उरई । सांस्कृतिक गर्व के दौर की वापसी युग आ चला है । मौनिया कलाकारों के उत्साहपूर्ण प्रदर्शन में इसकी झलक साफ़ देखी जा सकती थी । उनके माध्यम से नई पीढ़ी को गौ संरक्षण के प्रति ग्वालों के अद्भुत समर्पण के इतिहास की जानकारी से अवगत होने का मौका मिला ।

पिछले दशक तक गौ पालकों तक को मौनिया परंपरा से जुड़ने में शर्मिंदगी महसूस होने लगी थी लेकिन समाज के बदले परिवेश का नतीजा है कि भदेस ग्रामीण ही नहीं कुलीन ठसक पर इतराने वाले परिवारों के युवा भी दीपावली की परवा के दिन सबेरे से मौनव्रत धारण कर जंगल –जंगल भटकने में उल्लास  महसूस कर रहे थे ।

इसके बाद मौनियों का लट्ठों  पर नर्तन भी देखने लायक रहा । इस दौरान उनका अपनी कला पर नाज छलका जा रहा था । दमरास में बड़े किसानों ने कलाकारों पर जाम कर इनाम लुटाया।

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