत है कि भविष्य में झांसी क्षत्रप की ओर से कोई चैकाने वाला कदम भी उठाया जा सकता है।
मुख्य लड़ाई सपा के भीतर ही अहम और वर्चस्व की थी। इसमें घनश्याम अनुरागी हारे और शिशुपाल जीते। शिशुपाल यदि खुद अध्यक्ष नही बन पाये तो सुमन निरंजन को बनवाने में सफल हुए। सुमन के पति देवेंद्र निरंजन उर्फ छुन्ना से उनके गहरे व्यापारिक रिश्ते हैं। देवंेद्र का विश्वास शिशुपाल के ही अधीन है। यदि हम सीधे शब्दों में कहें तो नाम भर की अध्यक्ष सुमन बनी हैं, असली अध्यक्ष शिशुपाल ही होंगे। भाजपा को भले ही सुमन से बड़ी आशाएं हों लेकिन वह तब तक उनके पाले में शामिल नही होंगी जब तक कि शिशुपाल नही चाहेंगे। अनुरागी से उनकी कभी बहुत नही पटी, पहले आमने-सामने होते थे। चुर्खी के चुनाव में दोनों लोग एक साथ आ गये। ऐसा कुछ ही दिनों के लिए रहा। आर्थिक मुददों के कारण दूरियां फिर से बन गईं। शिशुपाल चाहते तो सुरेंद्र मौखरी पर हाथ रख सकते थे लेकिन कद की चिंता ने उन्हें ऐसा करने से रोके रखा। देवेंद्र निरंजन उनके लिए जितने भरोसे के हैं शायद सुरेंद्र उतना न बन पाते। बिरादरी का नेता बनने की सुरेंद्र यादव की जो इच्छा थी वह इसलिए बलवती नही हो पा रही है क्योंकि इसका श्रेय शिशुपाल के खाते में ज्यादा जाता हुआ दिख रहा है। अब वह संगठन के लिए भी बुरे हुए हैं। शिशुपाल ने न सिर्फ अनुरागी के वर्चस्व को तोड़ा बल्कि खुद का खोया हुआ रुतबा अख्तियार कर लिया। सपा की आंतरिक हालत इस वक्त ठीक नही। झांसी के प्रमुख क्षत्रप भी इस वक्त उपेक्षात्मक व्यवहार से असंतुष्ट हैं। उनका भी कभी कोई चैकाने वाला कदम सामने आ सकता है। अनुरागी से तो विष्णुपाल नन्हू राजा भी असंतुष्ट रहते हैं लेकिन इस चुनाव में वह आसना खातून के साथ ही रहे। आगामी दिन बड़े उथल-पुथल भरे होने जा रहे हैं।

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