
पंजाब के गुरदासपुर लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव का नतीजा भाजपा पर कहर टूटने जैसा रहा है। हालांकि भाजपा के हमदर्द इसे राजनीति की हवा बदलने के संकेत के तौर पर स्वीकार करने को तैयार नही हैं। वे यह साबित करने में लगे हुए हैं कि इसके पीछे स्थानीय कारक जिम्मेदार हैं। पर उनकी दलीलों की विश्वसनीयता के पैबंद पहली नजर में ही उजागर हो जाते हैं। दूसरी ओर कांग्रेस व अन्य विपक्षी खेमे के हौसले गुरदासपुर के नतीजों ने बढ़ा दिये हैं। गुजरात में हुए राज्य सभा चुनाव में अहमद पटेल की जीत से इसकी शुरुआत हुई थी जिसकी पृष्ठभूमि में यह उत्साह और ज्यादा प्रभावी साबित हो रहा है।
लंबे समय तक गुरदासपुर सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवारों को सफलता मिलती रही। इसलिए भाजपा के ठेकेदार इसे कांग्रेस की पारंपरिक सीट बताकर अपनी पार्टी की क्षति को कमतर बनाने का असफल प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यह नही भूला जाना चाहिए कि इस सीट पर भाजपा से विनोद खन्ना ने चार बार सफलता हासिल की थी। इसलिए यह सीट भाजपा का अभैद्य किला घोषित हो गई थी। इस किले को ढहाने में कामयाबी हासिल करके विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की उल्टी गिनती की शुरूआत के आकलन पर जबर्दस्त तरीके से मुहर लगा दी है।

भाजपा कैंप के लोग यह सिद्ध करने में लगे हैं कि पार्टी को गुरदासपुर में उम्मीदवार के चयन में की गई चूंक की वजह से नीचा देखना पड़ा। इसका दूसरा मतलब यह है कि पार्टी ने कमजोर उम्मीदवार बनाकर जो रिस्क लिया उसके चलते अंधे के हाथों बटेर लगने की तरह कांग्रेस को इस सीट पर कामयाबी मिल गई। अगर भाजपा रिटायर्ड मेजर स्वर्ण सलारिया की बजाय विनोद खन्ना की पत्नी को उम्मीदवार बना देती तो उसका किला इस बार भी कांग्रेस भेद पाने में विफल रहती। लेकिन गुरदासपुर में वोटों के जो आंकड़े सामने आये हैं उससे यह साबित होता है कि लोग हर कीमत पर भाजपा को हराने पर आमादा थे। इसलिए भाजपा किसी को भी उम्मीदवार बनाती उसका यही हश्र होना था।
2014 के लोकसभा के आम चुनाव में विनोद खन्ना ने गुरदासपुर में 4 लाख 82 हजार 255 मत हासिल किये थे और 1 लाख 73 हजार 376 मतों से कामयाबी हासिल की थी। आम चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रताप वाजवा 3 लाख 46 हजार 190 वोटों पर सिमट गये थे। जबकि उपचुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार सुनील जाखड़ ने विनोद खन्ना को पीछे छोड़ते हुए 4 लाख 99 हजार से अधिक वोट हथिया लिए दूसरी ओर भाजपा प्रत्याशी स्वर्ण सलारिया दूसरे नंबर पर उतने वोट हासिल नही कर सके जितने आम चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार ने हासिल किये थे। उन्हें सिर्फ 3 लाख साढ़े 6 हजार वोट मिले।
उपचुनाव में आप उम्मीदवार को प्राप्त मतों की संख्या देखना चुनाव के वास्तविक रुख को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। 2014 के आम चुनाव में आप के उम्मीदवार सुच्चा सिंह ने 1 लाख 73 हजार से अधिक मत हासिल किये थे। दूसरी ओर उपचुनाव में आप उम्मीदवार सुरेश खजुरिया केवल साढ़े 23 हजार मतों पर निबट गये। इसका मतलब क्या है। इसका मतलब है कि मतदाता भाजपा को कोई मौका नही मिलने देना चाहते थे। इसलिए भाजपा विरोधी सभी मतों का ध्रुवीकरण हो गया और मुटठी भर लोगों के अलावा किसी ने आप को वोट नही दिया।

हाल में नोट बंदी और जीएसटी को लेकर सरकार समर्थक संस्थाओं तक के विशेषज्ञों की राय सरकार के खिलाफ आई है। लोग तुगलगी अंदाज में किये गये इन फैसलों के बुरे परिणाम पहले से भुगत रहे थे लेकिन मोदी के वितंडावाद और सम्मोहन की वजह से वे भ्रमित थे। लेकिन विशेषज्ञों की राय ने उनमें मोह भंग के लिए प्रमाणिक आधार तैयार कर दिया और इसकी प्रतिक्रिया उन्होंने गुरदासपुर के जनादेश के रूप में जाहिर की है। जिसका दोहराव फिलहाल आने वाले सभी चुनावों में होने के आसार नजर आ रहे हैं। भाजपा की लीडरशिप को भी इसका एहसास हो चुका है। इसलिए नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कुछ दिनों से कांग्रेस और विपक्ष के खिलाफ युद्ध स्तरीय सक्रियता दिखाना शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री के भाषण भी इसके चलते संयम खो रहे हैं। भाजपा को सबसे बड़ी चिंता एंटी इनकाॅमबेंसी फैक्टर की जद में मोदी और शाह के गृह प्रदेश गुजरात के आ जाने की है। गुजरात की पार्टी की गौरव यात्रायें बेहद फीकी रहीं। इसलिए भाजपा के कैंप में घबराहट है। हालांकि मीडिया का एक वर्ग गुजरात में भाजपा की स्थिति को कमजोर आंकते हुए भी यह बता रहा है कि अंततोगत्वा मोदी के करिश्में का अभी भी कोई जोड़ नही है। इसलिए गुजरात में भाजपा को झटका भले ही लग जाये लेकिन सरकार उसी की बनेगी। इन राजनैतिक पंडितों का कहना कुछ हद तक ठीक भी है। लोगों को इंतजार यह है कि पार्टी को संकट से उबारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शिगूफेबाजी के अपने पिटारे से कौन सा ऐसा नया शिगूफा निकालते हैं जो उनके लिए मुश्किल हालातों का तोड़ साबित होगा।







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